महिलाओं का नजरिया बदले, तो बदलेगा समाज
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जब से मैंने प्रीति जिंटा के बारे में यह लिखा, कि उनकी शिकायत मुझे कुछ निराधार-सी लगती है, तब से महिला सशक्तिकरण के ठेकेदार मेरे पीछे पड़े हुए हैं। उस ट्वीट में मैंने इतना ही कहा था कि जिस देश में रोज बेसहारा बच्चियों के साथ बर्बरता और बलात्कार के किस्से सामने आते हैं, वहां एक मशहूर अभिनेत्री का अपने पूर्व प्रेमी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने से जनता का पैसा और पुलिस का समय बर्बाद होता है। बलात्कार कानून में निर्भया कांड के बाद जो सख्ती लाई गई थी, वह ऐसी शिकायतों के लिए नहीं, उन लाचार महिलाओं और नाबालिग बच्चियों के लिए लाई गई थी, जो अपने घरों के अंदर भी सुरक्षित नहीं हैं।
खूब बहस हुई है पिछले दिनों मेरी इस बात को लेकर, और इस बहस से मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि महिलाएं ही सबसे बड़ी दुश्मन हैं महिलाओं की। समाज तब तक नहीं बदलेगा, जब तक महिलाओं की सोच में बदलाव नहीं आएगा। जो सशक्त महिलाएं हैं, वे अक्सर आपको मिलेंगी दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में, उन महिलाओं से बहुत दूर, जो गरीबी, अशिक्षा और पुरानी परंपराओं के कारण गूंगी रहती हैं। जब कोई हैवान उन पर तेजाब फेंकता है, जब उनके साथ सामूहिक बलात्कार होता है या कोई उनको कोठे पर बेच डालता है, तभी जाकर उनकी आवाज सुनाई देती है उनके अधिकारों के ठेकेदारों को।
जो सरकारी संस्थाएं बनी हैं महिलाओं की सुरक्षा के लिए, वहां भी ऊंचे ओहदों पर बैठी हैं ऐसी महिलाएं, जिनको नौकरियां इसलिए मिली हैं, क्योंकि किसी ताकतवर मर्द ने उनकी सिफारिश की है। सो जब तक कोई निर्भया इज्जत बचाते हुए नहीं मर जाती, तब तक ये महिलाएं लाचार बहनों के लिए कुछ नहीं करती हैं। इनसे आप नहीं सुनेंगे कि पेयजल महिलाओं के लिए बड़ा मुद्दा है। बदायूं हादसे के बाद शौचालयों की बातें सुनने को मिलीं, पर कुछ दिनों बाद ये बंद हो जाएंगी, क्योंकि जिन्होंने ठेका ले रखा है महिला कल्याण का, उनकी प्राथमिकताएं अलग हैं।
पिछले हफ्ते मेरी मुलाकात हुई कुछ सशक्त महिलाओं से। इनकी मांग थी कि संसद में तैंतीस फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए महिलाओं को। मैंने जब कहा कि यह आरक्षण पंचायतों में वर्षों से है और कोई सुधार नहीं आया है महिलाओं की सुरक्षा में, तो वे कुछ क्षण के लिए चुप रहीं, फिर कहने लगीं कि महिला सशक्तिकरण के लिए फिर भी जरूरी है संसद में आरक्षण। मुझे याद आया कि ऐसी ही महिलाओं के दबाव के कारण बलात्कार कानून में संशोधन किए गए थे पिछले साल, पर यह कानून उनके कोई काम नहीं आया है, जिनको इसकी वास्तव में जरूरत है। इसलिए कि समस्या कानून की नहीं थी कभी, समस्या शुरू से थी कानून-व्यवस्था की, पुलिस वालों की महिलाओं के साथ बर्ताव की और समाज में परिवर्तन के अभाव की। जब किसी मासूम बच्ची के साथ उसका ही कोई रिश्तेदार बलात्कार करता है, तो उसकी मां तक अक्सर उसका साथ नहीं देती, क्योंकि बदनामी की उसको ज्यादा परवाह होती है। उस मां की सोच में जब तक बदलाव नहीं आएगा, तब तक कानून चाहे कितना भी सख्त हो जाए, क्या फर्क पड़ेगा?