फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Voters impatient for real change

असली परिवर्तन के लिए बेसब्र मतदाता

Thu, 19 Feb 2015 11:56 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Thu, 19 Feb 2015 11:56 PM IST
विज्ञापन
Voters impatient for real change

दिल्ली जीतने और मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अरविंद केजरीवाल ने अपने समर्थकों को जो बात कही, वह यह है-अहंकारी नहीं होना है, दिल्ली की जनता की सेवा करनी है। चुनाव प्रचार का मुख्य संदेश यही गया था मतदाताओं को कि पिछले आठ महीनों में मोदी सरकार की जो उपलब्धियां रही हैं, उन्हें ध्यान में रखकर वोट डालिए। अहंकार नहीं, तो क्या था यह? किरण बेदी ने इससे भी आगे बढ़कर कहा, इंडिया उड़ रहा है न? अब दिल्ली भी इस तरह उड़ना चाहती है न? समस्या यह है कि भारत अभी तक 'उड़' नहीं रहा है। आम आदमी के जीवन में अच्छे दिनों का वैसा ही अभाव है, जैसा पिछले दशक में था। बिजली-पानी की वही समस्याएं हैं, पुलिस वाले उसी तरह लेते हैं हफ्ता, और उसी बेरहमी से पेश आते हैं आम नागरिक के साथ। सरकारी अधिकारियों के तौर-तरीकों में भी कोई फर्क नहीं दिखा है, और मोदी के मंत्रियों का अहंकार तो इतना है कि आम लोगों से मिलना तो दूर की बात, हम पत्रकारों के लिए भी उनसे मिलना मुश्किल हो गया है। पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों में मीडिया का अधिकार माना जाता है मंत्रियों से जवाबदेही मांगना। यह बात केंद्रीय मंत्री भूल गए बिल्कुल वैसे, जैसे सोनिया-मनमोहन सरकार के मंत्री भूले थे।

विज्ञापन


दिल्ली वासियों को वही लालबत्ती-वीआईपी कल्चर दिखा है पिछले आठ महीनों में, जिसे देखकर वे पहले से परेशान थे। परिवर्तन सिर्फ इतना कि लालबत्ती वाली गाड़ियों के अंदर चेहरे और आलीशान कोठियों में निवासी बदल गए। क्या हुआ उस परिवर्तन का, जिसका वायदा करके नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने? झुग्गी-बस्तियों में वही समस्याएं बिजली-पानी की, महिलाओं के लिए सुरक्षा की वही चिंता। तो जब अरविंद केजरीवाल वापस लौटे इस शहर में, और हाथ जोड़कर माफी मांगने लगे लोगों से, तो अच्छा लगा लोगों को, फिर असली परिवर्तन का सपना जग गया उनमें। केजरीवाल और उनके साथियों में विनम्रता दिखी, सेवा करने की भावना दिखी। आम आदमी के जीवन में कितनी ही समस्याएं हैं-आवास की समस्या, रोजगार की समस्या, बच्चों के स्कूल में दाखिले की समस्या, बिजली-पानी की बुनियादी समस्याएं और अन्य कई समस्याएं, जो आज के नए मतदाता न समझ सकते हैं और न बर्दाश्त करना चाहते हैं। मोदी सरकार से उनकी अपेक्षा यह नहीं थी कि आठ महीनों में ही इनका हल हो जाएगा, लेकिन यह अपेक्षा जरूर थी कि इन आठ महीनों में परिवर्तन के आसार तो दिखने लगेंगे। ऐसा नहीं हुआ किसी भी क्षेत्र में। सो विनम्रता से अर्ज करती हूं कि परिवर्तन न आने के कारण ही मोदी दिल्ली हारे हैं। शिकायत दिल्ली वालों को यह भी है कि प्रधानमंत्री दिल्ली से दूर रहे हैं अब तक।
विज्ञापन


प्रधानमंत्री को इस चुनाव से सीख यह लेनी चाहिए कि बहुत बेसब्र हैं देश के मतदाता असली परिवर्तन के लिए। जो राजनेता परिवर्तन लाने की क्षमता नहीं दिखाते हैं, उन्हें वोट नहीं मिलेगा। परिवर्तन दिल्ली में अगर आया है कोई पिछले आठ महीनों में, तो सिर्फ यह कि जो भाईचारा यहां कायम रहा है 1984 के बाद, उसमें कट्टर हिंदुत्ववादियों ने जहर घोलने की कोशिश की है। सो, युवा मतदाताओं ने एक संदेश यह भी भेजा है मोदी को कि उन्हें धार्मिक झगड़ों में कोई दिलचस्पी नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed