तीन तलाक पर बहस क्यों
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तत्काल और मनमर्जी से तीन तलाक की गैर-इस्लामी प्रथा के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं के आंदोलन का हम समर्थन करते हैं। पिछले दशक में, मुस्लिम महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों ने इस मुद्दे पर अभियान चलाए हैं। इनमें हस्ताक्षर अभियान शामिल हैं, जिनके क्रम में लाखों लोगों ने इस घोर अन्यायपूर्ण प्रथा के खिलाफ हस्ताक्षर किए हैं। लेकिन, मुस्लिम समुदाय के ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे स्वयंभू प्रतिनिधियों ने उन लोगों की आवाजों को अनदेखा कर दिया है, जो निजी कानूनों में सुधार का समर्थन करते हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि खुद मुस्लिम समुदाय के अंदर अहले हदीस तथा शिया जैसे पंथ हैं, जो तत्काल तथा एकतरफा तलाक को वैध नहीं मानते हैं।
सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन याचिकाओं के चलते इस मुद्दे की ओर सबका ध्यान गया है। सुप्रीम कोर्ट के सामने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का हलफिया बयान इस बात की पुष्टि करता है कि उनके लिए इस मामले में समुदाय के अंदर से बदलाव की कोई गुंजाइश ही नहीं है। समुदाय के तथाकथित नेताओं के घोर पितृसत्तात्मक बयान यही दिखाते हैं कि वे इसे अपना बुनियादी कर्तव्य मानते हैं कि धार्मिक विश्वासों की रक्षा के नाम पर मर्द के विशेषाधिकारों की रक्षा करें और वह भी तब, जबकि दुनिया भर में करीब करीब कोई भी ऐसा मुस्लिम देश नहीं है, जहां ऐसी प्रथा चल रही हो। इसका संबंध धार्मिक विश्वासों से कम और मौजूदा विशेषाधिकारों की रक्षा करने से ही ज्यादा है। सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों को इस प्रथा के खत्म किए जाने की मांग का मजबूती से समर्थन करना चाहिए। लेकिन, इसके साथ ही साथ उन कोशिशों का भी मुकाबला किया जाना चाहिए जिसके जरिये अपने अधिकारों के लिए महिलाओं की गोलबंदी का इस्तेमाल कर, महिला अधिकारों के नाम पर सांप्रदायिक और मुस्लिमविरोधी एजेंडा को आगे बढ़ाने की मंशा दिखती है।
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि, 'पर्सनल लॉ का संविधान का अनुकूल होना जरूरी है।' विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 'धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र' की दुहाई दी है और कहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ अमानवीयता को स्वीकार करना नहीं है, आदि आदि। वे दावा कर रहे हैं कि अब मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार करने की जरूरत है, क्योंकि जहां तक हिंदू कानूनों का सवाल है, यह प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है।
सचाई यह है कि आज भी हिंदू निजी कानूनों में महिलाओं के साथ भेदभाव करने वाले प्रावधान बने हुए हैं, जैसे हिंदू उत्तराधिकार कानून, अभिभावकत्व तथा दत्तक कानून, आदि में। मोदी सरकार कानूनों को संविधान के अनुरूप बनाने की फिक्र क्यों नहीं करती? वे जब धर्मनिरपेक्ष कानूनों के लिए प्रतिबद्घता की बातें करते हैं, तो उनसे यह सवाल भी पूछा जाहिए कि राजस्थान में जब उनके संगी-साथी, सती प्रथा के पक्ष में तथा सतीविरोधी कानून के खिलाफ तलवारें चमका रहे थे, तब क्या वे महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए यह सब कर रहे थे? आज भी वे क्यों खाप पंचायतों की हिमायत कर रहे हैं और खाप पंचायतों के संविधानविरोधी फरमानों के खिलाफ कानून लाने से इंकार कर रहे हैं। और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं, जो इस सूची को काफी लंबा कर देंगे। नुक्ते की बात यह है कि सभी निजी कानूनों में सुधार किए जाने की जरूरत है। एक और पहलू यह है कि एक बार फिर भाजपा जान-बूझकर तत्काल तीन तलाक के मुद्दे को, समान नागरिक संहिता के मुद्दे के साथ गड्डमड्ड कर रही है।
विधि आयोग द्वारा जारी एक पूरी तरह से अनावश्यक प्रश्नावली के जरिये, जान-बूझकर समान नागरिक संहिता का मुद्दा उछाल जा रहा है। मिसाल के तौर पर इसमें, 'विभिन्न सांस्कृतिक आचारों में संगति लाने' के लक्ष्य का जिक्र किया गया है। लेकिन, यही तो 'एक संस्कृति, एक राष्ट्र' का सिद्घांत थोपने का हिंदुत्ववादी एजेंडा है, ताकि भारत की बहुलतावादी संस्कृतियों को नष्ट किया जा सके। इसका महिलाओं के अधिकारों से कुछ लेना-देना नहीं है।
संविधान के मार्गदर्शक सिद्घांतों में, अनुच्छेद-44 में कहा गया है कि, 'शासन समूचे भारतीय भूभाग में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता हासिल करने के लिए प्रयास करेगा।' अनेक मौकों पर सुप्रीम कोर्ट की अनेक पीठ इस पर असंतोष भी प्रकट कर चुकी हैं कि केंद्र सरकार ने इस निर्देश के पालन के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं।
समान नागरिक संहिता के निर्देश के केंद्र में क्या है? इसमें यह संभावित जनतांत्रिक अंतर्वस्तु है कि सभी समुदायों के अंदर औरत-मर्द के बीच बराबरी हो। भारत में इनमें से किसी भी स्तर पर बराबरी तक पहुंचने के लिए हमें लंबी दूरी तय करनी होगी। जहां तक दूसरे पहलू यानी नागरिकों के रूप में सभी समुदायों के लिए बराबरी का सवाल है, संविधान के जरिये मुहैया कराया गया कानूनी ढांचा तो धर्म के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है, लेकिन सचाई कुछ और ही है। अगर समुदायों के बीच सचमुच बराबरी होती, तो सच्चर आयोग के निष्कर्षों तथा सिफारिशों की कोई जरूरत ही नहीं होती। इस आयोग के निष्कर्ष दिखाते हैं कि अनेक क्षेत्रों में भेदभाव तथा पूर्वाग्रहों के चलते मुस्लिम समुदाय, अनुसूचित जातियों व जनजातियों से भी ज्यादा वंचित है। सच्चर कमेटी ने एक समान अवसर आयोग के गठन की सिफारिश की थी। इसे लागू क्यों नहीं किया जा रहा है? रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट में मुसलमानों के लिए आरक्षण की सिफारिश की गई थी। लेकिन, मुस्लिम समुदाय के लिए तो सामाजिक तथा आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की गारंटी को भी लागू नहीं किया जा रहा है।