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पाकिस्तान से क्यों हो बातचीत

Mon, 01 Dec 2014 11:37 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Mon, 01 Dec 2014 11:37 PM IST
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Why should talk with Pakistan

फिर मिले दक्षिण एशिया के राजनेता। इस बार काठमांडू में। फिर हुआ सार्क सम्मेलन, और जरूरत से ज्यादा चर्चा रही भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के मिलने-न मिलने की। तस्वीरें छपीं अखबारों में, जिन्हें देख हमने नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ की देहभाषा का विश्लेषण किया। टीवी पत्रकारों ने हमसे भी ज्यादा इस मुलाकात को चर्चा में रखा, जैसे मुलाकात इतनी महत्वपूर्ण थी कि ये दोनों राजनेता मिल लेते, तो अमन-शांति बहाल हो जाती।

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मेरी राय में इस मुलाकात की चर्चा करना बेकार है। इसलिए कि पाकिस्तान की विदेश नीति वहां के प्रधानमंत्री के हाथों में नहीं है। नवाज शरीफ ने जब हिम्मत दिखाकर मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए दिल्ली आने का निर्णय लिया, तब पाकिस्तान के जनरल उनसे इतने खफा हुए कि सरकार गिराने में लग गए। सो नवाज शरीफ से बात कर नरेंद्र मोदी क्या हासिल कर लेते?
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पाकिस्तान से बातचीत करना तब तक बेकार है, जब तक वहां की सरकार कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब नहीं देती है हमें। काठमांडू में सार्क का सम्मेलन हुआ, तो मेरे लिए यादें ताजा हुईं आईसी, 814 की। याद कीजिए कि किस तरह पाकिस्तानी आतंकियों ने 24 दिसंबर, 1999 की शाम को काठमांडू से इंडियन एयरलाइंस का वह विमान अगवा किया था? किस तरह हमारी सरकार को उनके सामने घुटने टेकने पड़े थे उन यात्रियों की जान बचाने के लिए, जो काठमांडू से दिल्ली वापस उस विमान से आ रहे थे। पाकिस्तान में आज भी मौलाना मसूद अजहर पर वहां की सरकार ने कोई मुकदमा नहीं किया है, बावजूद इसके कि हमारी संसद पर हमला उस मौलाना की जेहादी संस्था ने किया था। मौलाना के भाई ने आईसी, 814 को अगवा किया उन्हें भड़वाल जेल से छुड़वाने के लिए। उनके साथ रिहा हुए उमर शेख, जिसने अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल को मारा। इस घिनौने अपराध के लिए वह जेल में है, पर न्याय होगा कि नहीं इस बर्बर जेहादी के साथ, कौन जाने?
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क्या पाकिस्तान सरकार बता सकती है कि क्यों ऐसे लोगों को उनके देश में पनाह मिलती है, जो भारत के दुश्मन हैं? वह बता सकती है, क्यों हाफिज सईद जैसे लोग आज भी खुलकर ऐसे भाषण देते हैं, जिनका एक ही संदेश है-भारत को तबाह करना? हाफिज सईद के अलावा कई अन्य लोग शामिल थे 26/11 के हमले में। अजमल कसाब और उनके साथी सिर्फ प्यादे थे, जो हर कदम पर पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं के हुक्म का पालन कर रहे थे। उन आकाओं की आवाजें हमारी सरकार ने टेप की हैं, पर जब भी उनके बारे में पाकिस्तान से पूछा जाता है, तो कोई जवाब नहीं मिलता। आज हम जानते हैं डेविड हेडली के बयानों से, कि 26/11 की साजिश आईएसआई ने रची थी। पर आज तक न पाक सेनाध्यक्ष ने कोई जवाब दिया है हमें, न ही प्रधानमंत्री ने। तो मोदी बात कर लेते काठमांडू में शरीफ से, तो क्या हासिल हो जाता?


सोनिया-मनमोहन सरकार के सलाहकार ऐसे थे, जो पाकिस्तान को उदार नजरों से देखा करते थे। आज भी मणिशंकर अय्यर और दिग्विजय सिंह की सलाह यही है कि बातचीत का सिलसिला जारी रखना चाहिए, वर्ना दुश्मनी और बढ़ जाएगी। क्या हमारी सरकार को डर के मारे बातचीत करनी चाहिए? क्या वक्त नहीं अब असली बातचीत करने का या बातचीत का ढोंग बंद कर देने का? ढोंगी बातचीत का सिलसिला रोककर बहुत अच्छा किया गया है।

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