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इंचियोन से क्या लेकर आए

Sun, 05 Oct 2014 04:59 PM IST
प्रमोद जोशी
प्रमोद जोशी Updated Sun, 05 Oct 2014 04:59 PM IST
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What brought from Incion

इंचियोन के एशियाई खेलों में जब भारत की टीम जा रही थी, तब यह उम्मीद जाहिर की गई थी कि 2010 के गुआंगझू एशियाड के मुकाबले इस बार हम बेहतर प्रदर्शन करेंगे। गुआंगझू में हमें 65 पदक मिले थे। एशियाई खेलों में वह हमारा अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था। इसके पहले वर्ष 1982 के दिल्ली एशियाड में हमें 57 मेडल मिले थे। पहला एशियाई खेल 1951 में दिल्ली में हुआ था। तब पदक तालिका में 51 मेडलों के साथ हम दूसरे स्थान पर रहे थे, जबकि 60 पदकों के साथ जापान पहले स्थान पर था। 1982 में कुल 57 मेडलों के साथ हम पांचवें स्थान पर, 2010 में छठे पर और इस बार 57 मेडलों के साथ आठवें स्थान पर रहे। जबकि 342 पदकों के साथ चीन पहले स्थान पर रहा।

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खेलों को आर्थिक-सामाजिक विकास का संकेतक मानें, तो हमारी कोई सुंदर तस्वीर उभर कर नहीं आती। दूसरी ओर, चीन की तस्वीर लगातार निखर रही है। 1949 की कम्युनिस्ट क्रांति के 35 साल बाद 1984 के लास एंजेलिस ओलंपिक में चीन को पहली बार भाग लेने का मौका मिला और उसने 15 स्वर्ण, आठ रजत और नौ कांस्य पदक जीतकर चौथा स्थान हासिल किया था। उस ओलंपिक में सोवियत गुट के देश शामिल नहीं थे। पर चीन ने धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराकर अपनी भावी वैश्विक महत्ता को दर्ज कराया था।
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वर्ष 1988 के सियोल ओलंपिक में सबसे ज्यादा मेडल जीतकर सोवियत संघ ने जोरदार वापसी की थी। चीन उस ओलंपिक में 11वें स्थान पर रहा। 1992 का बार्सिलोना ओलंपिक सोवियत संघ के विघटन की पृष्ठभूमि में हुआ, जहां चीन फिर चौथे स्थान पर आया। 1996 में भी वह चौथे स्थान पर रहा, 2000 के सिडनी ओलंपिक में तीसरे स्थान पर आया और 2004 के एथेंस ओलंपिक में दूसरे स्थान पर। 2000 के ओलंपिक खेल चीन अपने यहां आयोजित करना चाहता था, ताकि यह कह सके कि इक्कीसवीं सदी चीन की है। ऐसा हो नहीं पाया, पर 2008 के बीजिंग ओलंपिक को उसने जबर्दस्त तरीके से ‘शोकेस’ किया। सिर्फ आयोजन से ही नहीं, अपने प्रदर्शन से भी। कुल 100 पदक जीतकर वह उसमें पहले स्थान पर आया।
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एटम बमों से तबाह जापान ने युद्ध के बाद बीस साल में जो चमत्कार किया, वह उसने 1964 के टोक्यो ओलंपिक में दिखाया था। प्रतीक थी बुलेट ट्रेन, जो ओलंपिक के मौके पर शुरू की गई थी। दूसरा विश्वयुद्ध न रोकता, तो 1940 का ओलंपिक टोक्यो में होता। जापान के बाद 1988 में दक्षिण कोरिया ने खुद को ‘शोकेस’ किया। ऐसा ही मौका 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स के मार्फत भारत को भी मिला था, पर ये खेल उल्टे गले पड़े। बात केवल आयोजन क्षमता की नहीं है। खेल सामाजिक विकास की कहानी भी कहते हैं। इस मामले में हम अफ्रीका के देशों से भी पीछे हैं। केमरून, इथियोपिया, घाना, हैती, केन्या, मोजांबिक, नाइजीरिया और उगांडा जैसे देशों ने भी ओलंपिक में भारत के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया है।

