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एकदम विफल नहीं रही केरी की यात्रा
चिंतामणि महापात्र
Updated Mon, 04 Aug 2014 08:02 PM IST
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अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी की भारत यात्रा नई दिल्ली के लिए थोड़ी उम्मीदें ही जगा पाईं। वह एक महत्वपूर्ण प्रतिनिधिमंडल लेकर आए थे, जिसमें व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा से जुड़े बड़े अधिकारी सहित अनेक ऐसे लोग थे, जो पांचवीं भारत-अमेरिकी सामरिक वार्ता का हिस्सा थे। बावजूद इसके इस यात्रा से कोई नई जमीन नहीं तैयार हुई, और न ही कोई नया समझौता हुआ। पर केरी की इस यात्रा का उद्देश्य दूसरा था, जिसमें वह सफल भी हुए।
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अमेरिकी विदेश मंत्री की इस यात्रा का पहला उद्देश्य भारत के साथ वार्ता शुरू करना था, जो दोनों देशों के संबंधों में आई खटास के कारण रुकी हुई थी। देवयानी खोबरागड़े विवाद के बाद से ही दोनों देशों के शीर्ष नेताओं ने एक-दूसरे से बातचीत कमोबेश बंद कर रखी थी। इस बीच न कोई उच्च स्तरीय यात्रा हुई, न ही अमेरिकी राष्ट्रपति तथा भारतीय प्रधानमंत्री ने द्विपक्षीय रणनीतिक सहयोग पर पर्याप्त ध्यान दिया। नतीजतन अमेरिका में अधीनस्थ अधिकारियों ने मोर्चा संभाल लिया और उन्होंने भारत के लिए कई नई समस्याएं खड़ी कीं।
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फिर चाहे बात दवा कंपनियों की हो, भारतीय यात्री विमान के अमेरिका में दाखिल होने की हो, सौर ऊर्जा पैनल के निर्माण पर भारत की नीति हो या अमेरिका में भारतीय स्टील के निर्यात से जुड़ा मुद्दा हो, द्विपक्षीय व्यापार के कई क्षेत्रों में अमेरिकी विभागों की दोयम नीति का भारत शिकार बना। इसके अलावा सीरिया के गृहयुद्ध, इराक में उथल-पुथल, यूक्रेन में अलगाववाद, फलस्तीन, इस्राइल और लीबिया की हिंसा, संयुक्त राष्ट्र में श्रीलंका के खिलाफ मानवाधिकार उल्लंघन जैसे राजनीतिक मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों एक दूसरे से टकरा रहे थे। ऐसे में, केरी द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने के लिए भारत आए थे।
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चूंकि भारत में एक ऐसा व्यक्ति प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बना है, जिसे अमेरिका वीजा देने से इन्कार करता रहा है। ऐसे में, वाशिंगटन के लिए नए भारतीय नेतृत्व को नकारना मुश्किल था। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा अगले पांच साल तक सत्ता में रहने वाली है, जबकि बराक ओबामा का कार्यकाल लगभग दो वर्ष बाद खत्म होने वाला है। इसलिए पश्चिम एशिया की तमाम व्यस्तताओं के बाद भी केरी ने भारत आने का फैसला लिया। उनकी यात्रा का तीसरा उद्देश्य आगामी सितंबर में नरेंद्र मोदी की होने जा रही अमेरिका यात्रा की जमीन तैयार करना था।
इन तीनों ही लक्ष्य में केरी कमोबेश सफल हुए हैं। बेशक विश्व व्यापार संगठन की व्यापार सुगमता समझौता का विरोध कर नई दिल्ली ने वाशिंगटन को नाराज किया है, पर केरी का एजेंडा किसी एक बहुपक्षीय मुद्दा से कहीं बड़ा था। ब्राजील में चीन और रूसी नेताओं के साथ मोदी की घनिष्ठता भी उन्हें भारत खींच लाई। ऐसे में, भारत-अमेरिका के बीच किसी बड़े समझौते की उम्मीद भी नहीं थी। संभव है कि इसे मोदी-ओबामा मुलाकात के लिए रोक लिया गया हो। पांचवी भारत-अमेरिकी सामरिक वार्ता के बहाने कैरी भारत से रिश्तों की नई शुरुआत करने में सफल हुए हैं और इसी की अगली कड़ी है, अमेरिकी रक्षा मंत्री चक हेगल का भारत दौरा, जो सात अगस्त से शुरू हो रहा है।
(अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एवं जेएनयू में प्राध्यापक)