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इतना कुंठित क्यों है चीन

Tue, 27 Dec 2016 11:06 AM IST
ajay setia अजय सेतिया
Updated Tue, 27 Dec 2016 11:06 AM IST
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Why is China so frustrated
अजय सेतिया

दुनिया भर के बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए विगत 10-11 दिसंबर को राष्ट्रपति भवन में उच्च स्तरीय मंथन हुआ था, जिसमें कई नोबेल पुरस्कार विजेताओं और कई राष्ट्रों के उच्च पदस्थ नेताओं ने हिस्सा लिया। भारत में इस तरह का यह पहला आयोजन था। वर्ष 2014 का नोबेल शांति पुरस्कार चूंकि कैलाश सत्यार्थी को मिला था, इसलिए इतना बड़ा सम्मेलन भारत में संभव हो सका। इस कार्यक्रम में नोबेल पुरस्कार प्राप्त दलाई लामा को भी न्योता दिया गया था। असल में दलाई लामा ही इस दो दिवसीय कार्यक्रम में आकर्षण का केंद्र बन गए थे। न्योता तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी दिया गया था। लेकिन वह नहीं आए। यह नहीं कहा जा सकता कि उन पर भारत की चीन लॉबी ने कार्यक्रम में न जाने का दबाव बनाया था या नहीं। दो दिन तक दलाई लामा का भव्य स्वागत जिस तरह चीन के गले की हड्डी बन गया है, उससे यह आशंका पैदा होती है।


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मोदी सरकार की ओर से बलूचिस्तान का समर्थन करने से भयभीत चीन की दलाई लामा पर प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि चीन कूटनीति और बच्चों के कार्यक्रम में अंतर नहीं कर पा रहा। चीन ने पहले भारत से आधिकारिक विरोध प्रकट किया और अब वहां के अखबारों में भारत के खिलाफ लेख लिखे जा रहे हैं। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने भारत को बिगड़ैल बच्चा बताते हुए लिखा कि भारत के पास महान देश बनने की क्षमता तो है, लेकिन इस देश का विजन दूरदर्शी नहीं है। चीन ने इस मामले में मंगोलिया का उदाहरण दिया है। गौरतलब है कि दलाई लामा की मेहमाननवाजी कर चीन का कोप झेलने के बाद मंगोलिया ने कहा है कि वह तिब्बती धर्मगुरु को दोबारा देश का दौरा करने की इजाजत नहीं देगा।

दरअसल भारत की नई बलूचिस्तान नीति और चीन-पाक आर्थिक कॉरिडोर के विरोध ने चीन को परेशान कर रखा है। दलाई लामा के राष्ट्रपति भवन जाने के मुद्दे पर चीन ने जब विगत 16 दिसंबर को विरोध प्रकट किया था, तब भारत ने उसे सीधे-सीधे खारिज करते हुए कहा था कि दलाई लामा सम्मानित नेता हैं और वह मुलाकात एक गैर राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान हुई।

हालांकि एनडीए की पूर्व वाजपेयी सरकार ने तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग मानकर दलाई लामा की तिब्बत को स्वतंत्र करवाने या चीन के भीतर ही स्वायत राज्य बनाने की कोशिशों को बड़ा धक्का पहुंचाया था। पर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके तेवर देखते हुए भारत और चीन में अविश्वास ज्यादा गहरा हुआ है। खासकर मोदी की ओर से बलूचिस्तान की आजादी का समर्थन दिए जाने के बाद चीन ज्यादा आशंकित है, क्योंकि बलूचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह बनाने और उसे सिल्क रूट से जोड़ने के कारण चीन के आर्थिक हित जुड़े हुए हैं।

बलूचिस्तान का जिक्र किए बगैर अपने आर्थिक हितों पर चिंतित ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, भारत कभी-कभी बिगड़ैल बच्चे की तरह बर्ताव करता है और ‘दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र’ के तमगे की वजह से काफी उत्साहित महसूस करता है। चीन की प्रतिक्रिया बताती है कि वह दलाई लामा की एक-एक गतिविधि पर नजर रखता है। पर बीजिंग को समझना चाहिए कि उसका यह रवैया अपने देश में तो ठीक है, पर भारत की गतिविधियों पर इस तरह नजर रखना और बच्चों के भविष्य से जुड़े एक कार्यक्रम में दलाई लामा की मौजूदगी पर सवाल उठाना उसकी कुंठित मानसिकता का ही सबूत माना जाएगा।

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