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जब शराब नाश करती है

Mon, 11 Feb 2019 06:20 PM IST
Nootan Gupta राजेंद्र प्रसाद नैनवाल
राजेंद्र प्रसाद नैनवाल Published by: Nootan Gupta Updated Mon, 11 Feb 2019 06:20 PM IST
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When the alcohol is destroyed
कच्ची शराब की मौत से एक पीड़ित परिवार, फाइल फोटो

जहरीली शराब के कारण उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुई मौतें व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की मांग करती हैं। जिम्मेदार लोगों की लापरवाही का खामियाजा समाज के निचले तबके के लोग आखिर कब तक भुगतते रहेंगे?

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जहरीली शराब के कारण उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में हुई मौतें व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव की मांग करती हैं। जिम्मेदार लोगों की लापरवाही का खामियाजा समाज के निचले तबके के लोग आखिर कब तक भुगतते रहेंगे?


पिछले दिनों उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जहरीली शराब से सौ से अधिक मौतें हुईं, जो हमारी सामूहिक स्मृति में जहरीली शराब से हुई सबसे मर्मांतक त्रासदी है। इस त्रासदी से एक बार यह सच्चाई सामने आई है कि नकली शराब के उत्पादन और बिक्री पर अंकुश लगाने के मामले में, जिसका नुकसान समाज के सबसे निचले तबके के लोगों को होता है, हमारा प्रशासन कितना लचर और नाकारा है।

जो ब्योरे हैं, वे बताते हैं कि यह जहरीली शराब उत्तराखंड में तैयार हुई और इसे उत्तर प्रदेश भेजा गया। हालांकि त्रासदी के बाद दोनों ही राज्यों की सरकारें सक्रिय हुई हैं, लेकिन अगर वे पहले से सतर्क होतीं, तो यह त्रासदी होती ही नहीं।

उत्तर प्रदेश की स्थिति ज्यादा भीषण है। वहां सिर्फ लाशों का आंकड़ा ही चौंकाने वाला नहीं है, अस्पतालों में इलाज के लिए आने वालों की संख्या भी चिंतित करने वाली है। यह उस राज्य का हाल है, जहां जहरीली शराब से आए दिन मौतें होती रहती हैं। अतीत में जहरीली शराब के कारण सूबे के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से के कई शहरों में मौत हो चुकी है। इस त्रासदी से पहले कुशीनगर में जहरीली शराब ने कुछ लोगों की जान ली। उत्तर प्रदेश की सरकार ने कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की है।

लेकिन वह 2017 में ही नकली शराब तैयार करने वालों के खिलाफ मौत की सजा का कानून ले आई थी, इसके बावजूद इस पर रोक नहीं लग सकी। उस कानून में मौत की सजा के अलावा अवैध शराब के कारोबार पर नजर रखने के लिए अस्थायी थाने और चौकियां भी बनाई गईं। लेकिन उस सख्ती का सतह पर कोई नतीजा नहीं दिखा। हर त्रासदी के बाद जांच की बात होती है और आनन-फानन में जांच कमेटी बनाई जाती है। आदित्यनाथ सरकार ने इस त्रासदी की पड़ताल के लिए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक की अध्यक्षता में एक विशेष जांच टीम गठित की है। इस त्रासदी के बाद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड, दोनों जगह विपक्ष सरकारों पर हमलावर है। पर ये मौतें राजनीतिक तूफान से ज्यादा व्यवस्था में बदलाव लाने की मांग करती हैं।  

जहां तक उत्तराखंड की बात है, तो इस राज्य की स्थापना के पीछे यह धारणा थी कि एक सक्रिय और सतर्क राजनीतिक वर्ग पहाड़ों और पहाड़ों की तराई में रहने वाले उपेक्षित लोगों के हित में काम करेगा। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। लोगों की उम्मीदों के साथ खिलवाड़ हुआ। पिछले करीब अट्ठारह साल से उत्तराखंड के लोगों ने भ्रष्टाचार और लापरवाही ही देखी है, जिसका नतीजा कभी-कभी ऐसी ही त्रासदी के रूप में सामने आता है। उत्तराखंड में जहरीली शराब से एक साथ इतने लोग इससे पहले कभी नहीं मारे गए।