इंचियोन एशियाड में हमारी महत्वाकांक्षा 70 से 75 पदक हासिल करने की थी। वह भी पूरी नहीं हुई। हमारे लक्ष्य ही इतने छोटे हैं कि क्या कहें! चीन ने इस एशियाई गेम्स का इस्तेमाल वर्ष 2016 के रियो डि जेनेरियो ओलंपिक की तैयारी के रूप में किया। हमारे लिहाज से इन खेलों में सबसे बड़ी सफलता हॉकी टीम का रियो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई करना है। अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ की रैंकिंग में हमारा स्थान नौवां हैं। यदि हम एथलेटिक्स के विश्व स्तर को देखें, तो हमारे खिलाड़ी पंद्रहवें और बीसवें स्थान पर भी नहीं दिखाई पड़ेंगे। खेल सिर्फ शारीरिक सौष्ठव और दम-खम का परिचय ही नहीं देते। इनसे यह भी पता चलता है कि हम कितने अनुशासनबद्ध हैं, प्रतिभाओं का किस तरह सम्मान करते हैं और प्रतियोगिता को कितना बढ़ावा देते हैं। जीवन के हर क्षेत्र में हमें ज्यादा दृढ़तर होना चाहिए। लंदन ओलंपिक में एक हजार के आस-पास पदक दिए गए थे। उनमें से छह हमें मिले! वह हमारी ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

खेलों का रिश्ता सामाजिक संरचना और जीन्स से भी होता होगा। मसलन कैरीबियन सागर के छोटे से देश जमैका का स्प्रिंट यानी छोटी दूरी की रेसों में बोलबाला है। उसैन बोल्ट और अफाफा पॉवेल इसके उदाहरण हैं। मैराथन जैसी लंबी दूरी की दौड़ में अफ्रीका के केन्या और इथियोपिया जैसे देशों की धाक है। कुश्ती और बॉक्सिंग में पूर्वी यूरोप और एशिया की सीमा के कॉकेशियन लोग सफल हैं। मोटे तौर पर गोरे यूरोपियन, अफ्रीकी मूल के अश्वेत और चीनी मूल के खिलाड़ी खेल के मैदान पर राज करते हैं। आर्थिक महाशक्ति के रूप में अमेरिका इन तीनों तरह के खिलाड़ियों को प्रश्रय देता है और दुनिया का नंबर एक देश है। बैडमिंटन और टेबल टेनिस प्रतियोगिताओं के ज्यादातर विजेता चीनी मूल के खिलाड़ी होते हैं।

चीन में खेलों के उत्कर्ष के सामाजिक-राजनीतिक कारण भी हैं। चीनी सरकार सावधानी के साथ खेलों पर पैसा खर्च करती है और महंगे प्रशिक्षण की व्यवस्था करती है। आर्थिक खुलेपन के साथ वहां खेलों के वित्तपोषक भी बढ़े हैं। वैसे ही, जैसे हमारे यहां क्रिकेट में। पर हमारी व्यावसायिकता राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को बढ़ाने में मददगार नहीं हुई। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने एशियाई खेलों के लिए ट्वंटी-20 क्रिकेट टीम भेजने से मना कर दिया। इस तरह महिला और पुरुष वर्ग के दो संभावित स्वर्ण हमने खो दिए। क्रिकेट ने हमें मैच फिक्सिंग के नाम पर बदनामी ही दी है।


हमारा समाज ‘तिकड़म’ को खेल मानता है। जबकि ‘खेल भावना’ पारदर्शी बनने को कहती है। इस मामले में हमें सानिया मिर्जा की तारीफ करनी होगी, जिन्होंने प्रफेशनल टेनिस टुअर के अंक गंवाने का जोखिम उठाया और टीम को स्वर्ण दिलाने में मदद की। सामाजिक बदलाव में खेल अपनी भूमिका जरूर अदा करेंगे, पर तभी, जब समाज खेलों की इज्जत करेगा। इस बात को समझने की जरूरत है।

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