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आय में इतनी असमानता क्यों

Tue, 22 Sep 2015 07:55 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Tue, 22 Sep 2015 07:55 PM IST
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Why so disparity in income

बेशक अभी वैश्विक सुस्ती के बीच भारत की सात फीसदी से अधिक विकास दर चमकती दिखाई दे रही है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा के परिदृश्य पर बढ़ती हुई निराशा भी स्पष्ट है। हाल ही में ग्लोबल एचवाच इंडेक्स द्वारा जारी वैश्विक सामाजिक सुरक्षा रिपोर्ट में 96 देशों की सूची में भारत को 71वें स्थान पर रखा गया है। रिपोर्ट में भारत के सामाजिक सुरक्षा परिदृश्य पर चिंता जताई गई है। खासतौर से भारत में असंगठित क्षेत्र में कार्यरत लोगों और वृद्धों की स्थिति को पीड़ाजनक बताया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 1961 में भारत में दूसरों पर निर्भर बुजुर्गों का आंकड़ा 10.9 फीसदी था, जबकि अब 65 फीसदी बुजुर्ग दूसरों पर आश्रित हैं। परिजनों पर निर्भर भारतीय बुजुर्गों को बुनियादी सुविधाएं पाने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ता है।

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इसी तरह विश्व आर्थिक मंच की सामाजिक सुरक्षा रिपोर्ट, 2015 में बताया गया है कि भारत आय की असमानता घटाने के बड़े मौके खो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में आर्थिक वृद्धि की प्रक्रिया और लाभ में सामाजिक भागीदारी बढ़ाने संबंधी नीतिगत चुनौती उत्पन्न हो गई है। ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन ऐंड डेवलपमेंट द्वारा जारी रिपोर्ट का भी कहना है कि भारत में 40 करोड़ के श्रमबल में से केवल दस प्रतिशत श्रम बल संगठित क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं, जिन्हें आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध है। शेष 90 प्रतिशत श्रम बल आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं। यह वह वर्ग है, जो बीमारी लाभ, छुट्टी लाभ, बोनस, प्रोवीडेन्ट फंड, पेंशन, बेरोजगारी भत्ता जैसे लाभों से अनजान है।
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कम आमदनी के कारण करोड़ों लोग अपनी अनिवार्य जरूरतों की पूर्ति भी नहीं कर पाते हैं, सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा का विचार तो बहुत दूर की बात है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के सर्वे में पाया गया कि देश में जहां ग्रामीण क्षेत्रों की सबसे गरीब आबादी आज भी रोजाना 17 रुपये से कम पर गुजर-बसर करने को मजबूर है, वहीं शहरी इलाकों की सबसे गरीब आबादी का प्रति व्यक्ति दैनिक खर्च मात्र 23.40 रुपये है। शहरी इलाकों में 70 फीसदी आबादी करीब 43.16 रुपये प्रतिदिन खर्च करती है, जबकि ग्रामीण इलाकों की आधी आबादी रोजाना 34.33 रुपये प्रति व्यक्ति खर्च करके गुजर-बसर करती है।
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जाहिर है, हमें विकास दर और अरबपतियों की बढ़ती संख्या पर खुश होने के बजाय सामाजिक सुरक्षा और आम लोगों के दुख-दर्द को बताने वाली प्रमुख रिपोर्टों पर गौर करना होगा। यह स्वीकार करना होगा कि विकास का मौजूदा रोडमैप सामाजिक असुरक्षा और लोगों के जीवन की पीड़ा नहीं मिटा पा रहा है। यूएनडीपी के मानव विकास सूचकांक में इस बात का संकेत है कि भारत को अपनी जनता के स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य नागरिक सुविधाओं में सुधार के साथ उनके जीवन-स्तर को ऊपर उठाने की दिशा में अभी लंबा सफर तय करना है। हमें विकसित एवं प्रमुख विकासशील देशों के अनुभवों से सीख लेकर बेहतर सामाजिक सुरक्षा के लिए कारगर प्रयास करने होंगे। सरकार को महंगाई घटाने के ठोस उपाय करने के साथ बीमा, बैंकिंग और आर्थिक-सामाजिक खुशहाली के लिए लागू योजनाओं को सही ढंग से अमल में लाना होगा। उम्मीद करनी चाहिए कि सरकार बचत योजनाओं पर ब्याज दरों में वृद्धि करेगी।

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