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पुलिस का सौतेला व्यवहार क्यों

Fri, 16 Oct 2015 06:19 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Fri, 16 Oct 2015 06:19 PM IST
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Why police discriminated

उत्तर प्रदेश सांप्रदायिक हिंसा, दलित उत्पीड़न, राजनीतिक अपराधीकरण और महिलाओं के साथ होने वाले दुराचार और अत्याचार से संबंधित घटनाओं के लिए अक्सर सुर्खियों में रहता है। बहुत-सी घटनाओं में पुलिस और प्रशासन की भूमिका काफी असंतोषजनक मालूम पड़ती है। हालांकि तथ्य यह भी है कि प्रदेश में आबादी के अनुपात में पुलिस बल काफी कम है और उन्हें नेताओं की सुरक्षा में लगे रहना पड़ता है। फिर भी पुलिस और प्रशासन का महिलाओं के प्रति रवैया न केवल संवेदनहीन और सौतेला होता है, बल्कि कभी-कभी व्यभिचारी भी। खासकर दलित और गरीब औरतों के प्रति तो उनका रवैया बहुत ही अन्यायपूर्ण होता है। हाल की दो घटनाओं में यह सौतेला व्यवहार स्पष्ट देखने को मिला।

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पहली घटना गौतमबुद्ध नगर (ग्रेटर नोएडा) के दनकौर कस्बे की है, तो दूसरी मैनपुरी जिले के करहल की। दनकौर के पास अट्टा गुर्जन गांव में दलित समाज के सुनील गौतम अपने परिवार के साथ रहते हैं। उनका इलाके के प्रभावशाली व्यक्ति महेंद्र गूजर के साथ जमीन को लेकर विवाद चल रहा है। सुनील इस मामले की रिपोर्ट वर्ष 2014 में दनकौर थाने में दर्ज करा चुके हैं और उनका कहना है कि कई बार रिपोर्ट लिखाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। छह अक्तूबर की शाम को जब सुनील अपने भाई के साथ खेत में पानी डाल रहे थे, तो कुछ गुंडे आए, जिन्होंने उनके साथ मारपीट की, उनकी मोटर साइकिल, दो मोबाइल और कुछ पैसे छीन लिए। जातिसूचक गालियां दी और धमकी देते हुए चले गए। दोनों भाई ने दनकौर थाने में रिपोर्ट लिखाई और कार्रवाई करने की दरख्वास्त की। पुलिस का कहना है कि उन्होंने रिपोर्ट लिख दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की।
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कोई कार्रवाई न होने पर सुनील थाने के सामने ही स्थित अपनी दुकान के आगे पूरे परिवार के साथ धरने पर बैठ गए। पुलिस ने जबर्दस्ती उन्हें हटाने की कोशिश की। अपनी निराशा और प्रतिरोध को व्यक्त करने के लिए सुनील और उसके परिवार के लोग निर्वस्त्र हो गए।
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फिर तो पुलिस ने उनके खिलाफ हर तरह का आरोप लगाया और महिलाओं और बच्चों समेत पूरे परिवार को जेल भेज दिया। उनके खिलाफ ऐसी धाराओं के तहत मुकदमे दर्ज किए गए, जिनमें लंबे समय तक जमानत नहीं होती। शायद प्रदेश में यह अनोखी घटना है, जिसमें छोटे-छोटे बच्चों को भी जेल भेज दिया गया। वहां मौजूद पत्रकारों ने भी विरोध नहीं जताया। सुनील की मोटर साइकिल और मोबाइल का क्या हुआ, इसकी चर्चा तक नहीं होती। अभी तक वे सब जेल में बंद हैं। दूसरी घटना मैनपुरी के करहल की है, जहां पिछले दिनों गौकशी की अफवाह से दंगे की स्थिति पैदा हो गई। दो लोग मरते-मरते बचे, कई गाड़ियां जलाई गईं और अल्पसंख्यकों की कई दुकानें बर्बाद कर दी गईं। पुलिस ने कई लोगों को जिम्मेदार ठहराया है, जिनमें सपा से संबंधित लोग भी आरोपी हैं और मुख्य आरोपी हैं-स्थानीय भाजपा नेता अवनीश कुमार। अवनीश कुमार को जब पुलिस पकड़ने गई, तो वह घर पर नहीं थे, उनकी पार्षद मां और पत्नी को पकड़कर पुलिस थाने ले गई। एक रिपोर्ट के अनुसार, जब पुलिस उनके घर पहुंची, तो महिलाओं ने उन पर पथराव किया। इन दोनों पर यह भी आरोप है कि उन्होंने उस जुलूस का भी नेतृत्व किया, जिसमें महिलाएं भड़काऊ नारे लगा रही थीं। थाने में मौजूद पत्रकारों ने जिलाधिकारी को फोन कर आपत्ति जताई, तो दोनों महिलाओं को थाने से ही छोड़ दिया गया। करहल की महिलाओं को छोड़ने में पुलिस ने जैसी तत्परता दिखाई और ऐसा ही व्यवहार सुनील के घरवालों और महिलाओं के साथ होता, तो कितना अच्छा होता!

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