कामदार की जीत: मुझे बिल्कुल जानकारी नहीं थी कि नरेंद्र मोदी की जीत इस बार इतनी बड़ी होगी
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लेख की शुरुआत में ही मैं यह स्वीकार करती हूं कि मुझे बिल्कुल जानकारी नहीं थी कि नरेंद्र मोदी की जीत इस बार इतनी बड़ी होगी कि ऐतिहासिक मानी जाएगी। ऐसा नहीं है कि जनता की आवाज सुनने के लिए मैंने दिल से प्रयास नहीं किया था। चुनाव अभियान शुरू होने और उसके दौरान भी मैं राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में घूम रही थी। उस दौरान मैंने गांवों में जाकर आम मतदाताओं से बातें कीं और यह भी देखने का प्रयास किया कि मोदी की गरीबी हटाओ योजनाएं कितनी सफल रही हैं।
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लेख की शुरुआत में ही मैं यह स्वीकार करती हूं कि मुझे बिल्कुल जानकारी नहीं थी कि नरेंद्र मोदी की जीत इस बार इतनी बड़ी होगी कि ऐतिहासिक मानी जाएगी। ऐसा नहीं है कि जनता की आवाज सुनने के लिए मैंने दिल से प्रयास नहीं किया था। चुनाव अभियान शुरू होने और उसके दौरान भी मैं राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में घूम रही थी। उस दौरान मैंने गांवों में जाकर आम मतदाताओं से बातें कीं और यह भी देखने का प्रयास किया कि मोदी की गरीबी हटाओ योजनाएं कितनी सफल रही हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों के इन दौरों पर मैंने करीब सौ-सवा सौ लोगों से चुनावों के बारे में बातें की होंगी। इसके बावजूद, कि अधिकतर लोगों ने कहा कि उनका वोट मोदी को जाएगा, मुझे उस सुनामी का जरा भी पता नहीं लगा, जो पिछले बृहस्पतिवार को देश भर में आई और अपने साथ विपक्ष के उन तमाम राजनेताओं को बहा ले गई, जो कल तक प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रहे थे।
जिस दिन परिणाम आए, मैं जीटीवी के स्टुडियो में सुबह-सवेरे पहुंची और अपने पत्रकार बंधुओं से चर्चाएं कीं, जैसा हम लोग अक्सर चुनाव परिणाम आने से पहले करते हैं। हममें आम सहमति बनी कि नरेंद्र मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बन तो जाएंगे, लेकिन उनके लिए बहुमत हासिल करना मुश्किल होगा, क्योंकि उत्तर भारत में 2014 में जो सीटें उन्हें मिली थीं, उन्हें किसी हालत में दोबारा हासिल नहीं कर सकेंगे।
पिछली बार राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में उनको तकरीबन सारी सीटें मिली थीं और हमने मान लिया कि ऐसा दोबारा होना नामुमकिन है। सो जब परिणाम आने शुरू हुए और दोपहर होने से पहले ही लगा कि भाजपा इस बार अपनी पिछली बहुमत से भी बड़ी बहुमत हासिल कर सकती है, तो मैं हैरान रह गई।
ऐसा लगा, जैसे देश के मतदाताओं ने तय कर लिया हो आपस में कि मोदी बेशक अपने पहले कार्यकाल में अच्छे दिन नहीं ला सके हों, लेकिन ऐसा होना पांच वर्ष में असंभव है, सो उनको पांच वर्ष और देने चाहिए, वर्ना वही पुराना दौर लौट आएगा, जिसमें लोकतंत्र के भेष में उनको सामंतवाद मिलता था। जब राजनेता अपने चुनाव क्षेत्र को निजी जायदाद बनाकर अपने किसी वारिस के हवाले करते हैं, तो उसको लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। जब राजनीतिक दल भी इस तरह विरासत में दिए जाते हैं, तब सामंतवाद नहीं होता है, तो क्या होता है? सो लड़ाई वास्तव में नामदार और कामदार के बीच थी, जिसमें कामदार की जीत हुई है।
नामदार ने अगर इतना अहंकार नहीं दिखाया होता, तो शायद इतनी बुरी तरह नहीं हारते। अहंकार इतना कि प्रधानमंत्री पद की गरिमा भी भूल गए। मेरा अपना मानना है कि ‘चौकीदार चोर है’ वाला नारा कांग्रेस अध्यक्ष के लिए सबसे नुकसान कर गया। इस नारे में वैसे भी अहंकार दिखता है, लेकिन जब एक राजकुमार के मुंह से एक चायवाले के बेटे के लिए निकलता है, तो और भी बुरा लगता है।
सो मेरा इस चुनाव का प्राथमिक विश्लेषण यही है कि कांग्रेस के बुरी तरह हारने के दो मुख्य कारण थे : अहंकार और लोकतंत्र में लिपटा सामंतवाद। जनता को बेवकूफ बनाना अब इतना आसान नहीं है, जितना कभी था।