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क्या हुआ नीतीश के समावेशी विकास का

Fri, 23 May 2014 08:09 PM IST
रवि रंजन
रवि रंजन Updated Fri, 23 May 2014 08:09 PM IST
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What happened Kumar's inclusive growth

आलोचकों और विश्लेषकों का मानना है कि अगर नीतीश कुमार आज भाजपा वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा होते, तो अच्छा होता, बिहार के लिए भी और जद(यू) के लिए भी। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी बिहार के 'विकास बाबू' पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने इस फैसले को सही बताते हैं। उनका यह फैसला एक वैचारिक और राजनीतिक स्थिति को दर्शाता है। मोदी के साथ-साथ पिछले कुछ वर्षों से उन्हें भी विकास और सुशासन वाला मुख्यमंत्री बताया जा रहा था। यहां तक कि मुरझाये और अविकसित बिहार में आर्थिक विकास का अलख जगाने वाले नीतीश की तुलना अक्सर मोदी और उनके गुजरात मॉडल से की जाने लगी थी। नीतीश इस तुलना से इन्कार करते हुए हमेशा से बिहार के मॉडल को ‘न्याय के साथ समावेशी विकास’ का पर्याय मानते थे।

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पूरी हिंदी पट्टी में भगवा राजनीति को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद जनता पार्टी की लोहियावादी राजनीति भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को मजबूर है। खुद को जयप्रकाश नारायण का अनुयायी बताने वाले शरद, मुलायम, नीतीश, लालू सबके सब अपने ही गढ़ में चित्त हैं। अब सवाल उठता है क्या ऐसा था, मोदी और भाजपा की रणनीति में, जिसने विकास पुरुष नीतीश के किले को ध्वस्त कर दिया। सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या जीतन राम मांझी वाला महादलित कार्ड नीतीश और जद(यू) को खोई राजनीतिक जमीन दिला पाएगा या आगामी विधानसभा चुनाव के बाद बिहार में भाजपा की पहली सरकार बनेगी। क्या नीतीश के समावेशी विकास को जनता ने नकार दिया। इन सवालों को हमें दो दृष्टिकोणों से देखने की जरूरत है, तभी हम बिहार में हो रहे राजनीतिक बदलावों का एक सार्थक मतलब ढूंढ सकेंगे। पहला दृष्टिकोण नीतिगत मामलों और विकास की यात्रा को समझने में मददगार साबित होगा और दूसरा, नीतीश के दल और बिहार में उत्पन्न नेतृत्व के संकट को समझने में सहायक होगा।
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विकास और सामाजिक ध्रुवीकरण का समीकरण बहुत ही नाजुक है। नीतीश पहली बार दोनों को एक साथ मिलाकर अलग-अलग विकास और सामाजिक व जातिगत ध्रुवीकरण, दोनों को चुनौती दे रहे थे। समावेशी विकास, सड़क और कानून व्यवस्था का हवाला देकर वह मोदी और गुजरात मॉडल को चुनौती दे रहे थे, तो दूसरी ओर सामाजिक स्तर पर नए जातीय समीकरणों के मार्फत वह लालू के जातिगत ध्रुवीकरण की राजनीति को भी चुनौती दे रहे थे। मुद्दों, मतों और विकास के राजनीतिक संवाद ने इस बार बिहार में लोकसभा चुनाव को त्रिकोणीय मुकाबला बना दिया।
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नीतीश बार-बार यह सफाई देते नजर आए कि उनका विकास मॉडल नाकाम नहीं होगा, क्योंकि इसमें समावेशन की सामाजिक अभियांत्रिक है, तो सामाजिक न्याय का लक्ष्य भी। लेकिन राजनीति के खिलाड़ी अक्सर यह भूल जाते हैं कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक त्रिकोण के हर कोण में एक नाजुक संबंध है, आर्थिक विकास और सामाजिक स्तर पर बराबरी अगर अवसर की समानता प्रदान करने में विफल होती है, तो राजनीतिक समीकरण भी बिगड़ते हैं।


आज बिहार में 64 प्रतिशत से अधिक साक्षरता है और शहरी आबादी कम होने के बावजूद एक निर्णायक मध्यवर्ग है, जो राजनीतिक विचारों का आदान-प्रदान करता है। अच्छी संख्या प्रवासी बिहारियों की है, जो दूसरे राज्यों में रोजी-रोटी कमा रहे हैं और बिहार की राजनीति से जुड़े हुए हैं। ऐसे में, एक बड़ी संख्या में मतदाता अब 24 घंटे बिजली, बेहतर विश्वविद्यालय और अपने घर के नजदीक स्कूली शिक्षा चाहता है। मध्यवर्ग को लगता है कि दिल्ली, बंगलूरू, हैदराबाद और चेन्नई जैसी सुविधाएं पटना, गया और मुजफ्फरपुर में क्यों नहीं है। जाहिर है, अब नेताओं और दलों को आगे निकलना होगा, विकसित बिहार के लिए।

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