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किसकी होगी दिल्ली

Mon, 12 Jan 2015 06:58 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Mon, 12 Jan 2015 06:58 PM IST
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Who will win Delhi

ऐतिहासिक रामलीला मैदान में नरेंद्र मोदी के भाषण के साथ ही भाजपा ने दिल्ली के महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव के प्रचार की शुरुआत कर दी है। इस प्रचार अभियान ने कुछ ही घंटों के भीतर वाराणसी से भी ज्यादा मोदी बनाम केजरीवाल का रूप ले लिया, जहां आम आदमी पार्टी के नेता भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के खिलाफ खड़े हुए थे।

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दिल्ली का चुनाव महज 70 सीटों वाले विधानसभा का चुनाव ही नहीं है। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है, इसलिए अन्य छोटे राज्यों की तुलना में यह न केवल सुर्खियों में रहेगा, बल्कि इस पर चर्चा भी ज्यादा होगी। पर दिल्ली का चुनाव सिर्फ इस कारण महत्वपूर्ण नहीं है। जबसे भाजपा ने लोकसभा का चुनाव जीता है, वह लगातार जीत रही है। विभिन्न राज्यों में उसकी जीत बताती हैं कि मोदी का जादू खत्म नहीं हुआ है। जैसे ही भाजपा कोई चुनाव हारेगी, वह अपना लय खो देगी। दिल्ली ही वह जगह है, जहां भाजपा उस आप के खिलाफ खड़ी है, जिसने दिसंबर, 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के 31 सीटों के मुकाबले अप्रत्याशित ढंग से 28 सीटें जीती थीं।
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यही कारण है कि महाराष्ट्र और हरियाणा या जम्मू-कश्मीर और झारखंड के साथ दिल्ली का चुनाव कराने से भाजपा हिचकती रही। दिल्ली को लेकर अपनी घबराहट और अनिश्चतता छिपाने के लिए वह लगातार चुनाव टालती रही।
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जहां तक आप की बात है, उसके लिए यह एक अवसर है। एक नई राजनीतिक ताकत होने के कारण यदि उसे जीत मिलती है या उसका प्रदर्शन बेहतर रहता है, तो यह देश भर के उन तमाम क्षेत्रीय दलों को हिम्मत देगा, जो आज आत्मविश्वास से भरपूर भाजपा के सम्मुख बेदम हैं। लालू यादव और नीतीश कुमार को इस वर्ष के अंत में भाजपा का सामना करना है, जबकि ममता बनर्जी, जयललिता, तरुण गोगोई और प्रकाश सिंह बादल को 2016 में राज्य विधानसभा के चुनाव का सामना करना है। दिल्ली का चुनावी नतीजा भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों की एकता को भी बढ़ावा दे सकता है।

इस तरह से फरवरी में होने वाले दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भाजपा का बड़ा दांव लगा है। कुछ लोगों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर में सरकार गठन को फिलहाल इसी कारण स्थगित किया गया है, जहां पीडीपी और भाजपा के बीच समझौता लगभग होने ही वाला था। लेकिन पीडीपी से हाथ मिलाने के लिए भाजपा को अनुच्छेद 370 को खत्म करने का विचार ठंडे बस्ते में डालना होगा, सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को रद्द करने को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी और पाकिस्तान के साथ बातचीत का रास्ता फिर से खोलने के लिए तैयार होना होगा, यानी अटल बिहारी वाजपेयी के रास्ते पर चलना होगा। पर दिल्ली चुनाव के मौजूदा समय में भाजपा ऐसा नहीं करना चाहती है।

हालांकि मोदी ने रामलीला मैदान में आप प्रमुख पर हमला करते हुए केजरीवाल का नाम नहीं लिया, सिर्फ आप का ही नाम लिया। यह लोकसभा चुनाव के विपरीत था, जब उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधा था। जाहिर है, इस बार कांग्रेस भाजपा की मुख्य विरोधी नहीं है।

अरविंद केजरीवाल ने 49 दिनों की सरकार का नेतृत्व करने के बाद जबसे मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दिया, आप ने विशेष रूप से उस मध्यवर्ग के बीच अपना जनाधार खो दिया है, जिसका उसकी सफलता में योगदान था। मध्यवर्ग को आप से काफी उम्मीदें थीं और वह उसे एक वैकल्पिक राजनीतिक ताकत मानता था। लेकिन केजरीवाल के इस्तीफा देने से उसने खुद को छला हुआ पाया।

यही वह भावना है, जिसे मोदी ने पिछले शनिवार को भड़काने का काम किया, जब उन्होंने कहा कि केजरीवाल अराजकतावादी हैं और उन्हें नक्सलियों से मिल जाना चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि केजरीवाल को धरना पर बैठने और विरोध प्रदर्शन करने में मास्टरी है, लेकिन दिल्ली में सरकार चलाने का हुनर उनके पास नहीं है। यह काम केवल भाजपा कर सकती है।

प्रधानमंत्री ने उस स्थल पर प्रहार किया, जहां सबसे अधिक चोट लग सकती है। हालांकि केजरीवाल ने खुद अपने इस्तीफे को एक 'गलती' माना, जो गुनाह नहीं था। वह किन्हीं आपराधिक गतिविधियों में लिप्त नहीं थे या घोटाला कर उन्होंने करोड़ों रुपये नहीं बनाए थे। वह एक गलत राजनीतिक फैसला लेने के दोषी थे, जो उनके लिए घातक साबित हुआ और जिसने शासन चलाने की उनकी और उनकी पार्टी की क्षमता पर सवाल उठाए। पर आज भी ज्यादातर लोग विरोध करने की उनकी क्षमता को रेखांकित करते हैं।

पर पिछले कुछ महीनों में इस अनुभवहीन पार्टी ने कुछ हद तक अपनी खोई हुई जमीन वापस पा ली है, और संसाधनों की कमी, मतभेद के चलते कुछ साथियों के पार्टी छोड़कर चले जाने जैसी परेशानियों के बावजूद केजरीवाल ने काफी काम किया है। बेशक उन्होंने मध्यवर्ग के एक बड़े तबके का समर्थन खो दिया है, पर उन्होंने उन अल्पसंख्यकों का समर्थन हासिल किया है, जिन्होंने पिछले विधानसभा या लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का साथ दिया था। आप उन किसानों का समर्थन पाने की भी कोशिश कर रही है, जो भूमि अधिग्रहण कानून को कमजोर किए जाने से खुश नहीं हैं और बाहरी दिल्ली के इलाके में एक दर्जन ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं, जहां किसानों की भूमिका अहम है। आप ने उन सरकारी कर्मचारियों के वोट बैंक में भी सेंध लगाई है, जो सेवानिवृत्ति की उम्र 60 से घटाकर 58 वर्ष करने के सरकार के प्रस्ताव से खुश नहीं हैं, जिसे हरियाणा सरकार ने मंजूरी दे दी है, हालांकि मोदी इसे विरोधियों द्वारा फैलाया गया 'झूठ' बता रहे हैं।

दिल्ली की लड़ाई भाजपा के लिए आसान नहीं लगती, हालांकि अभी उसका पलड़ा थोड़ा भारी दिखता है। पर देखने वाली बात होगी कि उसके विजय रथ का पहिया कहां जाकर रुकेगा। बहरहाल दिल्ली की लड़ाई शुरू हो चुकी है, जिसका प्रभाव दिल्ली से परे भी दिखेगा।

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