{"_id":"5c9cccc2bdec221425446cb0","slug":"what-issue-do-women-vote-on","type":"story","status":"publish","title_hn":"महिलाएं किस मुद्दे पर वोट करें","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया","slug":"opinion"}}
महिलाएं किस मुद्दे पर वोट करें
Thu, 28 Mar 2019 07:01 PM IST
Raman Singh
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली
Published by: Raman Singh
Updated Thu, 28 Mar 2019 07:01 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सुभाषिनी सहगल अली
लोकसभा चुनाव की तैयारियां चल रही हैं। महिला मतदाताओं को कैसे लुभाया जाए, इस महत्वपूर्ण प्रश्न का जवाब तमाम दलों के नेता ढूंढ रहे हैं। उनके लिए यह काफी कठिन सवाल है, क्योंकि केंद्र और राज्य में उन्होंने अपनी सरकारों के कार्यकाल के दौरान महिलाओं के लिए घोषणाएं तो बहुत कीं, पर काम बहुत कम किया है। केंद्र की सत्ता संभालने वाले दो बड़े दलों ने लगातार इस बात का वादा किया कि वे लोकसभा और विधानसभाओं में 33 फीसद आरक्षण लागू करेंगे, पर तमाम ऊलजुलूल बहानों का सहारा लेकर उन्होंने ऐसा करने से इनकार किया है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
मौजूदा सरकार ने बेटियों को पढ़ाने का वादा किया, लेकिन राजस्थान और मध्य प्रदेश में उसके दल ने कुल मिलाकर दो लाख सरकारी स्कूल को बंद करने का फैसला लिया था। उसे हटाकर जिस दल ने सरकार बनाई है, उसने अभी इस फैसले को रद्द करने की घोषणा नहीं की है। तमाम राज्यों से खबर आ रही है कि देश को स्वच्छ और महिलाओं को सुरक्षित और स्वस्थ बनाने वाले मौजूदा सरकार द्वारा बनाए गए शौचालयों में पानी के अभाव में या फिर सीवर लाइन के बिना शौच के अलावा हर तरह के काम हो रहे हैं, जैसे अनाज का रखा जाना, पशुओं का बांधा जाना, खटिया डालकर सोना इत्यादि। हर गरीब महिला को मुफ्त में गैस सिलेंडर और गैस का चूल्हा दिए जाने का प्रमाण हर पेट्रोल पंप पर लगी फोटो के माध्यम से दिया जा रहा है, लेकिन इस बात को गुप्त रखा जा रहा है कि इन महिलाओं को पहले सिलेंडर के बाद कम पैसों में उपलब्ध सिलेंडर तभी मिलेगा, जब वह एक साल के अंदर महंगी दर पर मिलने वाले 10 सिलेंडर खरीदेंगी। ऐसे में, महिलाओं ने अपनी पुरानी फुंकनी और धुएं वाले चूल्हों का इस्तेमाल फिर शुरू कर दिया है। टूटे वचनों और टूटे सपनों की कहानी खत्म होती नहीं दिखती।
केरल सरकार ने हाल में राज्य की दुकानों और वाणिज्यिक संस्थाओं में काम करने वाली महिलाओं के लिए एक कानून पारित किया है, जिसका अनुकरण अन्य सरकारों को भी करना चाहिए। केरल में पहले कांग्रेस के नेतृत्व की सरकार थी। 2014 में उस सरकार के चलते, प्रदेश के मानवाधिकार आयोग ने दुकानों में काम करने वाली लाखों महिलाओं और युवतियों की मार्मिक गुहार सुनने के बाद निर्देश दिया था कि हर दुकान में इनके लिए कुर्सियों का प्रबंध होना चाहिए और उन्हें समय-समय पर बैठने की अनुमति दी जानी चाहिए। यही नहीं, इन कर्मचारियों के शौच का प्रबंध भी अनिवार्य होना चाहिए। आदेश तो हो गया, पर हालत नहीं बदली। महिला कर्मचारियों ने कई शहरों में प्रदर्शन, धरना और हड़ताल की। डेढ़ साल के अंदर सरकार बदली और वाम मोर्चा सरकार ने शासन संभाला। महिला कर्मचारियों ने अपनी मांग फिर उठाई। अबकी बार उन्हें निराश नहीं होना पड़ा। 23 अक्तूबर, 2018 को सरकार की पहल पर एक कानून पारित किया गया। यह कानून केवल कपड़े की दुकानों के लिए नहीं, तमाम दुकानों और वाणिज्यिक संस्थानों में काम करने वाली महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाला है।
इस तरह का कानून अमेरिका जैसे देश में भी पिछले साल ही पारित किया गया। और कोई आश्चर्य की बात नहीं कि ऐसा कानून केरल को छोड़ किसी अन्य भारतीय राज्य में पारित होना तो दूर, उसके बारे में सोचा भी नहीं गया है। इसलिए लोकसभा चुनाव में महिलाओं को सोच-समझकर वोट देना चाहिए, क्योंकि महिलाओं के लिए काम करने वाले दल कम ही दिखाई देते हैं।
माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य