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पश्चिम एशिया: सीरिया, तख्तापलट और गैस का खेल... मुक्त बाजार नीति से बढ़ी सामाजिक-आर्थिक असमानता, नतीजा सामने
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सीरिया में तख्तापलट के बाद हालात नाजुक
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
सीरिया में बशर अल-असद की सत्ता का पतन हो गया है और अपदस्थ शासक भाग खड़े हुए हैं। लेबनान में उतरने की अनुमति नहीं मिलने पर उनका विमान यू-टर्न लेता हुआ रूसी बेस टार्टस की ओर बढ़ गया और तभी से वह वाणिज्यिक रडार से गायब है। आशंका यह भी है कि तुर्किये द्वारा उपलब्ध कराई गई अमेरिकी मिसाइल से उन्हें मार गिराया गया हो। उनका परिवार कुछ दिन पहले ही रूस चला गया था।दरअसल, जिहादी समूह हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस) की अगुवाई में विद्रोहियों ने नवंबर के अंत में बड़ा संघर्ष छेड़ा और सीरिया के सबसे बड़ शहर अलेप्पो समेत कई प्रमुख शहरों पर कब्जा करने के बाद आठ दिसंबर को राजधानी दमिश्क को भी अपने कब्जे में ले लिया। सेना के अधिकारी इराक भाग गए, जो कभी तानाशाह सद्दाम हुसैन के अधीन उनके सबसे बड़े हितैषी थे। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मामले में कहा कि सीरिया हमारा दोस्त नहीं है और वहां जो कुछ भी हो रहा है, उससे हमें कोई मतलब नहीं, क्योंकि यह हमारी लड़ाई नहीं है। कभी अलकायदा से संबद्ध रहा जभात अल-नुसरा, जिसे हयात तहरीर अल-शाम के नाम से जाना जाता है, ने पहले तुर्किये से सटे इदलिब प्रांत में जबर्दस्त हमला किया। इसके बाद अलेप्पो पर कब्जा करने समेत 72 घंटे में ही राजधानी दश्मिक पर चढ़ाई कर दी। एक विद्राेही नेता ने खुलासा किया है कि वे इसके लिए बीते पांच वर्षों से तुर्किये में ट्रेनिंग ले रहे थे।
सीरियाई सरकार के सबसे बड़े सहयोगी ईरान, रूस और लेबनानी लड़ाके हिजबुल्ला थे, जबकि विद्रोहियों को अमेरिका, तुर्किये, सऊदी अरब, कतर, ब्रिटेन, फ्रांस, इस्राइल और नीदरलैंड से राजनीतिक और सैन्य समर्थन मिला। तहरीर अल-शाम के चालाक नेता अबू मोहम्मद अल-जोलानी ने सीएनएन को दिए साक्षात्कार में कहा कि हमें बशर अल-असद को उखाड़ फेंकने का काम सौंपा गया था और यही हमारा भी मकसद था। अल-जोलानी कट्टर इस्लामवादी है, जिसने इराक में अमेरिका के खिलाफ अलकायदा के लिए लड़ाई लड़ी थी और 2018 में अमेरिका ने एचटीएस को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित कर उस पर एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा था। अल-जोलानी ने कहा कि ईरानियों ने समय लेकर शासन को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया और रूस ने इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की। रूस के सबसे सुरक्षित चार सैन्य अड्डे सीरिया में हैं। सीरिया का बड़ा हिस्सा अमेरिका समर्थित कुर्द लड़ाकों और तुर्किये समर्थित सुन्नी गुट के नियंत्रण में था और पूर्वी सीरिया को अमेरिका नियंत्रित कर रहा था। इस्राइल ने जब जरूरी समझा, तभी हवाई हमले किए। इससे आईएस हार गया, लेकिन वह छिप कर धावा करने की शैली वाले हमले करता रहा।
