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दलित हितों का वह योद्धा

Sat, 06 Sep 2014 08:42 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
कल्लोल चक्रवर्ती Updated Sat, 06 Sep 2014 08:42 PM IST
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warrior of dalits

'आत्मकथा' और 'रचनावलियों' से वंचित मान्यवर कांशीराम पर पहली प्रामाणिक किताब उनकी मृत्यु के आठ वर्ष बाद आई है, तो यही दलितों के प्रति हमारी सामूहिक चेतना के बारे में बताने के लिए काफी है!

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भारतीय राजनीति में कांशीराम की विशिष्ट जगह है। वह अंबेडकर के बाद दलितों के सबसे बड़े हितचिंतक थे। बल्कि दलित वर्ग को सत्ता राजनीति के केंद्र में लाने के लिहाज से कांशीराम का योगदान अंबेडकर से ज्यादा ही होगा।
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यह अलग बात है कि दलित उत्थान की जिस मुहिम में कांशीराम लगे थे, वह अंबेडकर से प्रेरित थी। इसके बावजूद ‘बामसेफ’ और ‘डीएसफोर’ से बहुजन समाज पार्टी तक का उनका सफर जिस समर्पण भावना, त्याग और संघर्ष के जरिये संभव हुआ, वह विस्मित करने वाला है।
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वह पंजाब में पैदा हुए, जहां दलितों की विराट आबादी है, महाराष्ट्र में उन्होंने अपना कर्म जीवन शुरू किया, जहां दलितों की वर्गीय चेतना ने पहली बार राष्ट्रीय आकार लिया और आखिरकार उत्तर प्रदेश को उन्होंने अपनी राजनीति का क्षेत्र बनाया, जहां दलितों की न सिर्फ बड़ी आबादी रहती है, बल्कि जहां उन्हें सामंती शोषण का सर्वाधिक शिकार भी होना पड़ता है।
 
यह किताब कांशीराम की दलित चेतना और उनके राजनीतिक जीवन को पूरी व्यापकता में चित्रित करती है। पंजाब के एक गेस्ट हाउस में ठहरे अधिकारी के लिए पंखा खींचते पिता का खाना लेकर गए स्कूली छात्र कांशीराम ने पहली बार दलित होने की पीड़ा महसूस की थी।

पर वह दलित हितों की बात करने वाले बौद्धिक नहीं, अखाड़े से निकले पहलवान थे, इसलिए अपने शहर के होटल में दलितों की अवमानना के जिक्र पर सवर्णों को पीट सकते थे।

वर्षों बाद पुणे में एक रात ईरानी रेस्तरां के नौकर ने जब उनकी साइकिल चुरा ली थी, तब हताशा और क्रोध में उन्होंने उसे पीटा था और साइकिल वापस ली थी। साइकिल सपा का चुनाव चिह्न भले हो, पर दलितों को सक्रिय करने के लिए मान्यवर ने इसका जिस तरह इस्तेमाल किया, वह अपनी मिसाल आप है।

मजबूत कद-काठी के कांशीराम की संघर्षशील छवि भी कई बार सामने आती है। दलित सम्मेलन में शामिल होने के लिए पोस्टरों का बंडल थामे कांशीराम जनरल क्लास में चढ़ते हैं और फर्श पर बैठ जाते हैं।

थके होने के कारण उन्हें नींद आती है, तो चोर उनकी जेब से बटुआ उड़ा लेता है। गंतव्य पर उतरने पर वह एक तांगेवाले को अपनी मजबूरी बताते हैं, लेकिन वह नहीं सुनता, तो पैदल चल देते हैं।

इसी तरह बामसेफ के दौर में पुणे में दोस्त मनोहर आटे के साथ देर रात लौटते हुए उनकी साइकिलें कई बार होटल के पास नहीं रुकती थीं, क्योंकि जेब में खाने के लिए पैसे नहीं होते थे! जब साइकिल में हवा भराने के पांच पैसे भी जेब में न होते, तो पैदल ही स्टेशन के लिए चल पड़ते।

महाराष्ट्र में दलित हितों के उत्थान को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बनाया, जिसके लिए उन्होंने नौकरी तो छोड़ी ही, परिवार से भी नाता तोड़ा।

उन्होंने दलित सरकारी कर्मचारियों को जोड़ा और जगह-जगह अंबेडकर मेले आयोजित करने शुरू किए। शुरुआत में वह आरपीआई से भी जुड़े, लेकिन जल्दी ही न सिर्फ उसे एक चूकी हुई ताकत समझ लिया, बल्कि भारतीय राजनीति में दलित मौजूदगी की व्यर्थता को भी भांप लिया। इसलिए बाबू जगजीवन राम से रामविलास पासवान तक कोई भी उनकी नजर में वास्तविक दलित नेता नहीं थे।

बसपा की मौजूदा स्थिति और मायावती इस किताब के विषय उतने नहीं हैं, पर लेखक बताते हैं कि आईएएस की तैयारी कर रही प्रखर वक्ता मायावती से मिलने कांशीराम एक बार उनके घर पहुंचे थे, जिसके बाद भारतीय राजनीति का चेहरा ही बदल गया।

उत्तर प्रदेश में बसपा को विस्तार देते हुए कांशीराम ने जगह-जगह से प्रतीक पुरुष इकट्ठा किए। बुंदेलखंड से झलकारी बाई, अवध और इलाहाबाद में बिजली महाराज, रायबरेली और जौनपुर में दलदेव महाराज, पूर्वांचल और अवध के कुछ हिस्से में बालदीन, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर में उदा देवी, वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, बस्ती और देवरिया में महामाया और वाराणसी, जौनपुर और आजमगढ़ में संत रविदास इसी के उदाहरण थे। बसपा के भीतर पारदर्शी लोकतंत्र का जो अभाव आज दिखता है, वह कांशीराम के समय से ही है, जब तमाम पदाधिकारी उनके द्वारा चुने जाते थे और उनके प्रति जवाबदेह होते थे।


लेखक ने इस विवाद से भी धुंध हटाई है कि अपने आखिरी दिनों में मायावती के पास कांशीराम अपनी मर्जी से थे, किसी दबाव में नहीं। कांशीराम पर लिखी इस किताब का मूल्यांकन इसके लेखक बद्री नारायण पर लिखे बगैर संभव नहीं है। रामचंद्र गुहा से प्रेरणा लेने के बाद उन्होंने यह किताब लिखी, जिसके हर अध्याय में श्रम और शोध की छाप दिखती है। चूंकि कांशीराम पर पहले से सामग्री नहीं थी, इसलिए भी बद्री नारायण की चुनौती बड़ी थी। कांशीराम की राजनीति की प्रयोगशाला चूंकि उत्तर प्रदेश है और उनके समर्थक-अनुयायी मूलतः हाशिये के लोग, लिहाजा इस किताब का हिंदी अनुवाद जितनी जल्दी आए, यह कांशीराम और उनकी राजनीति को समझने के लिए उतना ही अच्छा होगा।

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