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कुदरत के दिए जख्म पर नमक छिड़क रहा प्रशासन

Thu, 20 Jun 2013 04:54 PM IST
देहरादून/ गौरव नौड़ियाल
देहरादून/ गौरव नौड़ियाल Updated Thu, 20 Jun 2013 04:54 PM IST
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poor management will create problem

आसमान में घिर आए बादलों ने नरगिस के काम करने की रफ्तार को बढ़ा दिया और वृद्घ आशा रानी भी दुबारा बारिश होने के डर से आशंकित हो तेजी से धूप में फैलाए अपने सामान को समेटने में जुट गई। क्लेमेंटाउन की मोरोवाला लेन नंबर 12 के निचले हिस्से में बसे हर घर में करीब एक जैसी ही स्थिति है।

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डरा रहे हैं तबाही के निशान
क्लेमेंटाउन क्षेत्र में अब सब कुछ शांत है, लेकिन तीन दिन पहले हुई भारी बारिश और उसके बाद की तबाही के निशान अभी भी यहां के बाशिंदों को डरा रहे हैं। नरगिस अपने पति आमिर उल इस्लाम के साथ मोरोवाला में रह रही थी। आमिर दिहाड़ी मजदूर है और जैसे तैसे मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा है, लेकिन पिछले दिनों आई आफत की बारिश में उसका सब कुछ लुट गया।
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नरगिस के घर से ही करीब 5 सौ मीटर दूर फौज से रिटायर्ड आरसी जोशी अपनी धर्मपत्नी के साथ रिटायरमेंट के दिन हंसी खुशी दून में काटना चाहते थे, इसलिए अपनी जमा पूंजी से घर बनवा लिया, लेकिन आज यही घर उनको हर बरसात में जख्मी कर जाता है। कमोबेश यही हाल ओमवती अमीरिया, अंगद सिंह, रिहाना खातून और शरीफ अहमद के परिवारों का भी है।

अर्जियां लगाकर थक गए

प्रशासन के पास अर्जियां लगाकर थक गए तो अब गालों पर लुढ़कते आंसुओं को थामते हुए घर बेचने की बात कहते हैं। इन लोगों को बरसात के दिनों में अपनी छतों पर रहकर रात गुजारनी पड़ती हैं, लेकिन इस सबके बावजूद न कैंट बोर्ड और ना ही नगर निगम इन लोगों की परेशानी बने बेतरतीब नालो के जाल का कोई समाधान ढूंढ पाया है। इस क्षेत्र से सांसद हरीश रावत और विधायक दिनेश अग्रवाल दोनों ही सूबे की राजनीति में कद रखते हैं, लेकिन दोनों के ही आश्वासन मुसीबतों के सामने बौने ही नजर आते हैं।

लोगों का आरोप हैं कि नगर निगम नालों का ठीक से मैनेजमैंट नहीं कर पाया इसलिए पानी उनके घरों में घुसकर हर बरसात में तबाही मचाता है। बुधवार को थोड़ी धूप लगने से पानी से झांकती जमीन दिखी तो लोग भी अपने आशियाने से बचे-खुचे सपनों को बटोरने में जुट गए।


हर बरसात के बाद प्रशासन आकर देख कर चला जाता है, बाबूजी होता तो कुछ भी नहीं। कुदरत भी मजदूर की किस्मत पर ही हर बार चोट मारती है। अब देखिए ना एक खाट और ये कुछ खाली बरतन ही रह गए हैं। पड़ोस में भी कब तक दिन गुजारेंगे।
- आमिर उल इस्लाम, दिहाड़ी मजदूर


तकरीबन 4 साल पहले तक मोरोवाला में इतना पानी नहीं भरता था, लेकिन राष्ट्रीय राजमार्ग और लालपुल के पास बहने वाले नालों को बेतरतीब ढंग से मोरोवाला की ओर मोड़ने से मुश्किलें बढ़ने लगी है।
- महेश पांड़े, उपाध्यक्ष, क्लेमेंटाउन रेजीडेंशियल वेलफेयर सोसायटी

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