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ट्वंटीमय देश हमारा
शरद उपाध्याय
Updated Tue, 09 Apr 2013 11:17 PM IST
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ऑस्ट्रेलिया को बुरी तरह हराने के बाद हम बोर हो रहे थे कि अब क्या करें।
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ऑफिस में घंटे-दो घंटे काम करते ही थक जाते हैं। फिर बाहर चाय पीओ, राजनीति पर बात करो, घर के रोने रोओ। चुनाव में अभी समय है।
पर कहते हैं न कि भगवान के घर में देर है, अंधेर नहीं। इसीलिए फिर से क्रिकेट का सहारा हो गया है। अब भ्रष्टाचार और घोटालों से हटकर हमने आईपीएल पर ध्यान केंद्रित कर लिया है।
अब ट्वंटी-20 देखते हुए कुछ दिन तो मजे में निकल जाएंगे। रात को देर तक क्रिकेट देखो और सुबह आराम से उठो। अगर घर के काम-काजों की वजह से नींद पूरी नहीं हो पाए, तो आराम से दफ्तर में सोओ।
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कोई क्या कहेगा? जब सभी लोग सामूहिक नींद लेंगे, तो काहे की परेशानी! न बच्चे ज्यादा किट-किट करेंगे, न बीवी अधिक परेशान करेगी।
अब साहब, आईपीएल में मजा क्यों न आए! एक ही एपिसोड में सब-कुछ देखने को जो मिल जाता है। क्रिकेट का क्रिकेट देख लो, मनोरंजन का मनोरंजन हो जाए।
टेस्ट मैच देखते थे, तो लगता था कि शास्त्रीय संगीत के किसी सम्मेलन में बैठे हैं। सोचते थे कि कहीं नींद न आ जाए। पांच दिन तक खेलते जा रहे हैं, खेलते ही जा रहे हैं। बार-बार नींद से उठकर पूछना पड़ता था कि क्या हुआ? कुछ परिणाम निकला? बीवी बताती थी, जी, मैच तो ड्रॉ हो गया।
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लेकिन आईपीएल में मजे ही मजे हैं। क्रिकेट का क्रिकेट, नाच-गाने का नाच-गाना। खिलाड़ी अच्छा नहीं खेल रहे, तो कोई बात नहीं, थोड़ी देर चियर गर्ल्स को ही निहार लो।
वे टीम का उत्साह कितना बढ़ा पाती हैं, यह तो पता नहीं। पर हमारा उत्साह तो सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। कई बार तो कैमरा बल्लेबाज पर आते ही लगने लग जाता है कि कमबख्त मेरे और चियर गर्ल्स के बीच यह क्यों आ गया है।
और फिर इन मैचों में हमारे मनपसंद हीरो-हीरोइन भी तो लगातार आते रहते हैं। मैं प्रीति जिंटा के इंतजार में दीवाना रहता हूं, तो बीवी पीछे से कहती रहती है कि शाहरुख खान के आते ही मुझे जरूर बुला लेना।
बच्चों का मनोरंजन चौकों-छक्कों में होता ही रहता है। पिताजी भी दबे पांव आकर चियर गर्ल्स को निहार जाते हैं, भले प्रकट में कुछ न कहें।
माताजी पीछे से बड़बड़ाती रहती हैं कि मुए चैन से सोने भी नहीं देते। तो कुल मिलाकर हमारा देश ‘ट्वंटीमय’ हो रहा है।