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किस आम पर किसका नाम
अशोक सण्ड
Updated Tue, 09 Jun 2015 07:24 PM IST
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जबसे यह खबर सुर्खियों में है कि पुलिस आम आदमी की सुरक्षा से बेखबर खास आदमी के बंगले पर 'आम' के पेड़ों की सुरक्षा में तैनात है, आम पर लिखते समय व्यंग्य लेखक के बजाय रसवादी लेखक का बोध हो रहा है। बादशाह सलामत की कोठी पर पैदा होने वाला फलों का राजा आम सिर्फ हिफाजत नहीं, बल्कि 'कौन असली हकदार है' के चलते भी खबरों में है। इस स्वादिष्ट फल पर बादशाह ने यदि फौज का पहरा बिठा दिया है, तो काहे का वितंडावाद। परिंदा तो दूर की बात है, वहां रहनेवाले लोग भी चख नहीं सकते इस सरकारी आम को।
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आम की हिफाजत चाचा गालिब के वक्त में भी होती थी। बादशाह हुजूर के बाग का आम बादशाह और बेगम के अलावा किसी और को मयस्सर नहीं था। गालिब जब कभी उस बाग से गुजरते बार-बार आम की तरफ गौर से देखते। इस कदर गौर से क्यों देखते हो इन आमों को, बादशाह ने एक दिन पूछ ही लिया। गालिब ने हाथ बांधकर अर्ज किया, हुजूर, देखता हूं कि क्या किसी आम पर मेरा या मेरे घरवालों का नाम भी लिखा है? यह सुनकर बादशाह अपनी हंसी रोक नहीं पाए, और उसी रोज एक टोकरा आम गालिब के घर भेज दिया गया था। मांझी साहब आम के साथ तैनात पुलिस को देख अपना सिर धुनते हों, तो भला किम आश्चर्यम।
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आज सहज याद आ रहा है अकबर इलाहाबादी का कलाम, नाम न कोई यार को पैगाम भेजिए/ इस फसल में जो भेजिए, बस आम भेजिए। अब कहां ऐसे यार हैं? न इस बार ऐसी फसल हुई, न उन्हें वाट्सअप से फुर्सत मिली। ऐसे में भला क्या कोई पैगाम भेजे, और क्या कोई आम! हकीकत तो यह है कि एक तरफ गुलाब के फूलों का ढेर महक रहा हो और दूसरी ओर आम की रेहड़ियां, तो आम की महक नाक में खलबली मचा देगी। केवल सौंदर्य और सुगंध से काम नहीं चलता। सौंदर्य पर पहरे बिठाए जा सकते हैं, लेकिन भइये स्वाद भी कोई चीज होती है।
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बहरहाल, 'ब्रेकिंग न्यूज' यह है कि इस बार अपने दाम के चलते 'खास' लोगों की पहुंच तक ही सिमट गया है आम।