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केवल कहने भर से नहीं आ जाएंगे अच्छे दिन
अश्विनी महाजन
Updated Wed, 30 Jul 2014 07:38 PM IST
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भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार दो महीने का कार्यकाल पूरा कर चुकी है। उसने अर्थव्यवस्था को गति पहुंचाने वाला बजट भी पेश किया है। नरेंद्र मोदी ने चूंकि अच्छे दिन लाने का वायदा किया था,इसलिए समाज के हर वर्ग की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं। गरीब अपनी हालत सुधरने का स्वप्न संजो रहा है, तो बेरोजगार रोजगार के अवसर पाने की अपेक्षा रखता है। मध्यम वर्ग समेत सभी महंगाई से निजात पाना चाहते हैं, तो उद्योग जगत चाहता है कि विकास दर ऊपर उठे।
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केवल चाहने भर से अच्छे दिन नहीं आएंगे, वास्तविक आर्थिक परिस्थिति पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। मसलन, देश में महंगाई रुपये की कमजोरी के कारण ह तो है ही, खाने-पीने की चीजों की बाजार में कम उपलब्धता भी इसके लिए जिम्मेदार है। सरकार के भारी-भरकम खर्च और राजस्व में अपेक्षित वृद्धि न होने के कारण उसे मजबूरन रिजर्व बैंक से उधार लेना पड़ता है। ऐसे में, केंद्रीय बैंक को अतिरिक्त नोट छापने पड़ते हैं। ज्यादा नोट छापने से मुद्रा का प्रसार बढ़ता है तथा महंगाई और बढ़ जाती है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी ये सभी परिस्थितियां अचानक बदलने वाली नहीं हैं।
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पिछले तीन वर्षों में अर्थव्यवस्था लगातार सुस्त बनी हुई है। पिछले साल मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की विकास दर तो ऋणात्क 0.7 प्रतिशत तक पहुंच गई। पिछले काफी समय से महंगाई के चलते ब्याज दर घटाना संभव नहीं हो पाया है। ऐसे में मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र का विकास हो या बुनियादी क्षेत्र का, दोनों में हम पिछड़े हैं। पिछले काफी समय से रियल्टी का क्षेत्र पिछड़ा है, जिस कारण सीमेंट, लोहा, अन्य भवन निर्माण सामग्री की मांग तो घटी ही है, रोजगार के अवसर भी कम हुए हैं। हालांकि बजट में इस क्षेत्र को गति देने की कमोबेश कोशिश हुई है। पर इसके परिणाम तुरंत दिखाई देने वाले नहीं हैं।
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लंबे समय से हमारा भुगतान शेष का घाटा लगातार बढ़ता रहा है। वर्ष 2012-13 में तो यह घाटा 89 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। पिछले साल सोना आयात पर रोक लगाने के बाद उसमें कुछ सुधार हुआ, लेकिन अब भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। विदेशी कर्ज की देनदारियों के कारण रुपये पर दबाव बढ़ा है। हमारा व्यापार घाटा बहुत ज्यादा है, क्योंकि हमारे आयात तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि निर्यात सुस्त बने हुए हैं। अकेले चीन से व्यापार में हमारा घाटा 40 अरब डॉलर से भी ज्यादा है। चीनी माल का आयात न केवल व्यापार घाटे को विकट बना रहा है, बल्कि हमारे मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को गति देने में भी बड़ी बाधा बना हुआ है।
महंगाई रोकना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। खाने-पीने की चीजों के दाम पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ गए हैं। इस बार मानसून की वर्षा अब तक अपेक्षित नहीं रही है, ऐसे में, खाद्यान्न के दाम शायद ही घटें। बेहतर होगा कि सरकार बाजार में खाने-पीने की चीजों की उपलब्धता पर नजर रखे। सरकारी खर्च कम करना भी आवश्यक है।
गैरजरूरी सब्सिडी में कमी तो ठीक है, पर किसानों और गरीबों के कल्याण के लिए चल रही योजनाओं में कटौती नहीं होनी चाहिए। डब्ल्यूटीओ में खाद्यान्न सुरक्षा के मोर्चे पर सख्त रुख दिखाकर हमारी सरकार ने ठीक किया है। पर इसके साथ ही अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए भी कदम उठाने होंगे। मोदी सरकार नीतियों की दिशा सही रखते हुए ईमानदारी से काम करे, तो आगामी दिनों में अच्छे दिनों की संभावनाएं बन सकती हैं।