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तुम समय को लांघ जाओ
दिनेश मिश्र
Updated Sat, 14 Mar 2015 09:47 PM IST
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जिंदगी में एक मोड़ ऐसा भी आता है, जब हम अपने बीते हुए दिनों का हिसाब करते हैं। इनमें कहीं कुछ छूटने की कसक छिपी होती है, तो कहीं कुछ रीत जाने की यादें। इन यादों में बसंत और पतझड़ एक के बाद एक करके नहीं आते। वे अक्सर पल-पल बदलने वाली धूप और छांव की तरह ही आते हैं। कुछ ऐसी ही यादों की पोटली व इतिहास के झरोखे से अनुभव को बयां करने वाली अपनी कविताओं का संग्रह ‘तुम समय को लांघ जाओ’ लेकर आए हैं वरिष्ठ रचनाकार वेदव्यास।
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आजादी से पूर्व 1942 के आंदोलन से पहले जन्मे वेदव्यास की इन कविताओं में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन के दौर के ‘करो या मरो’ के नारे वाला तेवर है। इनमें आजादी के बाद भी आम आदमी के दम तोड़ते सपनों की दास्तां और बजबजाती व्यवस्था से जूझने की छटपटाहट है। जहां देश, काल, वातावरण और परिस्थितियों में कुछ कर गुजरने का माद्दा नजर आता है। इन कविताओं में अपने समय को मापने का हौसला है, तो दूसरी ओर कविताओं के बहाने अपने वक्त की पड़ताल भी है। इन कविताओं में सिर्फ बसंती फूल नहीं हैं और न ही जिंदगी के कोमल राग गाने वाले गीत। ये कविताएं जीवन की कड़ी धूप में तपकर निखरी हैं। वेद व्यास की कविताएं उन सरकारों की बात नहीं करती, जिनकी वजह से अंधेरा और बढ़ जाता है।
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इन कविताओं के सपने किसी पक्षी के कटे हुए पंख की तरह हैं। इनमें जिंदगी और समाज की आंखें खोल देने वाली हकीकत है। जैसे वह कहते हैं-‘बातों ही बातों में बीत गए साल, राजा भी नंगा है, जनता है बेहाल।’ दरअसल, ऐसी कविताएं अपने समय का उपहास उड़ाती नजर आती हैं। लेखक के यहां सूरज भी करवट बदलता है, अंगड़ाई भी लेता है, इसलिए वह पूरी धमक के साथ लोगों से जागने और बदलने का आह्वान भी करता है। यहां तक कि रचनाकार की कविताएं कभी-कभी तो बेहद ओजपूर्ण तरीके से बात करती हैं। उनमें कवि का गहरा आत्मविश्वास और साहस झलकता है। कविताओं के पूरे संग्रह को दो हिस्से में रखा गया है।
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पहला हिस्सा जहां किताब के शीर्षक के नाम से है, तो वहीं दूसरे हिस्से की कविताओं को ‘कंठ हैं अनेक गीत एक राष्ट्र का’ नाम से रखा गया है। इस दूसरे हिस्से की कविताओं में राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति पूरी शिद्दत के साथ है। जैसे ‘स्वाधीन देश का गान सुनो, नई चेतना के स्वर में, आज देश की माटी जागी।’ इनमें नए सृजन का गीत भी है और उठो जवानो-उठो किसानों का अपनी मातृभूमि के लिए आह्वान भी है। इन कविताओं में राष्ट्रप्रेम का स्वर इतना ओजयुक्त है कि पाठक को इन्हें पढ़ने के दौरान मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं की याद अनायास आ ही जाती हैं।
कुल मिलाकर वेद व्यास के यहां जिंदगी में प्राण फूंकने वाली कविताएं तो हैं ही, साथ में अपने समय को लांघने की कोशिश भी है। इन्हें पढ़कर धमनियों में बहने वाला खून गर्म हो उठता है। इनके यहां की कविताओं में नए युग की उम्मीद है और सुनहरे भविष्य की आस भी है। यहां अंधेरी रात के गुजरने और उजले सवेरे की खुशी है, मगर वह इन सबके बावजूद देशप्रेम की बात करना नहीं भूलते।
तुम समय को लांघ जाओ
वेद व्यास
बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य : 100 रुपये