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मायावती क्यों बनना चाहती हैं बौद्ध
क्षमा शर्मा
Updated Tue, 31 Oct 2017 09:00 AM IST
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क्षमा शर्मा
मायावती ने एक जनसभा में कहा कि भाजपा ने अगर दलित, पिछड़ों और आदिवासियों के प्रति अपनी सोच नहीं बदली, तो वह हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लेंगी। याद रहे कि बाबा साहब अंबेडकर ने भी हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया था। मायावती के कथन को तरह-तरह की राजनीति से जोड़ा जा रहा है। क्या उनके कथन में कुछ सच्चाई है?
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निश्चित रूप से हां। आखिर इस देश की उच्च जातियां, साधन-संपन्न लोग बदलना क्यों नहीं चाहते? हाल ही में गुजरात के युवा दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वह सरकार से मांग करते हैं कि गुजरात के बारह हजार गांव जहां दलित रहते हैं, उनमें से सिर्फ किसी एक गांव को ही छुआछूत से मुक्त करके दिखा दें। गुजरात में ही कुछ दिन पहले दलितों को अपने अलग श्मशान के लिए जगह दी गई थी, तो दलितों ने इसका जश्न मनाया था। देखिए कि श्मशान जहां अपने किसी प्रिय के बिछुड़ने पर जाना पड़ता है, वहां भी इस तरह का भेदभाव।
क्या ये सब फालतू बातें हैं कि हम सब बहुत अहिंसक हैं? भाजपा नेता तरुण विजय ने भी उत्तराखंड के एक मंदिर में दलितों को प्रवेश दिलाया था। इसके लिए उन्हें पत्थरबाजी झेलनी पड़ी थी। वह घायल भी हुए थे। हाल ही में केरल में छह दलितों को विभिन्न मंदिरों का पुजारी बनाया गया है। इसका समाज के बहुत से लोगों ने स्वागत भी किया है। लेकिन कहीं यह बदलाव भी मात्र प्रतीकात्मक होकर न रह जाए, क्योंकि कोई भी बदलाव मनुष्य के भीतर से आता है। और समाज जब तक कुल, गोत्र, जाति की बंदिशों में कैद है, तब तक जाति कैसे टूटे?
यदि यह भेदभाव खत्म नहीं हो सकता, तो फिर वे क्यों खुद को हिंदू मानें। उन्हें मंदिर में न घुसने देने के लिए सौ तरह के बहाने क्यों? सारे अधिकार और मंदिरों में घुसने की इजाजत सिर्फ उच्च वर्णों को ही क्यों? और यदि उच्च वर्णों को लगता है कि वे तो ऐसा ही करते रहेंगे और नहीं बदलेंगे, तो दलितों को धर्म बदलने से कौन रोक सकता है? वे उस धर्म में क्यों रहें, जो उन्हें हर तरह का अपमान और भेदभाव तो सौंपता है, मगर अधिकार कोई नहीं देता?
अपने अंतिम दिनों में अंबेडकर ने यह महसूस किया था कि हिंदुओं की जाति की जकड़बंदी को तोड़ना आसान नहीं है। इसीलिए उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया था। मायावती ऐसा महसूस कर रही हैं, तो भला क्या गलत कर रही हैं? आज भी बहुसंख्यक दलित बेहद गरीब हैं। वे मामूली-सी सुविधाओं से भी वंचित हैं। बल्कि आरक्षण का लाभ भी इनमें से बहुतों को नहीं मिलता, क्योंकि दलितों में जो सबसे गरीब है, वह सफाई कर्मचारी वर्ग है। इनको आगे बढ़ाना कोई नहीं चाहता। यहां तक कि पाकिस्तान तक में इनका धर्म परिवर्तन कोई नहीं करवाता, क्योंकि ये न हों, तो कूड़ा कौन उठाए? सफाई कौन करे? हमने मान लिया है न कि कूड़ा और गंदगी हम करेंगे और उसे साफ कोई और करेगा। जिस सोसाइटी में यह लेखिका रहती है, वहां इसने अपनी आंखों से कई दशकों से ऐसा करते देखा है। जब एक किशोर जो कि एक मशहूर स्कूल में पढ़ता है, उससे ऐसा करने का कारण पूछा तो उसने कहा कि और कौन हमें काम देता है। इस किशोर की बात सुनकर मन खिन्नता से भर उठा।
अरसे से देश में जाति तोड़ो आंदोलन चलते रहे हैं, मगर जाति और छुआछूत की जड़ें इतनी गहरी हैं कि वे खत्म ही नहीं होतीं। और अफसोसनाक बात यह भी है कि दलितों के बीच भी काफी छुआछूत पाया जाता है। ये कैसे खत्म हो, समझ में नहीं आता।