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उइगर तो बहाना है

Sun, 18 Nov 2018 07:47 PM IST
Mahendra Ved महेंद्र वेद
Updated Sun, 18 Nov 2018 07:47 PM IST
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Uyghur is an excuse
उइगर

मानव इतिहास कमजोरों के दमन के उदाहरणों से भरा हुआ है और हमलावर दूसरों द्वारा पोषित सभ्यताओं को नष्ट करते हैं। पश्चिम के उपनिवेशीकरण ने परंपरागत समाजों को क्षेत्रीय सीमाओं वाले राष्ट्रों में विभाजित किया, वे अब भी जातीयता, भाषा, धर्म, क्षेत्र और अन्य विभाजक चीजों के आधार पर और विभाजन के लिए लड़ रहे हैं।


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उइगरों के साथ चीन का बर्ताव कमोबेश वैसा ही है, जैसा पश्चिमी उपनिवेशों ने अतीत में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के लोगों के साथ किया। अंतर काफी हद तक इसमें निहित है कि पश्चिमी लोकतांत्रिक दुनिया साम्यवाद का दावा करने वाले चीन से मुकाबला कर रही है, जो उनकी नजर में अलोकतांत्रिक है। चीन आर्थिक मामलों में तेजी से आगे बढ़ रहा है और अपनी राजनीतिक दबंगई दिखाने में सक्षम है। बढ़ते चीन की ताकत को देख कई देश उसके बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) में शामिल होने के लिए दौड़ रहे हैं। इसे किसी एक देश द्वारा शुरू किया गया दुनिया का सबसे बड़ा आर्थिक अभियान माना जा रहा है, जिसमें द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका द्वारा पश्चिमी यूरोप को लुभाने के लिए शुरू किए गए मार्शल प्लान को बौना साबित करने की संभावना है।

पश्चिम की सहानुभूति हासिल करने वाले ये उइगर कौन हैं? चीन का दावा है कि वे प्राचीन चीनी संस्कृति और ताकत का हिस्सा रहे हैं, लेकिन वास्तव में ये तुर्की मूल के हैं और चीन की जातीय मुख्यधारा का हिस्सा नहीं हैं। आधुनिक उइगर मुख्यतः मुस्लिम हैं और हुई के बाद ये चीन में दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम जातीय समूह हैं। हुई पूर्वी एशियाई मूल के चीनी हैं। हुई चीनी बोलते हैं और व्यापक धार्मिक स्वतंत्रता का आनंद उठाते हैं। हुई समुदाय में अलगाववाद की बातें नहीं सुनाई देतीं। इसलिए ऐसा लगता है कि उइगर के बहाने चीन के खिलाफ जो आलोचना बढ़ रही है, वह वस्तुतः चीन का मुकाबला करने और उसे नियंत्रित करने के पश्चिम के प्रयास से ज्यादा कुछ नहीं है। एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका चीन से व्यापार युद्ध में शामिल है, दूसरी ओर, यूरोपीय देश, जिनकी कुल अर्थव्यवस्था मिलकर भी चीन की तुलना में बहुत छोटी लगती है, वैश्विक मामलों में अपना वर्चस्व बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के पूर्व स्थायी प्रतिनिधि और अब केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की 2016 में लिखी किताब पेरिलस इंटरवेंशन : द सिक्योरिटी काउंसिल ऐंड पॉलिटिक्स ऑफ केओस विस्तार से बताती है कि प्रमुख विश्व शक्तियां आपस में मिलकर किस तरह वैश्विक मामलों को आकार देने का काम करती हैं। किताब में इसका जिक्र है कि शक्तिशाली राष्ट्रों के राजदूत किस तरह लीबिया, सोमालिया, यमन, श्रीलंका और अन्य देशों के लिए एजेंडा तय करते हैं।
 
