तू छिपी है कहां
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जब से संसद का मानसून सत्र कोयला मंत्रालय की कुछ फाइलों के गुम होने के चलते बाधित हुआ, तब से यह चंचल मन संतों की उपदेशात्मक शैली में सोच रहा है। हमेशा मन में तरह-तरह के खयाल आते रहते हैं कि जीवन सतत कष्टमय है, कब, कहां क्या हो जाए-कहा नहीं जा सकता! मिसाल के तौर पर, बारिश के कष्ट से बचने के लिए लाख छाते को दुरुस्त कराया हो, लेकिन कष्ट अगर बदा है, तो मूसलाधार बारिश में छाता भी छलनी हो ही जाता है। कोयला-कांड में मंत्री महोदय से जो सवाल किए गए, उसके तय जवाब दिए उन्होंने। पता नहीं, काजल की इस कोठरी में अभी कितनी और रेख लगनी है। तमाम चुस्ती, दुरुस्ती के बावजूद नई फजीहत।
फाइल की दुनिया देखी है बंदे ने। फाइल खोना उतना सरल नहीं होता, जितना समझाया जा रहा है। जिंदगी बर्बाद हो जाती है रचनात्मक प्रतिभा वाले बाबुओं की, पर उनकी फाइलें बनी रहती हैं, कभी खोती ही नहीं। वे ‘आई स्पाई’ की तर्ज पर कहीं न कहीं छिपी होंगी। वे होंगी, जरूर होंगी। कुछ ऐसे कर्म-चोर कर्मचारी भी होते हैं, जो हजार कोशिशों के बावजूद एक छोटी-सी फाइल भी नहीं खो सकते। लापरवाही में वे फाइलों को किसी दूसरे सेक्सन के साथी की सीट पर छोड़ भी आएं, तो वे भी फाइलें जहाज के पंछी की तरह घूम-फिरकर उनके पास लौट आती हैं।
इस मसले पर नाहक ही मेज पीट-पीटकर अपनी हथेली लाल कर रहा है विपक्ष। जिन खोई हुई फाइलों की संख्या सैकड़ों में थीं, उनमें भी रुपये और माननीयों के चरित्र की तरह ‘गिरावट’ आई है। बची-खुची फाइलें भी मिल ही जाएंगी। सावन-भादो के महीने में बादलों में चांद भी छिप जाता है। वह खोता है, पर ‘होता’ है। मेले में खोये यात्रियों की तरह, जैसे आदमी भीड़ में होता है ‘खोता’ नहीं, उसी तरह फाइलों में फाइल होती है, खोती नहीं।
मौजूदा हालात में फाइल ठहर सकती है, खर्चे-पानी के लिए टेम्पररी गुम हो सकती है, पर खो नहीं सकती। संदर्भित फाइलें बूढ़ी हो चली थीं, इसलिए हो सकता है कि कदाचित घर के बुजुर्गों की तरह आलमारी के ऊपर ठिकाने लगा दी गई हों। भार न संभाल पाने की वजह से बेचारी लुढ़क भी सकती हैं। माना कि वे कम बोलते हैं, पर नाहक चिल्ला रहे हैं विपक्षी। प्रधानमंत्री के पास क्या यही काम बचा है कि वे देश की फाइलों की निगरानी करते फिरें। आफ्टर आल वे पी एम हैं, ‘पी एन’ नहीं।