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लक्ष्मणरेखा कौन तय करेगा

Thu, 19 Mar 2015 07:08 PM IST
पुष्पेश पंत
पुष्पेश पंत Updated Thu, 19 Mar 2015 07:08 PM IST
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Who will decide Laxmanrekha

अभी कुछ दिन पहले एक बार फिर कार्यपालिका, विधायिका बनाम न्यायपालिका की बहस अचानक गर्म होती महसूस हुई। पर्यावरण पर केंद्रित एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग ले रहे एनडीए सरकार के एक मंत्री तथा सर्वोच्च न्यायालय के पीठासीन न्यायमूर्तियों के बीच नोकझोंक ने इस मामले में सांविधानिक प्रावधानों में गंभीर मतभेद को फिर उजागर किया। मंत्री महोदय ने इस मौके पर यह टिप्पणी करना जरूरी समझा कि न्यायपालिका अपनी लक्ष्मण रेखा को भूल अनावश्यक उत्साह के साथ सक्रिय होती जा रही है, जिससे विकास के काम में बाधा पड़ रही है। अपनी बारी आने पर बाद में बोलते हुए न्यायाधीश ने फटकार लगाने वाले अंदाज में कहा कि आप भले ही यह चाहते हों कि अदालत में हम आपकी इच्छानुसार फैसले सुनाएं, पर हम संविधान द्वारा सौंपी जिम्मेदारी का निर्वाह करते रहेंगे। अगर सरकार का कोई आदेश या संसद द्वारा पारित कानून इसका उल्लंघन करता है, तो उसे खारिज किया जाएगा।

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विकास और पर्यावरण वाली बहस नई नहीं। मोदी सरकार और पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के बीच किसी एक मुद्दे पर मतैक्य नजर आता है, तो वह यही है कि कहने को पर्यावरण की हिफाजत के लिए सरकार सक्रियता का प्रदर्शन करती रहे, वास्तव में यह अभियान पूंजी निवेश एवं औद्योगिकीकरण के रास्ते में रुकावट पैदा करने की जुर्रत नहीं कर सकता। जयराम रमेश हों या जयंती नटराजन, इनको औकात बताने में इनके आकाओं ने कोई कसर कभी नहीं छोड़ी।
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बहरहाल नरेंद्र मोदी पर धनाढ्य उद्यमियों पर आदतन मेहरबानी का लांछन लगाने वालों की कमी नहीं। अंबानी-अडानी आदि का कारोबार बढ़ाने के लिए यदि पर्यावरण संरक्षण से नजरें फिरानी भी पड़ जाएं, तो इसे इस तरह से तर्कसंगत ठहराया जाता है कि आखिर प्रकृति और पर्यावरण मनुष्य के लिए हैं, उसे पर्यावरण की वेदी पर बलि नहीं चढ़ाया जा सकता! खनिज संपदा का दोहन हो या भूमि अधिग्रहण-इन मामलों में पर्यावरण की क्षति या आम नागरिक के बुनियादी अधिकारों के हनन से ध्यान भटकाने के लिए नदियों की, नगरों की सफाई के विराट अश्वमेध सरीखे कार्यक्रमों का सूत्रपात निष्पक्ष विश्लेषण को कठिन बनाता है।
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सर्वोच्च न्यायालय अपने अनेक फैसलों में यह साफ कर चुका है कि जिंदा रहने के बुनियादी अधिकार का अर्थ मानवीय गरिमा के साथ जीवन यापन का अधिकार है। विकास के नाम पर पर्यावरण का विनाश इस बुनियादी अधिकार का उल्लंघन है। विकास में साधारण नागरिक की हिस्सेदारी तथा समाज के उत्पीड़ित-शोषित-उपेक्षित निर्बल तबके के अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी न्यायपालिका की है। उसके हस्तक्षेप को नाजायज सक्रियता या लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता।

