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आतंकवाद पर राजनीति क्यों
अरुण नेहरू
Updated Fri, 15 Feb 2013 09:22 PM IST
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अफजल गुरु को फांसी देने के साथ ही संसद पर बर्बर हमले का अध्याय समाप्त हो चुका है। संसद पर हुए हमले के प्रसंग में पहले भी कई बार उन जांबाज पुरुषों और महिलाओं के बारे में लिखा गया है, जो हमले का प्रतिरोध करते हुए पहले चरण में ही शहीद हो गए। हम उनकी बहादुरी को सलाम करते हैं, मगर उनके परिजनों ने जो खोया है, उसकी भरपाई शब्दों से नहीं की जा सकती। यह राजनीति करने का वक्त नहीं है।
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लोगों के नजरिये में आए बदलाव को देखकर खुशी होती है। सीमापार के आतंकी गुट लोगों के इस बदले रवैये को देखकर हताश हैं। हुर्रियत के अलगाववादी रवैये को हमने देखा ही है, और अब हमने हाफिज सईद के साथ यासीन मलिक को एक मंच पर भी देखा। इन चीजों को ज्यादा दिनों तक न तो बर्दाश्त किया जाएगा और न ही जनमत को दबाया जा सकेगा।
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वैसे इस प्रतिकूल समय में कुछ सकारात्मक संकेत भी मिल रहे हैं। मसलन, केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला ने यह कहकर देश को गौरवान्वित किया है कि पूरी प्रक्रिया का पालन करके ही अफजल गुरु को फांसी दी गई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि अफजल गुरु को फांसी देने में देरी हुई। ऐसा ही पंजाब में मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे एवं तमिलनाडु में राजीव गांधी की हत्या के दोषियों के साथ हुआ है।
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हालांकि यह भी सच है कि देश एवं देश से बाहर एक बहुत बड़ी लॉबी है, जो मृत्युदंड का विरोध करती है। लेकिन इसमें चकित होने वाली कोई बात नहीं। केंद्र में एक गठबंधन सरकार है, जिसमें किसी भी पार्टी को कुल मतों का 30 फीसदी से ज्यादा हासिल नहीं है। ऐसे में लोगों में व्याप्त मतभिन्नता पर भला हैरानी क्यों हो। दरअसल केंद्र सरकार को मिला खंडित जनादेश ही निर्णय लेने की प्रक्रिया को जटिल बनाता है।
हम बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। देखिए, कैसे एक घटना से दूसरी घटना की कड़ी जुड़ जाती है। उसी तरह एक के बाद दूसरे पुराने कानून भी खत्म होते जाएंगे। इस व्यवस्था में सार्वजनिक जांच से कोई ऊपर नहीं है। हमने अभी-अभी हाई कोर्ट के उस जज पर किया गया स्टिंग ऑपरेशन देखा, जिन्होंने 2005 में सूर्यनेल्ली बलात्कार मामले में फैसला सुनाते हुए 35 आरोपियों को बरी कर दिया था। इस इंटरव्यू को लाखों लोगों ने देखा होगा।
जाहिर है, उस न्यायाधीश को काफी सवालों का जवाब देना होगा, क्योंकि यह विवाद यहीं खत्म नहीं होगा। बलात्कार पीड़िता और उसके परिजनों की दृढ़ता भी देखिए, जिसके बूते वे दो दशकों से लड़ रहे हैं। यहां तक कि राज्यसभा के सभापति पीजे कुरियन को भी, जिनका नाम आरोपियों की सूची में नहीं है और जिन्हें अदालत ने भी निर्दोष बताया है, इस मामले में घसीट लिया गया है। इस मुद्दे पर कांग्रेस और माकपा के बीच सड़कों पर घमासान मचा हुआ है।
यह मुद्दा भले नहीं दबेगा, लेकिन कई अन्य दबे हुए मुद्दे इसकी जगह ले लेंगे, क्योंकि यह अपनी निर्णायक परिणति तक पहुंच चुका है। अब कई परिवार और लोग साहस जुटाकर आगे आएंगे, जिन्होने अतीत में मुश्किलों का सामना किया है। मुझे लगता है कि केरल के इस मामले की प्रारंभिक समीक्षा को सुगम बनाकर देश के प्रधान न्यायाधीश ने एक स्वागतयोग्य कदम उठाया है। हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि त्वरित न्याय के लिए फास्ट्र ट्रैक कोर्ट की तर्ज पर निचली अदालतों के फैसलों की न्यायिक पुनर्समीक्षा के लिए भी ऐसी अदालतों की शुरुआत होगी।
त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव संपन्न हो गए हैं और नगालैंड एवं मेघालय में होनेवाले हैं। दुखद है कि मीडिया में इसकी बहुत कम चर्चा है। लेकिन यह देखना अच्छा था कि राहुल गांधी ने त्रिपुरा का व्यापक दौरा किया और ऐसा ही वह नगालैंड एवं मेघालय में भी करेंगे। मगर मेरी दिलचस्पी पश्चिम बंगाल को लेकर है, जहां हिंसक घटनाएं हो रही हैं। क्या वहां कानून का राज है?
मैं वहां के राजनीतिक यथार्थ और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हिंसा से वाकिफ हूं, लेकिन अभी जैसी अराजकता हम देख रहे हैं, वह बताती है कि चीजें नियंत्रण से बाहर चली गई हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अनियंत्रित क्रोध की झलक दिखाई है और उनकी पार्टी चुप है, क्योंकि उसमें स्वतंत्र राय व्यक्त कर पाने में कुछ ही लोग सफल होंगे। लगता है कि ममता बनर्जी के करिश्माई व्यक्तित्व से अब लोगों को ज्यादा उम्मीदें नहीं रह गई हैं। तो क्या हम आने वाले दिनों में वहां किसी भी चुनाव में बढ़ती हुई हिंसा देखेंगे?
सत्ता के गलियारों में हम एक अजीब-सी चुप्पी देखते हैं, मानो हर किसी को एक छिपे हुए टेप रिकॉर्डर की तलाश हो। कोई भी गोपनीयता के कानून को लेकर स्पष्ट नहीं है। आयकर या अन्य विभागों के अधिकारियों ने नीरा राडिया की बातचीत के 5,000 घंटे जिस तरह टेप किए थे, मुझे इस पर आपत्ति थी। क्या सीबीआई या इंटेलिजेंस ब्यूरो को निजी बातचीत टेप करने का अधिकार है?
मैं यह सोचकर हैरान हूं कि अगर सेंट्रल हॉल में छिपा हुआ टेप रिकॉर्डर लगा दिया जाए, तो क्या होगा, जहां मिनटों में सरकार बनाने और गिराने की बातें सामान्य हैं! 2जी मामले में एक अज्ञात टेप मिला, जो एक बड़े व्यवसायी और एक कानूनी अधिकारी पर उंगली उठाता है। क्या हम इस तरह के स्टिंग ऑपरेशन को प्रोत्साहित नहीं कर रहे हैं, जिसे किसी विरोधी व्यवसायी ने ही अंजाम दिया होगा?