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नक्सलियों से निपटने में कहां हो रही है चूक
सुरेश महापात्र
Updated Wed, 12 Mar 2014 06:40 PM IST
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अब तो यह भी नहीं कहा जा सकता कि हर बार नक्सली नए तौर-तरीकों या नई रणनीति के साथ हमला करते हैं। दरभा-झीरम घाट पर 25 मई, 2013 को पहली घटना बस्तर पुलिस जिला क्षेत्र में हुई थी। 11 मार्च, 2014 इसी घाट पर कुछ ही दूरी के अंतर में नक्सलियों ने दूसरे बड़े हमले को अंजाम दिया। एक ही जगह पर दस महीने के अंतराल में दूसरी बड़ी वारदात! तो बड़ा सवाल यह है कि हमले से नक्सलियों ने सबक लिया या सुरक्षा में तैनात फोर्स ने? सच्चाई तो यह है कि झीरम घाट पर अपने इस क्रूर हमले के साथ नक्सली दहशत छोड़ गए हैं।
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कांग्रेस के काफिले पर नक्सली हमले के बाद पूरे देश में चर्चा छिड़ गई थी कि राष्ट्रीय राजमार्ग पर नक्सली इतनी बड़ी घटना को अंजाम कैसे दे सकते हैं? उस हमले की जांच जारी है और ठीक उसी स्थान पर नक्सलियों ने दूसरी बार अपनी ताकत का एहसास कराया है। यह स्थिति बेहद चिंतनीय है।
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दोनों हमलों से एक बात साफ है कि नक्सलियों के खिलाफ हो रही कार्रवाईयों में रणनीतिक चूक लगातार हो रही है। और सरकार का रवैया केवल बयानों से खानापूर्ति तक ही दिखाई दे रहा है। मैदान में डटी फोर्स को सही जानकारी नहीं दी जा रही है। हमले में हो रहा नुकसान सुरक्षा एजेंसियों की घोर लापरवाही की ओर इंगित कर रहा है। अलग राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले बढ़े हैं और जितने भी बड़े हमले हुए हैं, सभी बीते दस बरस के आंकड़ों में शामिल हैं। इसके कारणों को बड़ी बारीकी के साथ समझने और उसके निदान ढूंढ़ने की दरकार है।
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बड़ी बात यह है कि इस हमले के ठीक दस दिन पहले भी दंतेवाड़ा जिले के पालनार इलाके में ऐसे ही सड़क निर्माण में सुरक्षा दे रही जिला पुलिस पर नक्सलियों ने हमला किया था, जिसमें छह जवान शहीद हो गए थे। नक्सलियों ने इसी तर्ज पर सड़क निर्माण में लगी सुरक्षा एजेंसी को निशाना बनाया। पालनार हमले के बाद एक बात सामने आई थी कि खुफिया विभाग ने अलर्ट जारी किया था, बावजूद इसके नक्सली हमले में सफल हो गए। झीरम घाट हमले के बाद भी प्रदेश के गृह मंत्री रामसेवक पैकरा ने स्पष्ट किया है कि खुफिया सूचना थी और अलर्ट जारी किया गया था। बावजूद इसके चूक का मतलब क्या है?
स्पष्ट है कि बस्तर की परिस्थितियां नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाने की तरह है। यहां सुरक्षा बलों को नक्सलियों से निपटने में कई तरह की मैदानी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इन दिक्कतों को समझने और दूर करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। लगातार रणनीतियों पर ध्यान देकर माओवाद से निपटने में केवल विभाग प्रमुख ही नहीं, बल्कि सरकार की भी सीधी जिम्मेदारी बनती है। छत्तीसगढ़ में गृह विभाग की जिम्मेदारी जिसे भी सौंपी जा रही है, उसकी कार्यक्षमता की अनदेखी भी कहीं भारी न पड़ रही हो, यह भी सोचने की जरूरत है।
पहले रामविचार नेताम, फिर ननकी राम कंवर और अब रामसेवक पैकरा राज्य में गृह मंत्री नियुक्त किए गए। इसके पीछे मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की राजनीतिक मजबूरी भले ही कुछ भी हो। पर उन्हें यह बताना ही होगा कि प्रदेश में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे गृह मंत्री कभी आक्रामक क्यों नहीं दिखते? पुलिसिंग की कमजोरी की बड़ी वजह विभागीय मंत्री की कार्यक्षमता का परिणाम भी हो सकता है। इसे भी समझने की जरूरत है। हो सकता है,आदिवासी बहुल प्रदेश में मुख्यमंत्री इस आशंका से ग्रस्त हों कि यदि कोई घटना होती है, तो सीधे सरकार निशाना न बने। शायद इसी कारण गृह मंत्री के रूप में आदिवासी चेहरा सामने कर सरकार जिम्मेदारी से बचना चाह रही हो। प्रदेश में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी जो भी शक्तियां संभाल रही हैं, कम से कम उन्हें अपनी गलतियों से सबक लेने की जरूरत है।