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विदेश नीति में दूरदृष्टि हो

Mon, 01 Dec 2014 08:10 PM IST
विनीत नारायण
विनीत नारायण Updated Mon, 01 Dec 2014 08:10 PM IST
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vision should be in foreign policy

बराक ओबामा गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि बनने आ रहे हैं। इससे देश में उत्साह है। भावुक लोग मान बैठे हैं कि अमेरिका ने विदेश नीति में आमूलचूल परिवर्तन कर पाकिस्तान की तरफ से मुंह मोड़ लिया है। पर यह सोचना भूल है कि अमेरिका अब केवल भारत का हित साधेगा। उसकी विदेश नीति भावना से नहीं, जमीनी हकीकत से तय होती है। वह अपनी पाकिस्तान और अफगानिस्तान नीति में जल्दबाजी में कोई परिवर्तन नहीं करने जा रहा।

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यही बात जापान पर भी लागू होती है। भारत मान बैठा था कि जापान चीन के मुकाबले भारत को मजबूत करेगा। पर अचानक जापान ने अपना रवैया बदल दिया। जापान ने आज तक भारत के पूर्वोतर राज्यों को, जिनमें अरुणाचल प्रदेश है, विवादित क्षेत्र नहीं माना। इसीलिए उसने पूर्वोतर में आधारभूत ढांचे में सहयोग करने का वायदा किया था। भारत खुश था कि इस तरह हमारी मदद कर जापान अपने दुश्मन चीन से परोक्ष युद्ध करेगा। पर ऐसा नहीं हुआ। जापान ने अचानक अरुणाचल को विवादित क्षेत्र मान लिया और यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि विवादित क्षेत्र में वह विकास कार्य नहीं करेगा। जापान को यह समझ में आया कि दूसरों की लड़ाई में वह खुद के संसाधन क्यों झोंके। जबकि उसके पास टापुओं के स्वामित्व को लेकर पहले ही चीन से निपटने के कई विवादित मुद्दे हैं।
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होना यह चाहिए था कि हम अपनी सीमाओं पर आधारभूत ढांचा खुद ही विकसित करते। 1986-89 की अरुणाचल की घटना के बाद, जब हमारी फौज ने 1962 में मैकमोहन लाइन के पास वाले छोड़ दिए गए क्षेत्रों पर पुनः कब्जा कर लिया, चीन ने यही काम किया है। यह कब्जा अधिकतर वायुसेना की भारी मदद से हुआ और आर्थिक दृष्टि से काफी महंगा पड़ा था। इसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर पड़ा और हमारा विदेशी मुद्रा भंडार कम रह गया।
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चीन को इससे झटका लगा। वह नहीं चाहता था कि भारत ऐसी क्षमता का पुनः प्रदर्शन करे। इसलिए उसने तिब्बत में सीमा के किनारे आधारभूत ढांचा तेजी से विकसित किया। पठारी क्षेत्र होने के कारण उसके लिए यह करना आसान था। जबकि अरुणाचल का पहाड़ कमजोर है और वहां लगातार भूस्खलन होते रहते हैं। जहां अरुणाचल की सीमा की दूसरी तरफ आधारभूत ढांचे के कारण चीनी सेना पूरे साल डटी रहती है, वहीं हमारे जवानों को इस सीमा पर जाकर अपने को मौसम के अनुकूल ढालने की कवायद करनी पड़ती है। इससे हमारी प्रतिक्रिया धीमी पड़ जाती है। दरअसल हमारे राजनेता विदेश नीति को घरेलू राजनीति और मतदाता की भावनाओं से जोड़कर तय करते हैं, जमीनी हकीकत से नहीं। इसलिए हम बार बार मात खा जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि वह जो कहें, उनमें जमीनी सच्चाई और कूटनीति का संतुलित सम्मिश्रण हो।


अब सीमा पर आधारभूत ढांचे के विकास का ही उदाहरण लें। चीन ने यह काम करते समय किसी मंच से यह नहीं कहा कि वह ऐसा भारत के खिलाफ अपनी सीमा को सशक्त करने के लिए कर रहा है। जबकि हमारी सरकार के हालिया बयानों में यही कहा गया कि सीमा पर रेल या सड़कों का जाल चीन से निपटने के लिए बिछाया जा रहा है। यह भड़काऊ शैली है, जिससे घाटा ज्यादा होता है। जरूरत इस बात की है कि हमारी विदेश नीति केवल नारों में ही आक्रामक न दिखाई दे, बल्कि उसके पीछे सेना की पूरी ताकत हो।

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