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टु किल ए स्नो ड्रैगनफ्लाई

Sat, 02 Aug 2014 09:25 PM IST
ओम गुप्ता
ओम गुप्ता Updated Sat, 02 Aug 2014 09:25 PM IST
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two kill a snow dragonfly book review

आज तिब्बती भारत में घुल-मिल गए हैं। अब हम उन्हें भारतीय ही मानते हैं। खासकर उत्तर पूर्वी राज्यों में। पर आधी शताब्दी पहले तिब्बत एक आजाद देश था। भारत और चीन के बीच। उसकी एक प्राचीन सभ्यता और संस्कृति थी। बौद्ध धर्म से ओतप्रोत। 1959 के आसपास चीन ने कुचक्र रचकर अपनी फौज भेजी और आनन-फानन में एक भोले-भाले देश को दबोच लिया।

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शरद पी. पॉल ने उस चीनी विश्वासघात पर एक उपन्यास लिखा है, `टु किल ए स्नोड्रैगन फ्लाई' (एक लंबे पतले रंगीन परों वाले कीड़े की हत्या)। दो सौ तेइस पृष्ठों के इस उपन्यास को हार्पर कॉलिन्स ने छापा है। इस मार्मिक कथा में चप्पे-चप्पे पर तिब्बती बर्फ अटी पड़ी है। इसमें बर्फ की दुनिया का वर्णन है और दुनिया में बर्फ का चित्रण है। कैसे चीनी सैनिकों ने माओत्से तुंग के नापाक इरादों को सरअंजाम देने के लिए तिब्बत की निर्मल आत्मा को अपने भारी जूतों तले कुचल डाला।
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उपन्यास का कथानक लोबसांग और भुनचंग नामक भाई बहनों के बचपन से शुरू होता है। उनका बर्फ से खेलना, स्कूल आना-जाना, तिब्बती भाषा, इतिहास और धर्म से दो-चार होना। उनके दादा जोनचुग रिनपोचे के धार्मिक संरक्षण में जीवन मूल्यों से परिचित होना। स्नोड्रैगन शब्द अपने-आप में विरोधाभासी है। स्नो माने बर्फ और ड्रैगन यानी परदार सांप। पर सत्य में स्नोड्रैगन एक मासूम सा कीड़ा है। बिल्कुल चीनी आक्रमण से पूर्व के तिब्बत की तरह। लोबसांग और भुनचंग ने बचपन में केवल चीन का नाम सुना था। एक महाकाय पड़ोसी देश, जो सदियों से उनके पड़ोस में मौजूद था। एक नक्शे की तरह। वहां भी बौद्ध धर्म कण-कण में व्याप्त था।
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पर एक दिन अपनी लाल क्रांति की चीनी विजय के मद में चूर माओ की कुत्सित निगाह इस शांत पड़ोसी की आध्यात्मिकता को भेद गई। माओ ने कहा था कि धर्म अफीम के नशे की तरह मानव को गहरी नींद में सुला देता है। उसे तिब्बत की सुहानी बर्फ नींद की गोली लगी थी। उसने आनन-फानन में उसे तहस-नहस करने की ठान ली।

कल तक महात्मा बुद्ध की कहानियां सुन-सुन कर बड़े हो रहे बच्चों को `पूर्व अब लाल है'  जैसे नारे रटाए जाने लगे। उन्होंने महसूस किया कि कल तक उन्हें किस्से कहानियां गढ़-गढ़ कर सुनाने वाले दादा अचानक चुप हो गए हैं। उनका शरीर सुन्न हो गया है। हाथों को लकवा मार गया है। चारों ओर चीनी सिपाही नजर आने लगे। बच्चों का घर से बाहर निकलना बंद कर दिया गया। उनके स्कूल में माओ और मार्क्स की नीरस उबाऊ शिक्षा दी जाने लगी।

बुद्ध के अस्तित्व को तिब्बती मानस से मिटाने का घनघोर प्रयास दिखाई दे रहा था। कहानी आगे बढ़ती है। बच्चे बड़े होने लगते हैं। उन पर माओ के दुष्प्रचार का कोई असर नहीं पड़ता। उन्हें पता लगा कि अभी आशा की एक किरण बाकी है। चीन जैसा दानवी आकार वाला तो नहीं, लेकिन एक और विशाल देश भारत ने अपने दरवाजे खोल दिए हैं। लेकिन, इसके लिए उन्हें हिमालय की बर्फीली पहाड़ियों को पार करके सिलिगुड़ी  पहुंचना होगा। वहां एक उज्ज्वल भविष्य उनका इंतजार कर रहा है।

तब तक खबर आई कि उनके श्रद्धेय राष्ट्रनायक दलाई लामा हिमालय को लांघकर धर्मशाला नामक शहर में पहुंच चुके हैं। भारत ने उन्हें एक पड़ोसी देश का राजा मानकर अपने यहां मान-सम्मान के साथ विराजमान कर दिया है। दलाई लामा ने धर्मशाला में अपनी निर्वासित सरकार स्थापित कर ली है। उनके साथ हजारों तिब्बती भी वहां पहुंच चुके हैं।

भारत ने तिब्बतियों को अपने यहां तिब्बती स्कूल खोलने की इजाजत दे दी है। तिब्बती भारत में अपना सामान बेच सकते हैं। भारत की राजधानी दिल्ली में तिब्बती बस्ती बस गई है। तिब्बती बाजार खुल गए हैं। तिब्बती वहां प्राइवेट नौकरी कर सकते हैं। लोबसांग और भुनचंग भी दुर्गम हिमालय की चोटियों को लांघते हुए पहले धर्मशाला पहुंचते हैं और फिर वहां से बंबई। उनके दादा उनके साथ-साथ। धर्मशाला में वह एक तिब्बती स्कूल में अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं। वहां रहते हुए उन्हें यह महसूस नहीं होता कि वह एक पराये देश में हैं। वास्तव में धर्मशाला उन्हें अपना तिब्बत ही लगता है।

भारतीय अखबारों में दलाई लामा का जिक्र बड़े ही आदर भाव से किया जाता है। तिब्बतियों को अपना देश याद आता है, पर वे वापस लौटना नहीं चाहते हैं। वहां पर चीन ने सब कुछ नष्ट कर दिया है। उनके पगोडे, स्कूल, धर्म, संस्कृति। कुछ नहीं बचा।

चीन के इस कुकृत्य की दुनिया भर में निंदा की गई और भारत की सराहना। लेकिन भारत को इसकी भीषण कीमत चुकानी पड़ी। चीन ने भारत पर हमला करके उसका भी बड़ा भाग हथिया लिया, लेकिन भारत ने तिब्बत का साथ नहीं छोड़ा।


उधर लोबसांग और भुनचंग भी बड़े हो गए। भुनचंग को एक अस्पताल में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिल गई। उसका एक भारतीय डॉक्टर से प्रेम संबंध बना और शादी कर ली। उन्हें तिब्बत की याद अब भी सताती है, पर भारत के विशाल क्षितिज पर उन्हें अपनी एक नई पहचान मिली। यहां अन्य तिब्बतियों को सम्मानपूर्वक जीवन जीते देखकर यह सब एक पुनर्जन्म लगता था।

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