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सेना प्रमुख ने गलत क्या कहा?
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विपिन रावत
सेना प्रमुख ने हाल की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ तथ्यों को सामने रखा है, जिन्हें जायज ठहराया जा सकता है। उनकी अहम टिप्पणी थी कि 'आजादी' की मांग व्यावहारिक नहीं है और जो लोग सेना को चुनौती दे रहे हैं या 'आजादी' की मांग कर रहे हैं, उनसे सेना पुरजोर तरीके से लड़ेगी। दूसरी बात, मारे जा रहे आतंकियों की संख्या बेमानी हो जा रही है, क्योंकि नए लोग आतंकी बनते जा रहे हैं, जिससे वह चक्र खत्म नहीं हो रहा है।
तीसरी बात, यह लड़ाई लड़ते हुए भारतीय सेना के हाथ अन्य सेनाओं की तुलना में बंधे हुए हैं, जिनमें सीरिया और पाकिस्तान शामिल हैं, जहां सेना को अपने लोगों के खिलाफ हवाई हमले का अधिकार प्राप्त है। चौथी बात, यह स्वीकार किया जा सकता है कि युवा नाराज हैं, लेकिन पत्थरबाजी और सेना के ऑपरेशन में बाधा पहुंचाना अपने गुस्से के इजहार का सही तरीका नहीं है, यह तो सुरक्षा बलों को भड़काने वाली कार्रवाई है।
पांचवीं बात, यदि युवा फंसे आतंकवादियों की मदद करना चाहते हैं, तो उन्हें ऑपरेशन में शामिल जवानों पर हमले के बजाए उनके समपर्ण में मदद करनी चाहिए। छठी बात, जो सेना के नजरिये को जायज ठहराते हुए उन्होंने कहा कि सेना ने 2016 के मध्य तक उदार रवैया अपनाया था, लेकिन बुरहान वानी के मारे जाने के बाद दक्षिण कश्मीर उबलने लगा और सेना को निशाना बनाया जाने लगा। ठीक इसी समय पाकिस्तान और उसके समर्थकों ने यह दुष्रचार किया कि 'आजादी' नजदीक है, जिससे वहां का माहौल और बिगड़ने लगा। इसने सेना को अपना रवैया बदलने को मजबूर होना पड़ा, क्योंकि उसे राज्य की सर्वोच्चता स्थापित करनी थी।
सातवीं बात, उन्होंने कहा कि विशुद्ध सैन्यवादी दृष्टिकोण समाधान नहीं है। राजनीतिक दृष्टिकोण की भी जरूरत है, नेताओं को गांवों में जाकर लोगों को बताना चाहिए कि उन्हें दिगभ्रमित किया गया है। अंत में वह अपने ऑपरेशन को स्थगित करने के लिए राजी थे, बशर्ते कि यह सुनिश्चित किया जाए कि स्थानीय लोगों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सैनिकों को निशाना नहीं बनाया जाएगा। उनका कहने का आशय यह था कि हिंसा जारी रहने से राज्य के सबसे बड़े उद्योग पर्यटन पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ेगा।
यह गौर किया जाना चाहिए कि उनकी ये टिप्पणियां मुख्यमंत्री के विरोध में नहीं थीं, जिन्होंने रमजान से अमरनाथ यात्रा के बीच संघर्ष विराम की घोषणा करने का आग्रह किया है। इत्तफाक से उनका इंटरव्यू उसी दिन अखबार में प्रकाशित हुआ। यदि उनकी कही बातों को ध्यान से पढ़ें तो पता चलता है कि वह यह संदेश देना चाहते हैं कि वहां सेना स्थानीय लोगों को निशाना बनाने या उनका उत्पीड़न करने के लिए नहीं है, बल्कि उन लोगों से निपटने के लिए है जो राज्य को चुनौती दे रहे हैं। आतंकवादियों का साथ देने, पत्थरबाजी करने या फिर ऑपरेशन में बाधा पहुंचाने लोग सेना की नाराजगी मोल लेते हैं और इस वजह से मौतें होती हैं।
