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छाया बनकर क्यों रह जाती हैं नेताओं की पत्नियां

Wed, 16 Apr 2014 06:55 PM IST
मनीषा सिंह
मनीषा सिंह Updated Wed, 16 Apr 2014 06:55 PM IST
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Why the wives of leaders become shadow of husband

गनीमत है कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने वडोदरा से अपना नामांकन दाखिल करते हुए खुद के विवाहित होने का ऐलान कर दिया। जशोदा बेन के बारे में अब तक जो कुछ कहा-सुना जाता रहा है, उसके अनुसार नरेंद्र मोदी की राजनीतिक व्यस्तताओं के कारण वह उनसे अलग एकाकी जीवन जी रही हैं। बात नरेंद्र मोदी और जशोदा बेन की नहीं है। हमारे यहां नेताओं की पत्नियां ज्यादातर घर के भीतर बैठे रहने के लिए ही जानी जाती हैं।

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शायद यह विवशता भारतीय गणतंत्र के गुणसूत्र (डीएनए) में पैठी हुई है कि पत्नी के रूप में महिलाएं सिर्फ अपने पति के सफल भविष्य की कामना करती हैं, वे खुद पहचान बनाने का प्रयास नहीं करतीं। हालांकि महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा और प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू देश और समाज का ध्यान कुछ हद तक खींचने में कामयाब रही थीं। पहले भारतीय गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी जब राष्ट्रपति भवन में पहुंचे थे, तब उनकी पत्नी का देहांत हो चुका था। जबकि प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की पत्नी राजबंसी देवी को राष्ट्रपति भवन के बाहर बेहद दुर्लभ मौकों पर ही देखा गया। वह खादी की साड़ी अत्यधिक सलीके से पहनना जानती थीं और साल में दो बार राजघाट पर पति के साथ जाकर चुपचाप चरखा कातने का जतन करती थीं। लेकिन वह कभी न तो पति के साथ राजकीय भोजों में शामिल हुईं न ही उनके साथ विदेश दौरों पर गईं।
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इतिहास में मौलाना आजाद की पत्नी जुलेखा बेगम और सरदार पटेल की पत्नी झावरबा का उल्लेख तो मिलता है, पर उन्होंने अपने पति की छाया से बाहर आकर क्या किया, इसका पता नहीं चलता। हमें लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले या डॉ. भीमराव अंबेडकर की पत्नियों के बारे में भी कोई ठोस विवरण नहीं मिलता। आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण की पत्नी प्रभावती देवी की राजनीतिक समझ का उल्लेख जरूर मिलता है। कहा जाता है कि यदि वह आपातकाल के वक्त जीवित होतीं, तो उनकी सलाह की छाप लोकनायक के जीवन, कार्यशैली और व्यक्तित्व पर अवश्य पड़ती। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद की पत्नी राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनने और समाज में चर्चा में आने का मौका पा सकीं, अन्यथा वह एक आम गृहिणी बनने से ज्यादा की अपेक्षा नहीं रखती हैं।
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मौजूदा राजनीति में हालांकि सोनिया गांधी, मायावती, जयललिता, वसुंधरा राजे, ममता बनर्जी, शीला दीक्षित जैसी कई महिलाएं पूरी तरह सक्रिय हैं। वे आम महिलाओं को राजनीति में आने के लिए प्रेरित भी कर रही हैं। लेकिन न तो हमें लालकृष्ण आडवाणी की पत्नी कमला आडवाणी की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता का कोई विवरण मिलता है, न ही राजनाथ सिंह, मुलायम सिंह, आजम खान, अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह आदि नेताओं की पत्नियों की राजनीतिक-सामाजिक गतिविधियों के बारे में कोई सूचना मिलती है।


अमेरिका-ब्रिटेन जैसे विकसित समाजों में यह स्थिति नहीं है। अमेरिका में मिशेल ओबामा जब-तब बराक ओबामा के साथ विभिन्न मंचों पर दिखती रहती हैं। वह ह्वाइट हाउस में अपने लिए अलग से आयोजन करती हैं और अलग से अतिथियों को न्योता भेजती हैं। कुछ ऐसी ही सक्रियता ओबामा को टक्कर देने वाले मिट रोम्नी की पत्नी ऐनी ने भी दिखाई। हिलेरी क्लिंटन का सार्वजनिक कद बिल क्लिंटन से कमतर नहीं है। पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर की पत्नी चेरी ब्लेयर भी सार्वजनिक मंचों पर पति के साथ उपस्थित रही हैं। उन समाजों में पति-पत्नी में कोई एक आगे बढ़ता है, तो दूसरा पीछे नहीं छूट जाता। क्या हमारे यहां भी ऐसा नहीं होना चाहिए?

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