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बदलाव लाने की शुरुआत साफ-सफाई से क्यों नहीं

Sun, 20 Jul 2014 06:31 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 20 Jul 2014 06:31 PM IST
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Why not change from the beginning of the clean-up

नए प्रधानमंत्री हैं, नई सरकार, नए सपने परिवर्तन के लिए, लेकिन अफसोस कि अभी तक इस नएपन के आने से बदली नहीं है भारत की तस्वीर दुनिया की नजरों में। जब भी अपने देश का जिक्र दुनिया की बड़े अखबारों में होता है, तो अक्सर वजहें होती हैं हमारी कोई खराबी। पिछले सप्ताह प्रख्यात अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स के पहले पन्ने पर मैंने पढ़ी कहानी विवेक की, जो रहता है बिहार में शिवहर जिले के एक गांव में। एक वर्ष के विवेक के खुराक में कोई कमी नहीं है, फिर भी वह कुपोषित और अस्वस्थ है।

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डॉक्टरों के मुताबिक, विवेक के अस्वस्थ होने की वजह है गांव में फैली गंदगी, जिसका मुख्य कारण है शौचालयों का अभाव। ऐसे में गांव में फैली रहती हैं गंदगी, जिससे फैलती है ऐसी बीमारियां, जो न सिर्फ बच्चों को कुपोषित करती हैं, बल्कि उनके शारीरिक विकास को भी रोक देती हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 65 प्रतिशत भारतीय बच्चे पांच वर्ष तक पहुंचने से पहले ही ऐसी बीमारियों के शिकार बनते हैं कि उम्र भर उनका कद ठिगना रहता है।
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यह गंदगी सिर्फ शरीर को ही नुकसान नहीं करती। इससे पैदा होने वाली बीमारियों का असर इन बच्चों के दिमाग में भी पहुंचता है। ये बच्चे जब स्कूल जाते हैं, तो लिखने-पढ़ने में पीछे रह जाते हैं। बच्चों की यह शर्मनाक स्थिति सिर्फ गरीबी के कारण हुई होती, तो शायद हम बर्दाश्त कर लेते, पर ऐसा नहीं है। हमसे गरीब बांग्लादेश साफ-सफाई के मामले में हमसे बहुत आगे निकल चुका है। केवल तीन प्रतिशत बांग्लादेशी खुली जगह में शौच करते हैं। जबकि अपने देश में शौचालयों से वंचित लोगों की संख्या बहुत अधिक है। इस गंदगी का असर दिखता है हमारे बच्चों के स्वास्थ्य पर, हमारी नदियों में, हमारे शहरों-कस्बों में, हमारी रेल पटरियों पर, लेकिन सबसे नुकसानदेह स्थिति है हमारे गांवों की।
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यह स्थिति इसलिए बनी, क्योंकि हमारे राजनेताओं ने कभी ध्यान ही नहीं दिया स्वास्थ्य, सफाई जैसे मुद्दों पर। गंदगी का सारा दोष गरीबी पर डालते आए हैं ये राजनेता। गांधी जी के बाद अगर किसी बड़े नेता ने स्वच्छता पर ध्यान दिया है राष्ट्रीय स्तर पर, तो वह हैं नरेंद्र मोदी। चुनाव जीतने के अगले दिन जब वह बनारस गए थे गंगा आरती करने, तो वहां भी उन्होंने गंगा के मैली होने पर अफसोस जताया। माना कि इतनी जल्दी व्यवस्था में बदलाव ला पाना मोदी जैसे राजनेता के लिए भी कठिन होगा, पर यह समस्या इतनी गंभीर है कि इसका सामना उन्हें करना पड़ेगा युद्ध स्तर पर।


उन्हें तमाम मुख्यमंत्रियों को दिल्ली बुलाकर समझाना चाहिए कि गंदगी की वजह से देश को कितना नुकसान हो रहा है। इसके लिए केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य और पर्यावरण मंत्रियों की एक समिति बन सकती है, जिसका मुख्य लक्ष्य होना चाहिए हर घर में निजी शौचालय का निर्माण अगले पांच वर्षों में। साथ-साथ उनको सौंप देना चाहिए नदियों, शहरों और देहातों में स्वच्छता लाने का काम। ऐसा अगर करते हैं प्रधानमंत्री, तो नीचे तक संदेश पहुंचेगा कि उनकी नजरों में यह काम उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना आर्थिक सुधार है, जितना देश का विकास है और जितनी देश की सुरक्षा है। परिवर्तन के सपनों को यथार्थ में बदलना चाहते हैं प्रधानमंत्री जी, तो शुरुआत सफाई से कीजिए।

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