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कर्नाटक में मोदी का जादू चलेगा?
अरुण नेहरू
Updated Fri, 12 Apr 2013 10:46 PM IST
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राहुल गांधी ने अपनी नई भूमिका में चुपचाप, लेकिन प्रभावी ढंग से काम शुरू कर दिया है। पिछले दो महीनों में उन्होंने वह सब कुछ किया है, जो एक उपाध्यक्ष को करना चाहिए।
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चुनाव के कामकाज जारी हैं, विभिन्न दलों से गठजोड़ के लिए काम चल रहा है और पंजाब, हिमाचल प्रदेश एवं बिहार में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्षों की नियुक्ति हो गई है। कर्नाटक विधानसभा का चुनाव सामने है और मुझे लगता है कि कांग्रेस वहां संभावित जीत की ओर आगे बढ़ रही है।
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भाजपा में शीर्ष स्तर पर अब भी संघर्ष जारी है। नरेंद्र मोदी को पार्टी संसदीय बोर्ड में शामिल करने पर शीर्ष स्तर पर कुछ आपत्तियां उठीं। लेकिन भाजपा के नए अध्यक्ष राजनीति में कोई नौसिखुए नहीं हैं। फिर उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी विश्वास हासिल है। जिन लोगों ने नितिन गडकरी का विरोध किया था, नई टीम में उन सभी को किनारे लगा दिया गया है। यानी संघ ने भाजपा को एक सख्त संदेश दिया है।
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हालांकि नरेंद्र मोदी को सावधानीपूर्वक आगे बढ़ना होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि गुजरात का यह कद्दावर नेता लोकप्रियता भांपने के लिए कर्नाटक के चुनाव प्रचार में बढ़-चढ़कर भाग लेता है या नहीं। संभवतः वह कोई जोखिम नहीं लेंगे और कर्नाटक का बस रूटीन दौरा करेंगे।
वह उन्हीं राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे, जहां उनको लेकर कोई विवाद न हो। आने वाले दिनों में वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और कुछ हद तक भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह का नाम भी प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के रूप में सामने आए, तो कोई आश्चर्य नहीं।
जहां तक कर्नाटक का मामला है, तो वहां चुनाव में कांग्रेस के वोट बढ़ेंगे और भाजपा को काफी नुकसान होगा, क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा भी भाजपा के वोट काटने का काम करेंगे। इसके अलावा वहां सत्ता-विरोधी रुझान भी ज्यादा है। अगर भाजपा वहां एकजुट रहती, तो क्या चुनाव जीत जाती? मुझे ऐसा नहीं लगता, क्योंकि चुनाव में आखिरकार सरकार का प्रदर्शन देखा जाता है। पर यह जरूरी नहीं है कि कर्नाटक का रुझान भविष्य के बारे में कोई निश्चित संकेत दे।
कांग्रेस और भाजपा ने अभी तक प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है और चुनाव खत्म होने तक शायद ऐसा करेगी भी नहीं, क्योंकि तभी गठबंधन एवं संख्याबल की स्थिति स्पष्ट होगी। पर मीडिया ने दोनों दलों के दावेदारों के नाम तय कर लिए हैं और उन पर बहस जारी है। बहरहाल, राहुल गांधी ने प्राथमिकता का संकेत देते हुए कहा है कि वह पार्टी में नई जान फूंकेंगे, जबकि नरेंद्र मोदी ने कोलकाता में कहा कि वह राजनेता नहीं हैं!
हमें अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करना होगा, क्योंकि दक्षिण यूरोप की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं दिखता और मध्य पू्र्व में हिंसक गतिविधियां जारी हैं। बेशक आर्थिक संकट और निराशा की स्थिति हमेशा के लिए नहीं रहेगी, लेकिन लघु एवं मध्यम अवधि के सुधार कार्यक्रम तब तक चलाने होंगे, जब तक हम आठ फीसदी की विकास दर हासिल नहीं कर लेते।
जो स्थिति है, उसमें 2013 में अगर हम पांच फीसदी की विकास दर हासिल कर लेते हैं, तो यह एक प्रकार का चमत्कार ही होगा। इसके बावजूद अत्यंत सावधानी के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है, क्योंकि विकास दर में तीन फीसदी गिरावट के निहितार्थ गंभीर हैं। हमें देश में पूंजी का प्रवाह बढ़ाने की जरूरत है, इस समय पूंजी देश से बाहर जाएगी, तो उसका नुकसान ही होगा। मैं सिर्फ प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि दूरसंचार क्षेत्र की दुर्दशा की भी बात कर रहा हूं।
हम एक-दूसरे पर चाहे जितने आरोप लगा लें, लेकिन वास्तविकता यही है कि दूरसंचार का क्षेत्र पिछड़ रहा है। मैं इस क्षेत्र का विशेषज्ञ नहीं हूं, लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि एनडीए और यूपीए की नीति में कोई गड़बड़ी नहीं थी। हां, ए राजा का कार्यकाल बहुत खराब था और अदालत का हस्तक्षेप जरूरी था। इस मामले में कांग्रेस एवं भाजपा के बीच जंग शुरू हो गई, जिसे हवा कॉरपोरेट क्षेत्र ने दी। कैग की रिपोर्ट ने तो बिल्कुल अराजकता की स्थिति पैदा कर दी, और अब हम पाते हैं कि इस क्षेत्र में सब कुछ गलत है।
कई उद्यमी अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं और देश में मुकदमा लड़ रहे हैं। कई विदेशी निवेशकों ने विदेशों में भी मुकदमा दर्ज कर रखा है। जो लोग भारत में निवेश करके फंसे हैं, उन्हें छोड़कर शायद ही कोई नया निवेश इस क्षेत्र में हो रहा है। असुरक्षित माहौल में व्यावसायिक समुदाय निवेश करना भी नहीं चाहता।
आम आदमी इसके तकनीकी विवरणों से जुड़ा हुआ नहीं है, लेकिन अपने परिवार से दूर रहने वाले लाखों लोग दूरसंचार के कारण ही परिवार से संपर्क बनाने में सक्षम हैं। लगभग हर किसी के पास मोबाइल फोन है और कोई चाहे, तो इस पर किताब लिख सकता है कि दूरसंचार की तकनीक ने कैसे विभिन्न आय वर्ग को लोगों का जीवन बदला है।
एसएफआई कार्यकर्ताओं द्वारा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एवं उनके वित्त मंत्री पर हमला करना सही नहीं है, क्योंकि हमारी व्यवस्था में हिंसा के लिए जगह नहीं है। हम सबने युवा सुदीप्तो गुप्त की त्रासद मौत देखी है। उसके खिलाफ एसएफआई आंदोलन करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन हिंसा को बढ़ावा देने से अतीत की कड़वी यादें ही पुनर्जीवित होंगी। ममता बनर्जी ने जैसी प्रतिक्रिया जताई, उस स्थिति में वैसी प्रतिक्रिया कोई भी जताता।