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हालात से उबरने की कोशिश
सी एम वासुदेव
Updated Thu, 28 Feb 2013 11:49 PM IST
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पी चिदंबरम के लिए वित्त वर्ष 2013-14 का बजट कई मायनों में बेहद चुनौतीपूर्ण था। जैसे विकास दर का गिरकर महज पांच फीसदी पर आ जाना, बचत में लगातार कमी, राजकोषीय घाटे व चालू खाता घाटे में बढ़ोतरी और महंगाई दर में इजाफा। बजट में इन समस्याओं पर काबू पाने के उपायों की झलक मिलती है। खासकर निवेश प्रोत्साहन से जुड़ी कई कोशिशें की गई हैं, ताकि विकास दर बढ़ाई जा सके।
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संयंत्र व मशीनरी में 100 करोड़ रुपये से अधिक राशि का निवेश करने वाली कंपनियों को 15 प्रतिशत की दर से निवेश भत्ता देने के प्रस्ताव को इसी दिशा में उठाए गए कदम के रूप में देखा जा सकता है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि औद्योगिक उत्पादन में गिरावट की प्रमुख वजह विनिर्माण और खनन क्षेत्र ही रहे हैं। इसलिए खनन क्षेत्र को निजी सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) के जरिये थोड़ा खोलने की कोशिश की गई है।
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भवन निर्माण क्षेत्र में भी पिछले कुछ दिनों से काफी गिरावट दर्ज की जा रही है। इस क्षेत्र को गति देने के लिए 25 लाख रुपये तक के आवास ऋण से घर खरीदने वालों को कर में छूट देने का प्रस्ताव किया गया है। भवन निर्माण क्षेत्र में गति आने से सीमेंट, लौह और इससे जुड़े अन्य उद्योगों को फायदा मिलता है। बजट में आधारभूत संरचना के विकास पर विशेष जोर है। सड़क निर्माण के क्षेत्र में विनियामक प्राधिकरण का गठन किया गया है। इसके अलावा आधारभूत संरचना में निवेश बढ़ाने के लिए आधारभूत संरचना ऋण निधि (आईडीएफ) को प्रोत्साहित करने की बात है। ये सराहनीय कदम हैं।
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बात अगर चालू खाता घाटे की करें, तो इसका सीधा मतलब आयात का बहुत ज्यादा बढ़ जाना और उस अनुपात में निर्यात का न बढ़ पाना है। हमारे कुल आयात में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी कच्चे तेल और सोने की ही है। कच्चे तेल के आयात में हम कमी नहीं कर सकते और सोने के आयात को हतोत्साहित करने के लिए पहले ही कदम उठाए जा चुके हैं। लेकिन हमें यह भी समझना चाहिए कि एक सीमा के बाद हम सोने के आयात को हतोत्साहित नहीं कर सकते। सवाल यह है कि आखिर लोग सोने में निवेश करने के लिए क्यों टूट पड़े? इसकी बड़ी वजह लोगों का निवेश के अन्य साधनों पर भरोसा न बन पाना है। मौजूदा बजट में घरेलू और विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए घोषणाएं की गई हैं।
चालू खाता घाटे को कम करने के लिए भले ही हम आयात में एक सीमा से अधिक की कमी न कर सकें, लेकिन निर्यात में इजाफा अवश्य कर सकते हैं। यही नहीं, डॉलर की तुलना में रुपये के कमजोर होने की स्थिति में निर्यात बढ़ाना हमारे लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। पर पिछले कुछ दिनों से यहीं हम चूक रहे हैं। इस दिशा में वित्त मंत्री ने वाणिज्य और उद्योग मंत्री की पूरी मदद करने की बात कही है। रही बात बजट प्रावधानों की, तो उसमें रेडीमेड वस्त्र उद्योग को राहत देते हुए शून्य उत्पाद शुल्क मार्ग की मांग को स्वीकार करने जैसे कुछ कदम हैं।
कई राज्यों में विधानसभा चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनाव को देखते हुए यह उम्मीद की जा रही थी कि लोकलुभावनी घोषणाएं होंगी। युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम, 1,000 करोड़ रुपये के सरकारी अंशदान से निर्भया निधि और भारत का पहला महिला बैंक बनाना ऐसे ही कार्यक्रम हैं। खाद्य सुरक्षा विधेयक भी इसी का हिस्सा है। लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता कि बजट में ऐसी घोषणाएं ज्यादा हैं। लग्जरी वस्तुओं पर कर बढ़ाना और प्रति वर्ष एक करोड़ रुपये से अधिक की कर योग्य आय वाले व्यक्तियों पर दस प्रतिशत का अधिभार लगाना भी एक तरह से नकारात्मक लोकलुभावनी घोषणा है। इससे आबादी के एक बड़े हिस्से को महसूस होता है कि वित्त मंत्री अमीरों की जेब ढीली कर रहे हैं।
सबसे अच्छी बात यह है कि बजट में करों के स्लैब और दरों में कोई खास परिवर्तन नहीं किया गया है। इससे कर व्यवस्था में स्थायित्व आएगा, जिससे न सिर्फ घरेलू, बल्कि विदेशी निवेशकों में भी विश्वास की बहाली होगी। राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए ज्यादा से ज्यादा वित्त जुटाने के उपाय निश्चित रूप से चिदंबरम के सामने सबसे बड़ी चुनौती रही होगी। इसमें वह काफी हद तक सफल होते दिखे हैं। जहां से संभव हो सका है, उन्होंने पैसे निकालने की कोशिश की है। जैसे कमोडिटी ट्रेडिंग पर अब तक कर नहीं लगता था, लेकिन अब शेयर ट्रेडिंग की तरह इस पर भी कर लगा दिया गया है।
हालांकि कृषि उत्पादों को इससे बाहर रखा गया है। रही बात महंगाई पर काबू पाने की, तो इस दिशा में सीधा हस्तक्षेप करने के विकल्प बहुत ज्यादा नहीं थे। यह संभव नहीं है कि लोगों को महंगाई से राहत देने के लिए डीजल और अन्य पदार्थों की कीमतों में कमी कर दी जाए। हां, निवेश बढ़ेगा, तो विकास दर में इजाफा होगा, जिससे लोगों की जेब में ज्यादा पैसा आएगा और महंगाई से उन्हें कुछ राहत मिल सकेगी। परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अगर हम देखें, तो यह एक संतुलित बजट है, पर कृषि क्षेत्र के लिए लंबी अवधि वाली योजनाओं का अभाव शायद इसका सबसे कमजोर पहलू है। खासकर तब, जब हम खाद्य सुरक्षा योजना को लागू करने जा रहे हैं।