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सच्ची बात बताकर देख
वसीम अहमद नगरामी
Updated Sat, 20 Dec 2014 08:39 PM IST
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डर, न यूं घबराकर देख,
कविता एक सुनाकर देख।
मुमकिन है कर भी दे माफ,
सच्ची बात बताकर देख।
व्यर्थ ये नयन भिगोना है,
होगा वही जो होना है।
कह दे अब, कह भी दे बात,
अन्तःस्थल के सब जज्बात,
गम को जरा भुलाकर देख।
गीत प्रीत के गाता चल,
सब में खुद को पाता चल।
यूं ही सबको भाता चल,
सबके मन का गाकर देख।
साथ न कोई निभाता देख,
संग न कोई जाता देख,
हर एक तन्हा जाता देख
अपने गीत में ये सच्चाई,
दुनिया को बतलाकर देख
डर, न यूं घबराकर देख।