इस गरीबी, बीमारी और पीड़ा का अंत कब होगा
पिछले कुछ दिनों में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, बस्ती और देवरिया जिलों के कुछ गांवों की गरीब महिलाओं और पुरुषों से बात करने का मौका मिला। इलाहाबाद के कर्छना के कचरी गांव के किसान करीब 1,500 दिनों से लगातार धरना दे रहे हैं। वे छोटे किसान हैं। उनकी जमीन उपजाऊ है, तीन फसलें पैदा करने वाली, लेकिन पिछले तीन वर्षों से उस पर हल नहीं चला है। ऐसा इसलिए, क्योंकि उसे अधिगृहीत करने का निर्देश राज्य सरकार ने जारी कर दिया था। मगर 100 से अधिक किसानों ने अपनी जमीन देने से इन्कार कर दिया और वे धरने पर बैठ गए। उनका सामना लाठी और जेल से हुआ और वे अदालत भी गए। न्यायालय ने 2012 में ही फैसला सुना दिया कि अधिग्रहण संबंधी सरकारी प्रक्रिया अवैध है, और जिन लोगों ने मुआवजा लिया है, उसे लौटाकर वे अपनी जमीन वापस ले सकते हैं। लेकिन अब तक इस दिशा में ठोस प्रगति नहीं हो पाई है, नतीजतन रिक्शा चलाकर, मेहनत-मजदूरी कर दो जून की रोटी जुटाना इन लोगों की मजबूरी है। और इस तरह, सरकार के गलत फैसले के कारण कचरी के सैकड़ों परिवार, जो गरीबी रेखा के ऊपर थे, उसके नीचे घसीट लिए गए।
कचरी के आगे खीरी है, जहां कभी कोल आदिवासियों का आधिपत्य था। इस इलाके के जंगलों के साथ यह आधिपत्य भी लुप्त हो गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी उनसे आदिवासी होने का अधिकार छीनकर उन्हें अनुसूचित जाति का दर्जा दे दिया है। खीरी के बाजार में हजारों कोल महिला और पुरुष इकट्ठा थे। उनका पुश्तैनी कुपोषण दूर से दिख रहा था। मगर उनकी आंखें आक्रोश से भरी हैं। एक गरीब किसान की नाबालिग बिटिया के साथ छह महीने पहले बलात्कार किया गया था। पुलिस जांच का ढोंग रचा रही थी, और फिर कुछ दिन पहले पता चला कि पुलिस ने फाइल बंद कर दी है। वह किसान भी भीड़ के सामने खड़ा था। असहनीय भूख और पीड़ा ने जैसे उसकी जुबान बेकार कर दी है। भीड़ ने थाने पर धावा बोल दिया। उसके तेवर ने वर्दीधारियों को हिला दिया। लिहाजा मुकदमे को फिर से खोलकर, बहुत जल्दी न्याय का पक्का आश्वासन दे दिया गया।
देवरिया और बस्ती के अति-पिछड़े, लेकिन अति-उपजाऊ जिले, एक-दूसरे से सटे हुए हैं। हरियाली के बीच मौजूद बदहाली बहुत चुभती है। हर गांव की कहानी 2001 की जनगणना की उस चौंकाने वाले तथ्य की सच्चाई दोहरा रही थी कि पूरे भारत के ग्रामीण क्षेत्रों मे किसानों का अनुपात कम हुआ है, जबकि भूमिहीन मजदूरों का अनुपात बहुत बढ़ा है। यहां खेतों मे काम ज्यादातर औरतें ही करती हैं। उन्हें कभी सौ रुपये, कभी अस्सी रुपये, तो कभी पचास रुपये मजदूरी मिलती है। मगर गालियां अक्सर मिलती हैं। इतना ही नहीं, इस पूरे तटवर्ती क्षेत्र मे बारिश होते ही जापानी इन्सेफलाइटिस का प्रकोप बच्चों मे फैल जाता है, जिससे सैकड़ों बच्चों की अकाल मौत हो जाती है।
हजारों साल पहले इसी क्षेत्र की गरीबी, बीमारी और पीड़ा का कारण खोजने के लिए एक राजकुमार ने अपना महल और परिवार छोड़ दिया था। मगर आज वहां इनसे निजात पाने के लिए न जाने कितने नौजवान अपना घर-परिवार छोड़कर, ट्रेन की छतों पर बैठकर, शहरों में अपनी किस्मत आजमाने के लिए निकल पड़ते हैं। और न जाने कितनी मांएं, बहुएं और बेटियां उस दिन का इंतजार करती हैं, जब भगवान बुद्ध फिर अवतार लेंगे, और इस अंतहीन-सी बन गई गरीबी, बीमारी और पीड़ा का अंत कर देंगे।
(लेखिका माकपा की पूर्व सांसद हैं)