नोबेल में पीछे क्यों महिला वैज्ञानिक, बता रही हैं ऋतु सारस्वत
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हाल ही में दो महिला वैज्ञानिकों इमैनुएल शारपेंतिए और जेनिफर डाउड़ना को रसायन विज्ञाने में नोबेल पुरकार मिला। यकीनन यह महिला वैज्ञानिकों के लिए राहत का विषय है, क्योंकि वर्ष 1903 में मैरी क्यूरी के नोबेल जीतने से लेकर अब तक महिलाओं ने विज्ञान में बेशक लंबा सफर तय किया है, लेकिन नोबेल पुरस्कार में उनकी भागीदारी तुलनात्मक रूप से कम ही है। नोबेल में महिला वैज्ञानिकों की भागीदारी अब तक 3.29 प्रतिशत ही है। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि विज्ञान की दुनिया में आज भी महिलाओं के लिए वैसी जगह नहीं है। पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था इस मिथक को निरंतर स्थापित करने की चेष्टा करती है कि विज्ञान जैसे क्लिष्ट विषय महिलाओं की समझ से परे है। चार्ल्स डार्विन जैसे शीर्ष वैज्ञानिक की भी यही राय थी। वर्ष 1871 में प्रकाशित अपनी किताब डिसेंट ऑफ मैन में उन्होंने लिखा है कि महिलाएं जीवन के हर क्षेत्र में पीछे हैं। उनके हिसाब से इस अंतर की वजह महिलाओं का पुरुषों के मुकाबले कम जैविक क्षमता का होना है।
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डार्विन की पूर्वाग्रह से ग्रस्त सोच के विपरीत वास्तविकता यह है कि आज तक कोई भी वैज्ञानिक शोध यह साबित नहीं कर पाया है कि स्त्री और पुरुष की जैविक क्षमताएं भिन्न-भिन्न होती हैं या फिर पुरुष का बौद्धिक स्तर महिलाओं से अधिक है। अमेरिका की प्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी ने अपने एक शोध में 10 वीं कक्षा के छात्रों का छह साल तक निरंतर अध्ययन किया और पाया कि गणित की ग्यता परीक्षा में लड़के और लड़कियों का प्रदर्शन एक समान था, इसके बावजूद लड़कियों का आत्मविश्वास लड़कों की अपेक्षा सिर्फ कम ही नहीं था, अपितु वे खुद को परीक्षा से पूर्व ही लड़कों से कमतर मानकर चल रही थी। यह संपूर्ण सोच उस सामाजिक- सांस्कृतिक ताने-बाने की ओर इशारा करती है, जो दुनिया भर में कमोबेश एक जैसा है। अमूमन अभिभावक खुद ही अपनी बच्चियों को विज्ञान जैसे विषय के अध्ययन के प्रति हतोत्साहित करते रहते हैं, जिनका उनके पास कोई ठोस तार्किक कारण नहीं होता सिवा इस मिथक के कि विज्ञान लड़कियों के लिए ठीक नहीं। विज्ञान में लड़कियां दो स्तरों पर पिछड़ती चली जाती हैं।
एक तो स्कूल में 10 वीं तक लड़के और लड़कियां, दोनों विज्ञान पढ़ते हैं, लेकिन उसके बाद लड़कियां विज्ञान छोड़ देती हैं। दूसरा यह कि जो लड़कियां आगे विज्ञान पढ़ती भी हैं, उनमें से ज्यादातर शोध के स्तर तक नहीं पहुंचतीं। ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकनॉमिक को-ऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट के अध्ययन में कहा गया है कि आत्मविश्वास में कमी और रूढ़िवादी सोच के चलते लड़कियां विज्ञान में अपना भविष्य नहीं देखतीं, जबकि यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि विज्ञान में रुचि का जैविकता से कोई संबंध नहीं है। यह सांस्कृतिक एवं सामाजिक रूढ़िवादिता का परिणाम है। एक अध्ययन के मुताबिक, पांच वर्ष के बच्चे में यह समझ विकसत हो जाती है कि उसके लिंग से क्या व्यवहार अपेक्षित है। एक प्रयोग के दौरान बच्चों के एक समूह को एक तस्वीर दिखाई गई, जिसमें एक लड़की लकड़ी काट रही थी।
बाद में जब बच्चों से उस तस्वीर के बारे में पूछा गया, तो अधिकांश बच्चों ने उत्तर दिया कि लड़का लकड़ी काट रहा था । उनके पूर्वाग्रह ग्रस्त मस्तिष्क के लिए यह याद रख पाना मुश्किल था कि लड़की भी लकड़ी काट सकती है। पूर्वाग्रह का यही जाल विज्ञान के क्षेत्र में भी फैला हुआ है। तभी तो विज्ञान के क्षेत्र में 96.71 प्रतिशत नोबेल पुरस्कार पुरुषों को मिले। मारग्रेट डब्ल्यू रोसिटर ने इसे माटिल्डा इफेक्ट कहा था। यह एक किस्म का पूर्वाग्रह है, जिसमें महिलाओं की उपलब्धियों को मान्यता देने के बजाय उनके काम का श्रेय उनके पुरुष सहकर्मियों को दिया जाता है। जैसे, 1960 में जोसलिन बेल बरनोल नाम की शोधार्थी ने पहला रेडियो पल्सर खोजा, लेकिन इसके लिए 1974 में उनके सुपरवाइजर एंटोनी हेवश और माटन रेल को नोबेल मिला।
महिला वैज्ञानिकों को हाशिये पर धकेलने की प्रवृत्ति न्यायोचित नहीं। तब तो और नहीं, जब भविष्य में 90 प्रतिशत रोजगार सृजन ऐसे क्षेत्रों में होंगे, जिनमें किसी न किसी रूप में सूचना और संचार तकनीक का ज्ञान आवश्यक होगा। ऐसे में, विज्ञान और तकनीक से जुड़े विषय और करियर विकल्पों में महिलाओं और लड़कियों की संख्या बढ़ाना बेहद अहम है और इससे टिकाऊ विकास हासिल करने में मदद मिलेगी।