फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   When will dipped Purvanchal

कब तक डूबता रहेगा पूर्वांचल

Tue, 23 Aug 2016 06:38 PM IST
उमेश चतुर्वेदी
उमेश चतुर्वेदी Updated Tue, 23 Aug 2016 06:38 PM IST
विज्ञापन
When will dipped Purvanchal
उमेश चतुर्वेदी

उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाके की, जिसे सूबे में पूर्वांचल के नाम से जाना जाता है, नियति बरसात के दिनों में बाढ़ से जूझना और गरमी के दिनों में आग की लपटों से झुलसना बन गई है। करीब चार साल बाद आए बेहतर मानसून ने भले ही देश की आर्थिक उम्मीदों को परवान चढ़ाने में अहम भूमिका निभाई हो, पर पूर्वांचल, खासकर बलिया जिले के लिए यह मुसीबत का सबब बनकर आया है। करीब बीस किलोमीटर के अंतराल में समानांतर बहने वाली गंगा और घाघरा नदियां अपने रौद्र रूप में हैं। 'दूसरी आजादी' के नायक जयप्रकाश के गांव सिताबदियारा को तो दोनों नदियों ने चौतरफा घेर लिया है। जिले के तीन गांव प्रसाद छपरा, श्रीनगर और गंगापुर को गंगा ने निगल लिया है। अब वहां के लोगों के लिए तीनों ही गांव सिर्फ स्मृतियों में ही जिंदा रहेंगे। जिनकी हैसियत होगी, वे बांध के अंदर वाले सुरक्षित गांवों में पक्के मकान बनाकर नई गृहस्थी बसा लेंगे। पर ज्यादातर की जिंदगी मड़ई में ही गुजरेगी, जिसे कभी आंधी उड़ाएगी, तो कभी मई-जून की झुलसती गरमी के बीच आग भस्म करेगी। बलिया में ही करीब पचास हजार की आबादी राष्ट्रीय राजमार्ग 31 के किनारे झाड़-झंखाड़ साफ कर बोरा-चट्टी, तिरपाल डालकर रहने को मजबूर हो गई है।

विज्ञापन


बाढ़ और अगजनी की मार झेलने को अभिशप्त इस इलाके का दर्द अब तक राज्य का राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाया है। दिलचस्प यह है कि जिस समाजवादी पार्टी की राज्य में सरकार है, उसके मुखिया को समाजवादी आंदोलन में शामिल करने वाले स्वर्गीय जनेश्वर मिश्र का गांव भी गंगा के किनारे ही है।
विज्ञापन


पूर्वांचल की गरीबी को लेकर गाजीपुर के पूर्व सांसद विश्वनाथ गहमरी के लोकसभा में हृदयविदारक भाषण को खूब याद किया जाता है, जिसे सुनकर कहा जाता है कि तत्काल प्रधानमंत्री पंडित नेहरू भी रो पड़े थे। उसके बाद ही पूर्वांचल की गरीबी के आकलन और विकास की रूपरेखा तय करने के लिए पटेल आयोग बना था। लेकिन उस आयोग की रिपोर्ट पर अब तक अमल नहीं हुआ है। बेशक बलिया की जनता सबसे ज्यादा बाढ़ से प्रभावित है, लेकिन बाढ़ ने इलाहाबाद से लेकर वाराणसी होते हुए गाजीपुर तक में तबाही मचा रखी है। कहने के लिए बांध और रिंग बांध भी बने हैं। लेकिन स्थानीय लोगों को पता है कि इनके निर्माण में कितनी ईमानदारी बरती गई और कितनी कमाई की गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन


जिस जिले का प्रतिनिधित्व खुद चंद्रशेखर ने किया और देश के प्रधानमंत्री तक बने, वहां ऐसी बदहाली निश्चित तौर पर चिंता का विषय है। बाढ़ के दिनों के चलते अगर कोई राहत में है, तो वह है पूर्वांचल का बिजली महकमा। वैसे ही यहां पिछले 23 साल से एक हफ्ते रात को तो एक हफ्ते दिन में कुल जमा छह या सात घंटे बिजली आती है। अब पानी में हादसा न हो, इसलिए उसने पूरी बिजली काट दी है। जब प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी को अपना चुनाव क्षेत्र बनाया था, तो पूरे पूर्वांचल में उम्मीद जगी थी कि इस इलाके के दिन बदलेंगे। लेकिन अभी तक इस इलाके में कोई बदलाव की नजीर नजर नहीं आ रही है। जिले की तीनों लोकसभा सीटों पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। इस लिहाज से लोग उम्मीद बांधे बैठे हैं कि उन्हें केंद्रीय मदद जरूर मिलेगी। लेकिन अभी तक निराशा ही हाथ लगी है। लोग सिर्फ उपरवाले के भरोसे हैं कि वे गंगा और सरयू मइया को मनाएं, और बारिश न करें, ताकि उनकी किसी भी तरह से ढंकी गृहस्थी का पर्दा न उतरे।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed