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डीजल सब्सिडी पर ही ऐतराज क्यों

Fri, 18 Jan 2013 09:06 PM IST
Updated Fri, 18 Jan 2013 09:06 PM IST
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why diesel subsidy in question
एनडीए सरकार में पेट्रोलियम राज्यमंत्री रहे संतोष गंगवार का कहना कि यूपीए सरकार ने डीजल की कीमतें तय करने का मामला तेल कंपनियों के हवाले कर जन-विरोधी कार्य किया है। इससे महंगाई से पहले से बेहाल लोगों की परेशानी और बढ़ेगी। इस मुद्दे पर उनसे हरीश लखेड़ा ने बातचीत की -
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- केंद्र सरकार ने पेट्रोल के बाद अब डीजल की कीमतें तय करने का मामला तेल कंपनियों पर छोड़ दिया है। इस फैसले से आपको क्या नफा-नुकसान दिख रहा है?
इससे तो नुकसान ही नुकसान है, फायदा एक भी नहीं दिख रहा। डीजल की कीमत बढ़ाने से सबसे पहले तो सड़क यातायात महंगा हो जाएगा। और फिर माल ढुलाई भी महंगी होगी। इससे महंगाई तेजी से और बढ़ेगी, जो पहले ही नियंत्रण से बाहर है। इससे आम आदमी की मुसीबतें सबसे ज्यादा बढ़ेंगी।

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- सरकार का कहना है कि तेल कंपनियां लगातार घाटे में चल रही हैं और सब्सिडी के बोझ को ज्यादा उठा पाना संभव नहीं है।
सरकार का यह तर्क गलत है। कांग्रेस की यह दलील भी पुरानी है। हम चाहते हैं कि सरकार तेल कंपनियों की बैलेंस शीट निकाल कर दिखाए। इससे सच्चाई सामने आ जाएगी। वस्तुतः सरकार पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाकर अपना खजाना भरना चाहती है। दुनिया की हर सरकार सब्सिडी देती है। इसलिए सब्सिडी पर सरकार का विलाप सही नहीं। वह यह क्यों भूल जाती है कि उसे पेट्रोलियम पदाथों की बिक्री से टैक्स के तौर पर सालाना कम से कम एक लाख करोड़ रुपये का राजस्व भी मिलेगा। सरकार अन्य अनुत्पादक मामलों में भी सब्सिडी देती है। कर्ज माफी के तौर पर भी करोड़ों रुपये देती है। तो फिर डीजल के लिए ही क्यों इंकार कर रही है।
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- कांग्रेस का कहना है कि एनडीए के शासन में भी पेट्रो पदार्थों के दाम बढ़ाए जाते रहे हैं।
बेशक दाम बढ़ाए गए थे, लेकिन हमने घटाए भी थे। उस दौर में रसोई गैस कनेक्शन के लिए लोगों को इंतजार नहीं करना पड़ता था। आवेदन करते ही कनेक्शन मिल जाता था। लोगों को जरूरत भर सिलेंडर मिल जाते थे। अब यूपीए सरकार ने साल भर के लिए पहले तो छह सिलेंडर किए, अब नौ कर दिए हैं। मेरा मानना है कि पहले तो यह सीमा ही खत्म कर देनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं करते हैं, तो भी प्रत्येक परिवार को साल में कम से कम 12 सिलेंडर तो मिलने ही चाहिए। एक छोटे परिवार में महीने में एक सिलेंडर तो लग ही जाता है।


- आपकी नजर में तेल कंपनियों का घाटा कम करने का दूसरा उपाय क्या है?

सरकार को पेट्रो उत्पादों पर टैक्स कम करना चाहिए। भारत पेट्रोलियम पदार्थों पर सबसे ज्यादा टैक्स वसूलने वाले देशों में शामिल है। आज पेट्रोल की जो भी कीमत है, उसका लगभग आधा हिस्सा टैक्स के तौर पर सरकार के पास जाता है। सरकार को सबसे पहले अपनी हाइड्रोकार्बन नीति घोषित करनी चाहिए, जैसा कि हमने किया था। हमने हाइड्रोकार्बन की मांग-आपूर्ति व इसके उपायों को लेकर अगले 25 साल के लिए विजन दस्तावेज बनाया था। लेकिन यह सरकार आगे की नहीं सोचती।

- कहा जाता है कि डीजल का दाम कम रहने से लक्जरी गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है। सब्सिडी का फायदा इन महंगी कारों के मालिकों को क्यों मिलना चाहिए?
सरकार इन कारों पर टैक्स बढ़ा सकती है। आज बड़े लोग पांच से छह कारें रखते हैं। पर सरकार के पास तो कोई नीति ही नहीं है। यह हर मामले में विफल है।

- अगले चुनाव में भाजपा सत्ता में आती है, तो पेट्रो उत्पादों पर पार्टी का रुख क्या रहेगा?

इन फैसलों की समीक्षा करेंगे। पुराने दौर को वापस लाते हुए ऐसे कदम उठाएंगे कि लोग सिलेंडरों की राशनिंग भूल जाएंगे।

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