उनके बयान का अलगाववादियों ने विरोध किया, जोकि अपेक्षित ही था। मीरवाइज उमर फारुक ने कहा कि कश्मीरियों की अपना फैसला खुद करने की आकांक्षाएं किसी भी सैन्य ताकत से अधिक मजबूत हैं। जेकेएलएफ के अध्यक्ष यासीन मलिक ने कहा कि सैन्य प्रमुख की टिप्पणी अतार्किक है। वास्तव में इन अलगाववादियों की मुख्य भूमिका बंद आयोजित करना और हिंसा भड़काना है। ये युवाओं को पत्थरबाजी के लिए पैसे देते हैं और उनके मारे जाने पर फर्जी तरीके से शोक मनाते हैं।
वे इस हकीकत से वाकिफ हैं कि कोई भी देश, खासकर भारत कभी-भी किसी भी कारण से अपने एक हिस्से को खुद से अलग नहीं होने देगा, जैसा कि इतिहास का सबक है। भारत ने नगा और मिजो अलगाववाद से दशकों लड़ाई लड़ी और उनके नेताओं को आखिरकार एहसास हो गया कि समाधान सिर्फ बातचीत से निकल सकता है और जोकि अब लगभग अंतिम दौर में भी है। पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश का निर्माण इसलिए हो सका, क्योंकि इसके पीछे भारतीय सेना का समर्थन और उसकी ताकत थी।
पाकिस्तानी सेना के पास ऐसी स्थिति से निपटने के लिए न तो क्षमता है और न ही संकल्प। 'आजादी' वास्तव में दिवास्वप्न है, जिसकी वजह से अनेक लोग मारे जा रहे हैं,क्योंकि राज्य की ताकत को चुनौती देने की कोशिश की जा रही है। अलगाववादी सच का बयान नहीं कर सकते, क्योंकि उनकी जीवनशैली को पाकिस्तान से फंडिंग मिलती है और उनमें से अनेक बच्चे और रिश्तेदार वहां रहते हैं। यदि वे अपना सुर बदलते हैं, तो उनके अस्तित्व पर संकट आ जाएगा, यहां तक कि उन्हें निशाना भी बनाया जा सकता है।
अलगाववादी उनके समर्थक सेना के हाथों मारे जाने वाले स्थानीय आतंकवादियों का महिमामंडन करते हैं, ताकि वहां के बेरोजगार युवकों को उग्रवाद से जुड़ने के लिए भड़काया जा सके। इसीलिए सेना प्रमुख ने कहा कि मारे जा रहे आतंकवादियों की संख्या से फर्क नहीं पड़ रहा है। मसलन, हाल ही में मारे गए आतंकवादियों में से कुछ तो कुछ दिन पहले या कुछ हफ्ते पहले ही आतंकवाद से जुड़े थे। स्थानीय अलगाववादियों और पाकिस्तान के बुरहान वानी का महिमांडन करने का ही नतीजा है कि पिछले दो वर्ष के दौरान 110 युवा आतंकवादी बन गए।
ऑपरेशन में शामिल सैन्य बलों का लक्ष्य आतंकवादियों का खात्मा करना है। उनके काम में बाधा डालने से मौतों की संख्या ही बढ़ेगी। वास्तव में सेना तो बहुत हलके हथियार इस्तेमाल कर रही है, न कि पैलेट गन जिससे मौत हो जाती है। मुठभेड़ या समपर्ण करने वाली जगहों से यदि स्थानीय लोग हट जाएं, तो मौतें घट सकती हैं। यह सब जानते हैं कि सिर्फ सैन्य कार्रवाई इस संकट का समाधान नहीं है।