ध्यान देने की बात यह है कि न्यायपालिका के साथ टकराव पर्यावरण तक सीमित नहीं। हाल के दिनों में कुछ और प्रसंगों ने हमें इस विषय में सोचने को मजबूर किया है। ग्रीनपीस की कार्यकर्ता प्रिया पिल्लै को विदेश जाने और देश के खिलाफ दुष्प्रचार से रोकने के लिए हवाई जहाज पर चढ़ने नहीं दिया गया। उन्होंने इसे अदालत में चुनौती दी और सरकार को कड़वे घूंट पीने पड़े। सरकारी अधिकारी यह हठ पाले हैं कि देश की सामरिक सुरक्षा के बारे में कोई समझौता नहीं किया जा सकता। कार्यपालिका अपने विशेषाधिकारों के प्रयोग के संदर्भ में किसी का भी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेगी। हमारे लिए यह याद रखना जरूरी है कि भारत में एक्जीक्यूटिव प्रिविलेज का वैसा कोई प्रावधान नहीं, जैसा अमेरिका में है। इसी तरह संसद की सर्वोच्च सत्ता या उसकी संप्रभुता की बात करने वाले यह बात भुला देते हैं कि संसद और न्यायपालिका, दोनों संविधान की संतानें हैं।

इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि संविधान की व्याख्या का अधिकार किसी और को नहीं, सर्वोच्च न्यायालय को ही है। संविधान के बुनियादी ढांचे में संशोधन नहीं किया जा सकता वाले सिद्धांत का प्रतिपादन भी सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ ने ही किया है। विचित्र चक्र यह है कि न्यायपालिका के पर कतरने के लिए संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, परंतु ऐसे संशोधन की सांविधानिकता को कसौटी पर कसने से कोई सर्वोच्च न्यायालय को रोक नहीं सकता। यदि कभी ऐसी स्थिति पैदा होती है, तो चुनावी जनादेश या जनता की अदालत को सर्वोपरि ठहराने का प्रयास खतरनाक साबित हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था में कॉलेजियम वाली परंपरा पर कार्यपालिका सवाल उठाती रही है। जजों के आचरण पर अंकुश लगाने वाले आयोग का सुझाव बारंबार दिया जाता है। न्यायपालिका के स्वेच्छाचार-भ्रष्टाचार की भी चर्चा इधर होने लगी है। इस मामले में भी राजनीतिक दलों, सांसदों-विधायकों तथा नौकरशाही में मतैक्य है। निहित स्वार्थों की रक्षा के लिए यह स्वाभाविक है।

संक्षेप में ही सही, दो और मुद्दों की तरफ ध्यान दिलाना आवश्यक है। राज्य और केंद्र के बीच विवाद भी सर्वोच्च न्यायपालिका का क्षेत्राधिकार है। मसलन, यदि तमिलनाडु या जम्मू-कश्मीर की विधानसभा कोई प्रस्ताव पारित कर केंद्र को असमंजस में डाल पंगु बनाने की कोशिश करे या देश के राजनय को पटरी से उतारता नजर आए, तो संघीय व्यवस्था की असलियत पर न्यायाधीश ही प्रकाश डाल सकते हैं।


'लक्ष्मण रेखा' की आंख मूंदकर लाठी से पिटाई सांप निकल जाने के बाद अरसे से चल रही है। इसके भीतर रह विशेषाधिकार की ढाल को अपने सामने तान भयंकर उत्पात मचाया जा सकता है। श्यामवर्णा सुंदरियों के विषय में शरद यादव के हाल के बयान इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। अवकाश ग्रहण करने के बाद भी मार्कंडेय काटजू के तेवर अदालत की अवमानना वाली तलवार भांजने वाले बने हुए हैं। आनेवाले दिनों में हम अपने को इस बहस से अलग नहीं रख सकते! ऐसा करना अपने कर्तव्य से मुंह चुराना होगा, क्योंकि इसके बाद हमारे 'अधिकार' देर तक बचे नहीं रह सकते।

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