जबकि नकली शराब पर नजर रखने की जिम्मेदारी पुलिस के जवानों और आबकारी अधिकारियों की है। यह समय राज्य की नौकरशाही और राजनेताओं द्वारा इस त्रासदी की जिम्मेदारी लेने की है। सवाल यह है कि अधिकारियों की लापरवाही से कब तक परिवार तबाह होते रहेंगे। प्रासंगिक सवाल यह है कि जिन अधिकारियों पर जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा थी, वे उससे चूक कैसे कर गए। 

यह तथ्य है कि हर साल मार्च के आसपास राज्य सरकार अपनी आबकारी नीति बनाती है, जिसके पीछे शराब की बिक्री से अधिक से अधिक राजस्व कमाने का लक्ष्य रहता है। और यही वह समय होता है, जब शराब माफिया गोपनीय तरीके से देसी शराब तैयार करने में लग जाते हैं। यह शराब नकली होती है, जिसमें मिथनॉल मिलाया जाता है और बिना किसी संदेह के इसका सेवन स्वाभाविक ही बड़े संकट का कारण बनता है। उत्तराखंड में कच्ची शराब की ऐसी दुकानें जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से गोपनीय ढंग से चलती रहती हैं। समय-समय पर राज्य की अलग-अलग जगहों में कच्ची शराब की ऐसी सैकड़ों भट्ठियां पकड़ी गई हैं। इस धंधे में लगे लोग कुछ समय के लिए जेल में रहते हैं, फिर जमानत पर बाहर आकर इसी गैरकानूनी धंधे में लग जाते हैं।

उत्तराखंड जैसे नए राज्य में शराब की भारी खपत है, तो इसकी कई वजहें हैं। उत्तराखंड में रिटायर्ड सैनिकों की एक बड़ी आबादी है, जो ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में रहती है, और जिसका बड़ा हिस्सा शराब का आदी है। शराब पीने की इनकी आदत ने ग्रामीणों और उनके आसपास के लोगों को शराब की ओर आकर्षित किया है।

लेकिन शराब पीने वाले सभी लोग महंगी और ब्रांडेड शराब नहीं पी सकते। ग्रामीण इलाकों में खासकर समाज के निचले तबके के लोग देसी शराब पीते हैं। पुलिस और आबकारी विभाग के निचले स्तर के कर्मचारी गोपनीय ढंग से बनने और बिकने वाली देसी शराब से अपनी आंखें मूंदे रहते हैं। इस तरह बेरोजगार युवा आसानी से सस्ती देसी शराब के चंगुल में फंस जाते हैं। इससे शराब पीने की उनकी आदत भी बरकरार रहती है और इसके लिए उन्हें ज्यादा पैसे भी नहीं खर्च करने पड़ते। इस प्रक्रिया में वे इस सच्चाई से भी आंख मूंद लेते हैं कि सस्ती शराब पीने की उनकी यह लत उनकी जान भी ले सकती है।

दरअसल शराब की अधिक बिक्री राजस्व हासिल करने का एक पसंदीदा स्रोत है, इसी कारण हर साल नए इलाके में शराब के ठेके दिए जाते हैं। कई बार इन ठेकों में मिलावटी शराब बिकने या शराब के अधिक दाम वसूले जाने की शिकायतें आती हैं। लेकिन शायद ही कोई इन शिकायतों पर गंभीरता दिखाता है। अब उत्तराखंड सरकार भी जहरीली शराब तैयार करने वालों के लिए मृत्युदंड जैसी सख्त सजा लाने की बात कह रही है।

जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, तब महिला मंगल दल के शराब-विरोधी आंदोलनों के कारण तत्कालीन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आठ पहाड़ी जिलों में शराब पर प्रतिबंध लगा था। पर मुलायम सिंह के मुख्यमंत्री बनते ही उन जिलों में प्रतिबंध हट गया और पहाड़ पर शराब के नए ठेके खोले गए।

लोगों को उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखंड सरकार सभी तरह की शराबों के उत्पादन और बिक्री पर कठोर शर्तें लगाएंगी। पर अधिक से अधिक राजस्व कमाने के लालच के कारण राज्य की उत्तरोत्तर सरकारों ने शराब के उत्पादन और बिक्री पर लचीला रुख अपनाया, जिसका नतीजा मौजूदा तस्वीर के रूप में हमारे सामने है।  
 
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