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जब अदालत को आगे आना पड़ता है

Sun, 17 May 2015 04:36 PM IST
कुमार प्रशांत
कुमार प्रशांत Updated Sun, 17 May 2015 04:36 PM IST
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When court came forward

तो सारे ही राजनीतिक दलों के लोगों को इस पर एतराज हुआ है कि सर्वोच्च न्यायालय ने हमारी बुनियादी आजादी पर हमला किया है और हमें हमारे फोटो छापने से रोक दिया है! पूछा जा रहा है कि मतदाताओं के पैसों से, मतदाताओं के प्रतिनिधि अपना और लोकहित के अपने कामों का प्रचार करते हैं, तो इसमें गलत क्या है? लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्देश सुना दिया है कि सरकारी खर्चे से जो विज्ञापन अफरातन छापे जा रहे हैं, उनसे सार्वजनिक हित का कोई लक्ष्य पूरा नहीं होता है, बल्कि उससे आत्म-प्रचार और व्यक्ति-पूजा की बीमारी फैलती है, जिसका लोकतंत्र के साथ मेल नहीं बैठता है। इसलिए जिन विज्ञापनों का खर्च सरकारी खजाने से दिया जाना है, उनके साथ मंत्रियों-नेताओं के फोटो नहीं छपने चाहिए। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश के फोटो अदालत ने अपवाद में रखे हैं, लेकिन उनके लिए भी संबंधित व्यक्तियों से इजाजत लेने का निर्देश दिया है। केंद्र सरकार की तरफ से अदालत को यह बताने की कोशिश हुई कि यह ऐसा मामला है कि जो अदालत के दायरे में नहीं आता है। लेकिन अदालत ने केंद्र सरकार को आगाह किया कि जिन क्षेत्रों में कोई साफ नीति या कानून नहीं हैं, उन सबमें दखल देकर मर्यादाएं तय करना अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है।

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लोकतंत्र की गाड़ी दो ही आधार पर चलती है-या तो वह स्वस्थ परंपराओं का आधार लेती है या फिर स्पष्ट कानून का। जिन देशों में लोकतंत्र विकास के क्रम में होता है, वहां परंपराओं का आधार मिलता नहीं है, क्योंकि परंपराएं बनी नहीं होती हैं। कानून भी हर संदर्भ में बने-बनाए नहीं मिलते हैं, क्योंकि कानून भी तो समाज के अनुभवों में से पैदा होते हैं। तीसरा एक आधार हो सकता है देश के राजनीतिक-सामाजिक जीवन में काम करने वाले ईमानदार, नि:स्वार्थी नागरिकों की पहल का। लेकिन भारतीय समाज का भी और इसकी राजनीति का भी जैसा पतन हुआ है, उसमें ऐसी जागरूक नागरिक-शक्ति मिलनी मुश्किल ही है। कहां यह सावधानी बरती जाती थी कि लोकसभा का सत्र चल रहा हो, तो प्रधानमंत्री और पूरी मंत्रिपरिषद उसमें हाजिर रहे और विपक्ष के सारे ही सवालों-एतराजों का जवाब दें और कहां आज ऐसा हो चला है कि विपक्ष सिर पटकता रहे कि प्रधानमंत्री फलां के बारे में खुद बयान दें, तो इसे प्रधानमंत्री की बेइज्जती समझा जाने लगा है।
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विधायिका ईमानदारी, योग्यता और प्रतिबद्धता से इस कदर खोखली होती गई है कि अपनी सामयिकता भी खो चुकी है। जहां सांसद समर्थन देने या न देने की भी कीमत वसूलते हों और सत्ता या विपक्ष वह कीमत अदा भी करता हो; जहां संसद में सवाल पूछने की भी कीमत तय हो; जहां फर्जी यात्रा के फर्जी बिल बनाए जाते हों और प्रतिदिन मिलने वाले भत्ते के आधार पर यह तय किया जाता हो कि कितने दिन सदन में हाजिर रहना है; जहां प्रधानमंत्री को यह पता न होता हो कि वह जिन विभागों को देख रहा है, उनमें कैसी लूट चल रही है, उस विधायिका से हम किसी नैतिक सवाल को समझने और कोई नैतिक भूमिका लेने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं।
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सरकार के हर विभाग का हर मंत्री अपने विभाग की छोटी-बड़ी हर गतिविधि के साथ प्रधानमंत्री का फोटो जोड़कर, अपना फोटो प्रकाशित करवाता रहता है। सारे राज्यों में इसी की कार्बन कॉपी मुख्यमंत्री के फोटो के साथ अपना फोटो जोड़कर चलती रहती है। जनता के पैसों के ऐसे अनर्थकारी इस्तेमाल के बारे में यदि नए-पुराने किसी भी प्रधानमंत्री को चेत नहीं है, तो अदालत सामने आएगी ही, उसे आना ही चाहिए। प्रसंग-बेप्रसंग बैनर-पोस्टर लगाने का चलन भी ऐसी ही बीमारी का रूप ले चुका है। ऐसी बीमारी यह भी है कि इस सड़क का, इस पुलिया का, इस चौराहे का निर्माण किस सांसद के सांसद कोष से किया गया है, इसकी बड़ी-बड़ी तख्तियां बनाई व लगाई जा रही हैं। ऐसा लगता है कि सांसद महोदय ने अपनी जनता की परेशानी समझ कर, अपनी जेब से या अपने प्रयत्न से पैसे जुटाकर इस सड़क का या इस जिम का निर्माण करवाया है। लेकिन सच तो यह है कि सांसद निधि कहीं और से नहीं, लोगों की जेब से ही आती है और आप हमारे ही पैसे से अपना प्रचार कर रहे हैं।

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