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सिर्फ कैलेंडर न बदले: दुनिया भले ही टकराव की ओर बढ़ रही, भारत के लिए सहयोग-संतुलन-समावेशी विकास ही भावी रास्ता
Thu, 01 Jan 2026 07:38 AM IST
पवन पांडेय
अमर उजाला
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Published by: पवन पांडेय
Updated Thu, 01 Jan 2026 07:38 AM IST
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सिर्फ कैलेंडर न बदले
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अमर उजाला प्रिंट/ एजेंसी
विस्तार
नया वर्ष केवल कैलेंडर बदलने का अवसर नहीं होता, बल्कि बीते समय के सबक और भविष्य की चुनौतियों को समझकर नए संकल्प लेने का भी क्षण होता है। हमने 2026 में ऐसे समय में प्रवेश किया है, जब वैश्विक व्यवस्था मंदी, युद्ध, संरक्षणवाद और पर्यावरणीय संकटों की वजह से पहले ही दबाव में है। विश्व की सबसे तेज गति से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में शुमार भारत इन चुनौतियों के बावजूद अपने लिए अवसर तलाश रहा है। जाहिर है, यह राह आसान नहीं है, खासकर तब, जब चारों ओर से भू-राजनीतिक और आर्थिक दबावों का सामना करना पड़ रहा है। सबसे बड़ा आर्थिक झटका अमेरिका की नई संरक्षणवादी नीतियों से है। हालांकि ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नाम पर मनमानी टैरिफ नीति से पैदा हुई अनिश्चितता के बीच यह उम्मीद भी है कि शीघ्र ही दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते की खबरें सुनने को मिलेंगी।फिर भी, भारत को वैश्वीकरण के कमजोर पड़ते परिदृश्य में आत्मनिर्भरता और खुले बाजार के बीच संतुलन साधना ही होगा। आर्थिक चुनौतियों के अतिरिक्त, विश्व व्यवस्था पर संघर्षों की छाया भी मंडरा रही है। ट्रंप की पहल से इस्राइल-गाजा युद्ध भले खत्म हो गया हो, पर रूस-यूक्रेन में घटनाक्रम जिस तेजी से बदल रहे हैं; हाल ही में पुतिन के आवास पर हमला हुआ है, उससे भी अस्थिरता बनी हुई है। दूसरी तरफ, जलवायु परिवर्तन से उपजी आपदाएं अब रोजमर्रा की हकीकत बन चुकी हैं। वैश्विक स्तर पर तो 2025 सर्वाधिक गर्म वर्षों में से एक रहा ही, सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वॉयरन्मेंट के आंकड़ों के अनुसार, बीते वर्ष में 331 से भी अधिक दिन ऐसे रहे, जब देश के किसी न किसी हिस्से में असामान्य मौसमी घटना दर्ज की गई।
अच्छी बात है कि भारत ने पेरिस समझौते के तहत निर्धारित 2030 के लक्ष्य से पांच साल पहले ही अपनी कुल स्थापित बिजली क्षमता का आधा हिस्सा गैर-जीवाश्म स्रोतों से हासिल कर लिया है, पर इस ऐतिहासिक उपलब्धि के बावजूद अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है। भू-राजनीतिक चुनौतियों में पाकिस्तान और चीन तो हैं ही, बांग्लादेश में जारी उथल-पुथल भी हमारी क्षेत्रीय कूटनीति की परीक्षा ले रही है। नए वर्ष में भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति को व्यावहारिकता के साथ आगे बढ़ाना होगा। कुल मिलाकर, नए वर्ष में देश के लिए संकल्प होना चाहिए कि दुनिया भले टकराव की ओर बढ़ रही हो, लेकिन भारत के लिए सहयोग, संतुलन और समावेशी विकास ही आगे का रास्ता है।