सेना सिर्फ आतंकवाद में कमी लाकर सही माहौल बनाने में राज्य की मदद कर सकती है, ताकि उन मसलों को सुलझाने के लिए राजनीतिक प्रक्रिया शुरू की जा सके, जिनके कारण आतंकवाद पनपा। सेना प्रमुख सिर्फ यही संदेश देना चाहते थे कि सेना वहां उत्पीड़न के लिए नहीं है, उसे वहां राष्ट्रविरोधी तत्वों को खत्म करने की जिम्मेदारी दी गई है।
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तीसरी बात, यह लड़ाई लड़ते हुए भारतीय सेना के हाथ अन्य सेनाओं की तुलना में बंधे हुए हैं, जिनमें सीरिया और पाकिस्तान शामिल हैं, जहां सेना को अपने लोगों के खिलाफ हवाई हमले का अधिकार प्राप्त है। चौथी बात, यह स्वीकार किया जा सकता है कि युवा नाराज हैं, लेकिन पत्थरबाजी और सेना के ऑपरेशन में बाधा पहुंचाना अपने गुस्से के इजहार का सही तरीका नहीं है, यह तो सुरक्षा बलों को भड़काने वाली कार्रवाई है।
पांचवीं बात, यदि युवा फंसे आतंकवादियों की मदद करना चाहते हैं, तो उन्हें ऑपरेशन में शामिल जवानों पर हमले के बजाए उनके समपर्ण में मदद करनी चाहिए। छठी बात, जो सेना के नजरिये को जायज ठहराते हुए उन्होंने कहा कि सेना ने 2016 के मध्य तक उदार रवैया अपनाया था, लेकिन बुरहान वानी के मारे जाने के बाद दक्षिण कश्मीर उबलने लगा और सेना को निशाना बनाया जाने लगा। ठीक इसी समय पाकिस्तान और उसके समर्थकों ने यह दुष्रचार किया कि 'आजादी' नजदीक है, जिससे वहां का माहौल और बिगड़ने लगा। इसने सेना को अपना रवैया बदलने को मजबूर होना पड़ा, क्योंकि उसे राज्य की सर्वोच्चता स्थापित करनी थी।
सातवीं बात, उन्होंने कहा कि विशुद्ध सैन्यवादी दृष्टिकोण समाधान नहीं है। राजनीतिक दृष्टिकोण की भी जरूरत है, नेताओं को गांवों में जाकर लोगों को बताना चाहिए कि उन्हें दिगभ्रमित किया गया है। अंत में वह अपने ऑपरेशन को स्थगित करने के लिए राजी थे, बशर्ते कि यह सुनिश्चित किया जाए कि स्थानीय लोगों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और सैनिकों को निशाना नहीं बनाया जाएगा। उनका कहने का आशय यह था कि हिंसा जारी रहने से राज्य के सबसे बड़े उद्योग पर्यटन पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ेगा।
यह गौर किया जाना चाहिए कि उनकी ये टिप्पणियां मुख्यमंत्री के विरोध में नहीं थीं, जिन्होंने रमजान से अमरनाथ यात्रा के बीच संघर्ष विराम की घोषणा करने का आग्रह किया है। इत्तफाक से उनका इंटरव्यू उसी दिन अखबार में प्रकाशित हुआ। यदि उनकी कही बातों को ध्यान से पढ़ें तो पता चलता है कि वह यह संदेश देना चाहते हैं कि वहां सेना स्थानीय लोगों को निशाना बनाने या उनका उत्पीड़न करने के लिए नहीं है, बल्कि उन लोगों से निपटने के लिए है जो राज्य को चुनौती दे रहे हैं। आतंकवादियों का साथ देने, पत्थरबाजी करने या फिर ऑपरेशन में बाधा पहुंचाने लोग सेना की नाराजगी मोल लेते हैं और इस वजह से मौतें होती हैं।
