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जब नाम गुम जाएगा

Wed, 05 Jun 2013 09:58 PM IST
रमण कुमार सिंह
रमण कुमार सिंह Updated Wed, 05 Jun 2013 09:58 PM IST
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what is in name

कभी शेक्सपीयर ने कहा था कि नाम में क्या रखा है! शायद उनका आशय था कि नाम से क्या फर्क पड़ता है, पहचान या संबोधन के लिए तो किसी भी नाम का उपयोग किया जा सकता है।

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हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि नाम से फर्क पड़ता है, बहुत फर्क पड़ता है।

लेकिन इस कवायद को क्या कहा जाए, जिसके तहत हमारी सरकार लोगों को एक विशिष्ट पहचान संख्या दे रही है कि भविष्य में उनकी पहचान उनके नाम से नहीं, बल्कि उसी नंबर से होगी! अब इसी तर्ज पर विभिन्न बैंक भी ग्राहकों को विशिष्ट ग्राहक संख्या दे रहे हैं।
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कभी सोचा है कि नाम गुम करने के पीछे की वजह क्या है।

नाम किसी भी व्यक्ति की पहचान होता है। नाम लेते ही हमारे जेहन में उस खास व्यक्ति का चेहरा उभर आता है। मसलन, जैसे ही कोई गांधी जी या बापू कहता है, तो तुरंत हमारे जेहन में महात्मा गांधी का चेहरा उभरता है और उसके साथ ही उनके विचार एवं उनके संघर्ष कौंधते हैं।
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लेकिन नंबरों के साथ ऐसा कुछ नहीं होता। नाम यानी संज्ञा। और अगर नाम को ही गुम कर दिया जाए, उससे आपको वंचित कर दिया जाए, तो क्या उसे संज्ञाशून्य करना नहीं कहेंगे। संज्ञाशून्य होने का मतलब क्या होता है, यह बताने की जरूरत नहीं है।

संज्ञाशून्य होना यानी चेतनाशून्य होना यानी अपने होश-ओ-हवास में नहीं रहना। असल में सरकार का यही उद्देश्य है कि जनता को संज्ञाशून्य बना दिया जाए, ताकि उसकी कार्यशैली पर कोई सवाल न उठा सके।
 
हर नाम के साथ एक चेहरा होता है, जिसके हाथ-पैर होते हैं और जिसकी कुछ बुनियादी जरूरतें होती हैं, जिसे पूरा करने की जिम्मेदारी सरकारों की होती है।

चेहरे पर एक सिर होता है, जिसमें एक दिमाग होता है, जो सोचने का काम करता है। हर चेहरे के साथ एक जोड़ी आंखें होती हैं, जो किसी भी बदलाव का सपना देखती हैं।


अगर नाम नहीं होगा, तो चेहरा नहीं होगा और चेहरा नहीं होगा, तो सोचने वाले दिमाग और बदलाव का सपना देखने वाली आंखों की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

यानी नाम के बिना मनुष्य शून्य से लेकर नौ तक के अंकों की एक संख्या भर होकर रह जाएगा। यही तो चाहती है सरकार। हैरानी की बात तो यह है कि सुरक्षा के नाम पर व्यक्ति के अस्तित्व को गुम करने की इस कवायद को अंजाम दिया जा रहा है और कहीं कोई हलचल भी नहीं हो रही!

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