इसलिए उइगरों पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मद्देनजर पश्चिम द्वारा उठाए गए इस ताजा कूटनीतिक कदम के गहरे निहितार्थ हैं। यह चेतावनी बीजिंग स्थित 15 पश्चिमी देशों के राजदूतों की तरफ से दी गई है, जिसमें कनाडा की प्रभावी भूमिका है। ये लोग उइगरों के खिलाफ कथित मानवाधिकार उल्लंघन पर स्पष्टीकरण के लिए जिझियांग क्षेत्र में कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष अधिकारी चेन क्वांगो के साथ बैठक करना चाहते हैं। निस्संदेह, यह कदम चीन में मानवाधिकार के मुद्दे पर पश्चिमी देशों के एक समूह द्वारा असामान्य रूप से व्यापक, समन्वित कदम है, जिससे पता चलता है कि पश्चिमी क्षेत्र में अपनी दमनात्मक कार्रवाइयों के कारण किस तरह बीजिंग चौतरफा निशाने पर है। हकीकत यह है कि ज्यादातर उइगर मुस्लिम और अन्य मुस्लिम समूहों की सामूहिक नजरबंदी और उन पर सख्त निगरानी रखने के कारण बीजिंग को अब सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, विदेशी सरकारों और संयुक्त राष्ट्र के अधिकार विशेषज्ञों की नाराजगी का सामना करना पड़ा रहा है। विगत अगस्त में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार पैनल ने कहा कि उसे ऐसी कई विश्वसनीय रिपोर्टें मिली हैं कि चीन में एक लाख से अधिक उइगरों को गोपनीय ढंग से विशाल नजरबंदी शिविरों में रखा गया है। इस पर चीन की प्रतिक्रिया अपेक्षित ही थी। उसने कहा था कि यह जबरन हिरासत में रखने का मामला नहीं है, बल्कि मामूली अपराध करने वाले नागरिकों को बेहतर रोजगार संभावनाएं उपलब्ध कराने के लिए व्यावसायिक केंद्रों में भेजा गया है।

कई देश जिझियांग की स्थिति पर बोलने से कतराते हैं, क्योंकि वे चीन की नाराजगी से डरते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि चीन की ताकतवर कूटनीति उसकी निरंतर बढ़ती आर्थिक शक्ति से जुड़ी हुई है। जहां तक चीन की बात है, तो उइगरों का मामला उसकी सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। उसका कहना है कि जिझियांग उन इस्लामी आतंकवादियों और अलगाववादियों के गंभीर खतरे से जूझ रहा है, जो हमले करते हैं और बहुसंख्यक हान समुदाय के साथ तनाव बढ़ाते हैं। हालांकि उइगर तालिबान या इस्लामिक स्टेट की तरह हथियारों से लैस नहीं हैं। इसलिए बीजिंग का उइगर को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा बताना सच नहीं हो सकता।

लेकिन इस सच से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जिझियांग के आसपास के इलाकों में इस्लामी आतंकवादियों की लंबे समय से सक्रियता है। इसके पश्चिम में तुर्की है, जो इराक और सीरिया में व्याप्त आतंकवाद से प्रभावित है। इसके दक्षिण में पाकिस्तान और अफगानिस्तान हैं। दूसरी दिशाओं में ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और तुर्कमेनिस्तान जैसे मध्य एशियाई गणराज्य हैं। 
सीरिया और इराक में कमजोर पड़ा आईएस जिझियांग के पड़ोस यानी अफगानिस्तान-पाकिस्तान में सक्रिय हो रहा है। यह पूरा इलाका राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक पिछड़ेपन और हिंसा से त्रस्त है। ऐसे में, पंद्रह देशों के राजदूतों द्वारा उइगरों के मुद्दे पर चीन को घेरने का बहुत औचित्य नजर नहीं आता। भले ही वे संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के बाद सक्रिय हुए हों, लेकिन उनका यह कदम चाय के प्याले में तूफान से ज्यादा नहीं है। 

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