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WBCAP: राज्य संचालित कॉलेजों में प्रवेश दर घटकर 28.81% पहुंची, 70 प्रतिशत से ज्यादा स्नातक सीटें खाली

Fri, 26 Sep 2025 10:17 AM IST
शाहीन परवीन एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: शाहीन परवीन Updated Fri, 26 Sep 2025 10:17 AM IST
सार

Report: पश्चिम बंगाल के सरकारी और राज्य-सहायता प्राप्त कॉलेजों में स्नातक प्रथम वर्ष के लिए प्रवेश दर इस साल काफी कम रही। कुल सीटों में से सिर्फ 28.81% ही भरी जा सकीं, जबकि 70 प्रतिशत से ज्यादा सीटें खाली रह गईं।

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Over 70 pc of undergraduate seats go unfilled in state-run colleges of West Bengal
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Adobe Stock (AI)

विस्तार

WBCAP Admission 2025: पश्चिम बंगाल के सरकारी कॉलेजों में स्नातक प्रथम वर्ष में प्रवेश के लिए दो राउंड की काउंसलिंग के बाद भी 70% से ज्यादा सीटें खाली रह गई हैं, एक अधिकारी ने गुरुवार को बताया।

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राज्य के सरकारी और राज्य-सहायता प्राप्त कॉलेजों में कुल 9,36,215 सीटें उपलब्ध हैं। केंद्रीय प्रवेश पोर्टल पर इस बार 4,21,301 उम्मीदवारों ने पंजीकरण कराया, लेकिन केवल 2,69,777 उम्मीदवारों को ही सीटें मिलीं, यानी सिर्फ 28.81% सीटें भरी गईं।
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अधिकारी ने बताया कि पिछले साल की तुलना में इस बार 4.44 लाख सीटें कम भरी गई हैं।

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दूसरे चरण में 39 हजार से अधिक छात्रों ने लिया प्रवेश  

उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारी के अनुसार, काउंसलिंग के पहले चरण में 2.30 लाख छात्रों ने नामांकन कराया था, जबकि दूसरे चरण में 39,000 से अधिक छात्रों ने प्रवेश लिया।

उन्होंने कहा, "स्थिति असामान्य है, लेकिन अप्रत्याशित नहीं है क्योंकि प्रवेश प्रक्रिया पूरी होने में देरी के कारण छात्रों का एक वर्ग आशंकित है और स्वायत्त कॉलेजों या निजी संस्थानों का विकल्प चुन रहा है।"

यह पूछे जाने पर कि क्या दुर्गा पूजा की छुट्टियों के बाद काउंसलिंग का एक और दौर होगा, अधिकारी ने कहा कि इससे शैक्षणिक कैलेंडर बाधित होगा।

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50 प्रतिशत से भी कम सीटें खाली

लेडी ब्रेबोर्न कॉलेज की प्रिंसिपल सिउली सरकार ने पीटीआई को बताया कि उनके कॉलेज की 630-635 सीटों में से 50 प्रतिशत से भी कम सीटें खाली हैं, जो असामान्य है।

उन्होंने कहा, "अर्थशास्त्र और सांख्यिकी में कई सीटें अभी तक नहीं भरी गई हैं। मुझे ऐसे उम्मीदवारों के ईमेल मिल रहे हैं जो प्रवेश नहीं पा सके, लेकिन जरूरी जांच-पड़ताल के बाद दाखिला लेने के इच्छुक हैं। चूंकि पूरी प्रवेश प्रक्रिया केंद्रीकृत थी, इसलिए हमें उम्मीद है कि इस समस्या का समाधान निकालने और खाली सीटों को भरने के लिए कुछ किया जाएगा।"

सरकार ने कहा कि ओबीसी आरक्षण में देरी के अलावा, सरकारी और सामान्य विषयों में छात्रों की कम रुचि भी इस साल छात्रों की संख्या कम होने का कारण बनी है।

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दुर्गा पूजा के बाद सुधार की उम्मीद

टीएमसी छात्रसंघ अध्यक्ष त्रिनंकुर भट्टाचार्य ने पीटीआई को बताया कि उन्हें उम्मीद है कि दुर्गा पूजा के बाद स्थिति में सुधार होगा, क्योंकि सरकार कॉलेजों को सीधे प्रवेश शुरू करने की अनुमति देने सहित अन्य विकल्पों पर विचार कर रही है।

उन्होंने कहा, "कई छात्र ऑनलाइन प्रक्रिया से परिचित नहीं थे और उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा। ओबीसी मुद्दे पर गतिरोध ने छात्रों के एक वर्ग में भी अनिश्चितता पैदा कर दी है, जो शायद निजी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का विकल्प चुनते।"

इस बीच, तृणमूल छात्र परिषद के एक अन्य नेता ने कहा कि स्नातक सीटों का खाली रहना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस साल ओबीसी मुद्दे पर प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने में देरी के कारण स्थिति गंभीर है।

WBCUTA ने सरकारों की नीतियों पर उठाए सवाल

राज्य की ओबीसी सूची पर कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाए जाने के बाद, राज्य द्वारा संचालित कॉलेजों में स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश अगस्त में शुरू हुआ।

पश्चिम बंगाल कॉलेज एवं विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (WBCUTA) के सदस्य शुभोदय दासगुप्ता ने आरोप लगाया कि राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकार और केंद्र की भाजपा सरकार की नीतियां "सार्वजनिक वित्त पोषित शिक्षा को नष्ट कर रही हैं"।

उन्होंने दावा किया, "ऐसी स्थितियां राज्य और केंद्र, दोनों सरकारों के फैसलों का नतीजा हैं, जो लोगों को निजी कॉलेजों का विकल्प चुनने के लिए मजबूर कर रही हैं।"

महामारी और नीतियों ने उच्च शिक्षा को आम लोगों के लिए कठिन बनाया: दासगुप्ता

वरिष्ठ शिक्षाविद दासगुप्ता ने दावा किया कि महामारी के दौरान कॉलेज छोड़ने वालों की दर में वृद्धि हुई है, लेकिन दोनों सरकारों की "अभिजात्य वर्ग-समर्थक नीतियों" ने भी उच्च शिक्षा को आम जनता के लिए दुर्गम बना दिया है।

उन्होंने कहा, "अगर सरकारी वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों पर हमला होता है, तो शिक्षा की गुणवत्ता गिरती है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या के बाद हमने खतरे की संस्कृति के अस्तित्व के बारे में सुना; उच्च शिक्षण संस्थानों में भी लंबे समय से ऐसी ही संस्कृति प्रचलित है। कॉलेज में प्रवेश में गिरावट को व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।"

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