उनके बयान का अलगाववादियों ने विरोध किया, जोकि अपेक्षित ही था। मीरवाइज उमर फारुक ने कहा कि कश्मीरियों की अपना फैसला खुद करने की आकांक्षाएं किसी भी सैन्य ताकत से अधिक मजबूत हैं। जेकेएलएफ के अध्यक्ष यासीन मलिक ने कहा कि सैन्य प्रमुख की टिप्पणी अतार्किक है। वास्तव में इन अलगाववादियों की मुख्य भूमिका बंद आयोजित करना और हिंसा भड़काना है। ये युवाओं को पत्थरबाजी के लिए पैसे देते हैं और उनके मारे जाने पर फर्जी तरीके से शोक मनाते हैं।
वे इस हकीकत से वाकिफ हैं कि कोई भी देश, खासकर भारत कभी-भी किसी भी कारण से अपने एक हिस्से को खुद से अलग नहीं होने देगा, जैसा कि इतिहास का सबक है। भारत ने नगा और मिजो अलगाववाद से दशकों लड़ाई लड़ी और उनके नेताओं को आखिरकार एहसास हो गया कि समाधान सिर्फ बातचीत से निकल सकता है और जोकि अब लगभग अंतिम दौर में भी है। पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश का निर्माण इसलिए हो सका, क्योंकि इसके पीछे भारतीय सेना का समर्थन और उसकी ताकत थी।
पाकिस्तानी सेना के पास ऐसी स्थिति से निपटने के लिए न तो क्षमता है और न ही संकल्प। 'आजादी' वास्तव में दिवास्वप्न है, जिसकी वजह से अनेक लोग मारे जा रहे हैं,क्योंकि राज्य की ताकत को चुनौती देने की कोशिश की जा रही है। अलगाववादी सच का बयान नहीं कर सकते, क्योंकि उनकी जीवनशैली को पाकिस्तान से फंडिंग मिलती है और उनमें से अनेक बच्चे और रिश्तेदार वहां रहते हैं। यदि वे अपना सुर बदलते हैं, तो उनके अस्तित्व पर संकट आ जाएगा, यहां तक कि उन्हें निशाना भी बनाया जा सकता है।
अलगाववादी उनके समर्थक सेना के हाथों मारे जाने वाले स्थानीय आतंकवादियों का महिमामंडन करते हैं, ताकि वहां के बेरोजगार युवकों को उग्रवाद से जुड़ने के लिए भड़काया जा सके। इसीलिए सेना प्रमुख ने कहा कि मारे जा रहे आतंकवादियों की संख्या से फर्क नहीं पड़ रहा है। मसलन, हाल ही में मारे गए आतंकवादियों में से कुछ तो कुछ दिन पहले या कुछ हफ्ते पहले ही आतंकवाद से जुड़े थे। स्थानीय अलगाववादियों और पाकिस्तान के बुरहान वानी का महिमांडन करने का ही नतीजा है कि पिछले दो वर्ष के दौरान 110 युवा आतंकवादी बन गए।
ऑपरेशन में शामिल सैन्य बलों का लक्ष्य आतंकवादियों का खात्मा करना है। उनके काम में बाधा डालने से मौतों की संख्या ही बढ़ेगी। वास्तव में सेना तो बहुत हलके हथियार इस्तेमाल कर रही है, न कि पैलेट गन जिससे मौत हो जाती है। मुठभेड़ या समपर्ण करने वाली जगहों से यदि स्थानीय लोग हट जाएं, तो मौतें घट सकती हैं। यह सब जानते हैं कि सिर्फ सैन्य कार्रवाई इस संकट का समाधान नहीं है।
सेना सिर्फ आतंकवाद में कमी लाकर सही माहौल बनाने में राज्य की मदद कर सकती है, ताकि उन मसलों को सुलझाने के लिए राजनीतिक प्रक्रिया शुरू की जा सके, जिनके कारण आतंकवाद पनपा। सेना प्रमुख सिर्फ यही संदेश देना चाहते थे कि सेना वहां उत्पीड़न के लिए नहीं है, उसे वहां राष्ट्रविरोधी तत्वों को खत्म करने की जिम्मेदारी दी गई है।