सवाल यह है कि सीरिया में 2011-2012 में गृहयुद्ध क्यों शुरू हुआ? दरअसल, यह सब मामला गैस का है। अमेरिका और उसके सहयोगी कतर की गैस को तुर्किये के रास्ते सऊदी अरब, जॉर्डन और सीरिया से होते हुए यूरोप तक पाइपलाइन से ले जाना चाहते रहे हैं, ताकि यूरोप की रूसी प्राकृतिक गैस पर निर्भरता खत्म हो जाए, विशेषकर सर्दियों के दिनों में। रूस और उसके सहयोगी 5,600 किलोमीटर पाइपलाइन ईरान-इराक-सीरिया के रास्ते बनाना चाहते थे, जो रूस के सहयोगियों को मजबूत करने के साथ ही ईरानी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती। वर्तमान में जो भी फसाद हुआ है, उसके पीछे की असल वजह पाइपलाइन ही है।
बशर अल-असद ने वर्ष 2010 में कतर द्वारा दिए गए दस अरब डॉलर की गैस पाइपलाइन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। वह यूरोप में रूस के वाणिज्यिक गैस हितों की रक्षा करना चाहते थे। वर्ष 2019 में लीक हुए दस्तावेजों से पता चलता है कि सीआईए ने सीरिया में गृहयुद्ध को भड़काने के लिए फंडिंग की और बशर अल-असद पर इस्तीफा देने के लिए दबाव बनाया, ताकि अमेरिकी समर्थक को राष्ट्रपति पद पर बैठाकर अपने हिसाब से समझौते करवाए जाएं। इसलिए तथाकथित रूप से वर्ष 2011 में अरब स्प्रिंग (सरकारों के खिलाफ विद्रोह) पूरे क्षेत्र में फैल गया, ट्यूनीशिया, मिस्र और लीबिया में तानाशाहों को उखाड़ फेंका तथा यमन, बहरीन और सीरिया में महंगाई, भाई-भतीजावाद, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। फ्री सीरियन आर्मी जैसे विद्रोही समूहों को पश्चिम और तुर्किये की खुफिया एजेंसियों का साथ मिला। सीरिया के सहयोगी ईरान, लेबनान का हिजबुल्ला और रूस उसके बचाव में उतर आए।
पश्चिम पूरी तरह से विद्राेहियों के साथ था, क्योंकि वे बशर को पसंद नहीं करते थे। बराक ओबामा के समय अमेरिका की विदेश मंत्री रहीं हिलेरी क्लिंटन ने वर्ष 2012 में घोषणा कर दी थी कि बशर अब कुछ ही दिन के राष्ट्रपति हैं। क्लिंटन ने इस्तांबुल में फ्रेंड्स ऑफ द सीरियन पीपुल के एक सम्मेलन में भाग लेने के बाद कहा था, ‘असद को जाना ही होगा।’ लेकिन वर्ष 2015 में रूस ने उनकी सत्ता बचा ली थी। रूस ने इस बार भी विद्रोहियों पर बमबारी की, लेकिन वे आगे बढ़ते गए, जिसने वर्ष 2014 के इस्लामिक स्टेट (आईएस) के मार्च की याद दिला दी। वर्ष 2017 में इस्लामिक खलीफा के अमीर अबू बक्र अल-बगदादी ने खुद को उड़ा लिया था। इस्राइल ने पश्चिमी सीरिया में हिजबुल्ला और ईरानी सेनाओं पर बार-बार हमले किए हैं। अगस्त 2016 में तुर्किये ने उत्तरी सीरिया पर बहुआयामी हमले किए। अक्तूबर 2019 में डोनाल्ड ट्रंप ने अल-बगदादी के खात्मे के बाद उत्तर-पूर्वी सीरिया से तत्काल अमेरिकी फौजों को बुला लिया था, लेकिन तुर्किये को चेतावनी दी थी कि उसके फैसले का गलत लाभ न उठाया जाए, अन्यथा तुर्किये की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया जाएगा।
सीरियाई संघर्ष में दस लाख से अधिक लोगों की मौत हुई, जो 21वीं सदी में द्वितीय कांगो युद्ध के बाद दूसरा सबसे बड़ा घातक संघर्ष बन गया। वर्ष 2023 की अंकारा बमबारी के जवाब में तुर्किये की सेना ने वर्ष 2023 के अंत में सीरियाई डेमोक्रेटिक सेना को लक्षित कर उत्तर-पूर्वी सीरिया में हवाई और जमीनी हमले किए। हालांकि यह भी सच है कि बशर द्वारा मुक्त बाजार नीतियों में तेजी लाने के बाद से सामाजिक और आर्थिक असमानता काफी बढ़ गई थी। इन नीतियों की वजह से देश की अल्पसंख्यक आबादी को लाभ पहुंचा, जो सरकार के साथ जुड़ी थी। देश उच्च युवा बेराेजगारी का सामना कर रहा था। इसलिए कुछ तो होना ही था। इसका नतीजा यही हुआ जो आप देख रहे हैं।