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एक राजा की अनूठी विरक्ति
शिवकुमार गोयल
Updated Mon, 23 Sep 2013 07:49 PM IST
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दक्षिण भारत के एक राज्य के अधिपति पीपा परम सदाचारी और धर्मात्मा थे। प्रजा की सेवा में तत्पर रहने के साथ-साथ वह नियमित रूप से धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया करते थे।
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एक बार किसी विख्यात संत की सलाह पर वह प्रधानमंत्री तथा अन्य लोगों को साथ लेकर स्वामी रामानंद के दर्शन के लिए काशी पहुंचे। प्रधानमंत्री को उन्होंने स्वामी जी के पास भेजा। उसने कहा, हमारे राजा आपके दर्शन करना चाहते हैं। आश्रम में आने की स्वीकृति दें। स्वामी जी ने कहा, राजा-महाराजाओं से मुझे क्या लेना देना। मैं निर्धन और यायावर साधु-संन्यासियों से बातें कर संतोष का अनुभव करता हूं।
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पीपा तुरंत राजधानी लौट आए। उन्होंने अपनी तमाम व्यक्तिगत संपत्ति निर्धनों में वितरित कर दी। एक निर्धन के रूप में वह पुनः काशी पहुंचे। स्वामी रामानंद को जब राजा के इस त्याग का पता चला, तो उन्होंने उन्हें उपदेश देते हुए कहा, राजन, अपने को राजा की जगह भगवान का प्रतिनिधि मानकर जनता की सेवा करो। यही राजा का सर्वोत्तम धर्म है। राज्य में कोई भूखा-प्यासा न रहने पाए, किसी के साथ अन्याय न हो- इसका ध्यान रखते हुए भगवान की उपासना करो। पीपा ने ऐसा ही करने का संकल्प लिया।
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कुछ वर्ष बाद स्वामी रामानंद उनके राज्य में पहुंचे। पीपा तथा उनकी रानी को उन्होंने दीक्षा दी। पीपा की गणना परम विरक्त राज-संत के रूप में हुई।