अमेरिकी चुनाव में भारत और भारतीय हितों का नाप-तौल बता रहे हैं के. एस. तोमर

K S Tomarकेएस तोमर Updated Mon, 31 Aug 2020 01:38 AM IST
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US Election - फोटो : PTI

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विदेश नीति के स्थापित सिद्धांतों के उलट भारत ने अपनी सारी उम्मीदें ट्रंप पर ही लगा रखी हैं, इसलिए दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव जीतने में डोनाल्ड ट्रंप की विफलता हमारे हितों को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती है, खासकर तब जब ट्रंप ने जम्मू एवं कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने, नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), चीनी आक्रामकता आदि के मुद्दे पर हमारा खुले दिल से समर्थन किया है।
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ट्रंप की घटती रेटिंग के मद्देनजर अगर डेमोक्रेट उम्मीदवार जोसेफ बिडेन राष्ट्रपति का चुनाव जीतते हैं, तो यह निश्चित नहीं है कि वह सभी मुद्दों पर भारत के साथ खड़े रहने के लिए प्रतिबद्ध रहेंगे, क्योंकि उनका विचार अपने पूर्ववर्ती से अलग हो सकता है। बिडेन द्वारा उपराष्ट्रपति पद के लिए कमला हैरिस के नामांकन का भी राजनीतिक अर्थ है, क्योंकि उनमें भारतीय मूल के लोगों तथा युवा अमेरिकियों का समर्थन हासिल करने की संभावना है।
विदेश नीति के विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप को कोविड-19 को संभालने के लिए भारी बाधाओं और विफलताओं का सामना करना पड़ रहा है, जिससे बड़ी संख्या में मौतें हुईं, अर्थव्यवस्था डूब रही है, नौकरियों की कमी है और वहां के विभिन्न राज्यों में नस्लीय दंगे हो रहे हैं। कोरोना के खिलाफ देरी से कदम उठाने और पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के चलते अमेरिकियों की जान बचाने में विफल रहने के कारण ट्रंप इस बार चुनाव जीतने के लिए चीनी कार्ड खेल सकते हैं।
उन्होंने बार-बार चीन को फटकार लगाई है कि उसने जान-बूझकर जानकारी छिपाई और दुनिया को गुमराह किया। ट्रंप अपने मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश कर सकते हैं कि उनकी सरकार ने कोई ढिलाई नहीं बरती, बल्कि चीन ने अमेरिका को कमजोर करने की कोशिश की, क्योंकि वह महाशक्ति बनना चाहता है। बिडेन राष्ट्रपति चुनाव में व्यापक अंतर से आगे चल रहे हैं, जबकि प्रचार अभियान अपने अंतिम चरण में है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप भारतीय मूल के लोगों पर भरोसा कर सकते हैं, जो आम तौर पर अतीत में रिपब्लिकन प्रतिनिधि के साथ खड़े रहे हैं। हाउडी मोदी रैली के दौरान मोदी ने भी ट्रंप का खुलकर समर्थन किया था। मतदाताओं द्वारा ट्रंप को खारिज किए जाने के बाद समीकरण बदल सकते हैं और यह भारत के लिए खतरनाक हो सकता है। चुनाव जीतने के लिए ट्रंप द्वारा मोदी की मदद लेने को डेमोक्रेट्स गंभीरता से ले सकते हैं, क्योंकि विदेश नीति को बराबरी के सिद्धांत के रूप में निर्देशित होना चाहिए, जिसका उल्लंघन किया गया है।

ट्रंप के फिर से चुनाव जीतने से हालांकि भारत के साथ संबंधों में मजबूती आएगी और दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता हो सकता है, जिसे राष्ट्रपति चुनाव तक के लिए स्थगित कर दिया गया था। लेकिन अगर  बिडेन जीत गए, तो कुछ निश्चित नहीं है। बिडेन ने भारत सरकार से आग्रह किया है कि वह कश्मीर के लोगों के तमाम अधिकारों की बहाली के लिए सभी जरूरी कदम उठाएं। असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर लागू करने और नागरिकता संशोधन अधिनियम पारित किए जाने से बिडेन निराश हैं।

उन्होंने ऐसे उपायों को देश की धर्मनिरपेक्षता की लंबी परंपरा और बहु-जातीय, बहु-धार्मिक लोकतांत्रिक परंपराओं को बनाए रखने के लिहाज से असंगत माना है। ट्रंप की जीत से पाकिस्तान और नेपाल के साथ भारत का तनाव कम हो सकता है, पर जॉय बिडेन के मामले में ऐसा कुछ निश्चित नहीं है, जिनके व्यापार आदि को लेकर अपने सख्त विचार हैं।

हालांकि बिडेन का स्पष्ट संदेश है कि अगर वह जीतते हैं, तो भारत-अमेरिका साझेदारी उनके प्रशासन की ‘उच्च प्राथमिकता’ होगी। यह चीन के साथ सीमा विवाद की स्थिति में महत्वपूर्ण है। विगत 15 जून को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी सैनिकों के साथ हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिकों के मारे जाने पर डेमोक्रेट्स एवं रिपब्लिकन, दोनों ने भारत के समर्थन में बयान दिया था।

बिडेन ने यह भी कहा है कि वह ट्रंप द्वारा लगाए गए एच-1 बी वीजा के अस्थायी निलंबन को हटा देंगे। उन्होंने अधिक समावेशी और उदार आव्रजन नीति का भी संकेत दिया है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की खराब स्थिति को देखते हुए विदेशी श्रमिकों के पक्ष में बोलना राजनीतिक रूप से साहसिक है।

बिडेन का यह भी मानना है कि भारत-अमेरिकी भागीदारी एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो लोकतंत्रों का समर्थन करती है, खासकर तब, जब चीन अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है। लगता है कि बिडेन के शीर्ष सलाहकार चीन पर नजरें जमाए हुए हैं। उन्होंने कहा है कि उन्हें ‘गर्व’ है कि अमेरिकी कांग्रेस के माध्यम से भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते कराने में एक सीनेटर के नाते उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समझौते ने वास्तव में द्विपक्षीय रिश्ते को मौलिक तरीके से बदल दिया।

बिडेन के बयान से नई दिल्ली को कुछ हद तक राहत पहुंचनी चाहिए। लेकिन डेमोक्रेट के बारे में भाजपा के भीतर और अमेरिका के उनके उग्र समर्थकों के बीच चिंताएं हैं। विशेष रूप से सदन के कुछ प्रगतिशीलों से, जिन्होंने कश्मीर की वास्तविकता को जाने बगैर मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना की। साथ ही, मोदी द्वारा ट्रंप को दिए गए संपूर्ण समर्थन ने भी कुछ डेमोक्रेट्स को परेशान किया। पूर्व अमेरिकी राजदूत रिचर्ड वर्मा के मुताबिक, अगर बिडेन चुनाव जीतते हैं, तो वह भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में स्थायी सीट हासिल करने में मदद करेंगे।

गौरतलब है कि चीन यूएनएससी में भारत को शामिल किए जाने के खिलाफ है। वर्मा ने यह भी कहा कि इस पर कोई संदेह ही नहीं है कि बिडेन के नेतृत्व में भारत और अमेरिका अपने नागरिकों को सामूहिक रूप से सुरक्षित रखने के लिए मिलकर काम करेंगे, जिसका मतलब है कि सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ खड़ा होना और जब पड़ोसी देश यथास्थिति को बदलने की कोशिश करे, तब भारत के साथ खड़ा होना।
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