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हम लड़ेंगे, तभी तो जीतेंगे
सुभाषिनी सहगल अली
Updated Thu, 12 Mar 2015 08:34 PM IST
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विगत आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस चुपचाप निकल गया। यह महिलाओं के संघर्षों की गाथा और उनके भावी संघर्षों की तैयारी का मौका होता है। असमानताओं को लगातार बढ़ाने में अपना हित देखने वाली समाज व्यवस्था चलाने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि महिलाओं की असमानता से उन्हें कितना लाभ मिलता है। यही वह संदर्भ है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से प्रेरणा लेना महिला आंदोलन के आगे बढ़ने के लिए अनिवार्य है।
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत यूरोप के समाजवादी महिला संगठन के वार्षिक सम्मेलन में 1910 में हुई थी। एक महान कम्यूनिस्ट महिला नेता क्लारा जेटकिन ने इसका प्रस्ताव रखा था। उसके एक साल पहले, 28 फरवरी को न्यूयॉर्क की बहादुर महिला मजदूरों ने ऐतिहासिक जुलूस निकालकर प्रदर्शन किया था। उन मजदूरों के संघर्ष को याद करते हुए क्लारा जेटकिन ने 11 मार्च को महिला दिवस के रूप में पूरी दुनिया में मनाने का प्रस्ताव रखा, जो तुरंत पारित हो गया। बाद में यह तारीख बदलकर आठ मार्च कर दी गई। शुरुआत से ही यह दिवस महिला मजदूरों के क्रूर शोषण के खिलाफ संघर्षों के साथ जुड़ा हुआ था। उस जमाने में, जब पुरुषों को वोट देने का अधिकार कहीं आंशिक, कहीं पूर्ण रूप में और कहीं बिल्कुल भी नहीं मिला था, तब महिलाओं ने वोट पाने के अधिकार के लिए अपना तीखा संघर्ष शुरू कर दिया।
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास में तमाम मील के पत्थर हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, आठ मार्च, 1917 का दिन, जब भूख, महंगाई और जार के शोषण के खिलाफ आक्रोश से भरी औरतों ने रूस के सबसे बड़े शहर सेंट पीटर्सबर्ग में प्रदर्शन किया। आंदोलन तेज होते ही जार ने अपनी गद्दी छोड़ने का फैसला किया। कुछ वर्षों के बाद, जब सोवियत यूनियन का पहला संविधान तैयार किया गया, तब समानता सुनिश्चित करने की तमाम धाराओं के साथ रूस की औरतों को वोट देने का अधिकार भी मिल गया। इसी तरह आठ मार्च से प्रेरणा लेते हुए यूरोप के एक छोटे-से देश आइसलैंड की महिलाओं ने तमाम क्षेत्रों में-वेतन, घर के काम की जिम्मेदारी, काम के अवसर इत्यादि-अपनी असमानताओं से आजिज आकर एक दिन के हड़ताल का फैसला लिया।
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24 अक्तूबर, 1975 को आइसलैंड की 90 फीसदी महिलाओं ने कोई काम नहीं किया; न घर में और न ही दफ्तर में। वर्ष 1976 में आइसलैंड की सरकार ने महिलाओं को हर क्षेत्र में समान अधिकार प्राप्त कराने का कानून पारित किया।
अपने देश में भी ऐसी हड़ताल की जरूरत है। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि भारत में महिलाओं को जरूरत से ज्यादा अधिकार मिल गए हैं, लेकिन घटनाएं कुछ और बताती हैं। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के पत्थरदेवा गांव के दीवान टोला में विगत छह मार्च की सुबह 17 साल की एक लड़की को तथाकथित ऊंची जाति के चार लोगों (तीन भाई और एक उसके पिता) ने घर से बाहर खींचा और फिर उसे आग के हवाले कर दिया। उसका कुसूर यही था, कि वह दलित थी और पढ़ने में तेज थी। पुलिस आरोपियों की तलाश कर रही है, जबकि लड़की की स्थिति गंभीर है।
अपनी कीमत का एहसास दिलाने के लिए हमारे देश की महिलाएं पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती हैं। फिर भी समानता उनके हाथ नहीं लगती। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें सिखाता है कि हम लड़ेंगे, तो जीतेंगे। अपने लिए ही नहीं, सबके लिए।