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विदेशी कर्ज के जाल में
अश्विनी महाजन
Updated Fri, 24 May 2013 09:35 PM IST
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बीती सदी के आखिरी दशक में शुरू की गई आर्थिक नीति के पक्ष में एक बड़ा तर्क यह था कि बढ़ते व्यापार घाटे और भुगतान असंतुलन के कारण देश पर विदेशी कर्ज का भार बढ़ रहा था।
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वैसे में यह तर्क दिया गया कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के रास्ते पर चलकर हम देश को ऋणमुक्त बना सकते हैं। तब कहा गया कि हमें अपने आयात पर अवरोध समाप्त करने होंगे और विदेशी निवेश के लिए रास्ते चौड़े करने होंगे।
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डब्ल्यूटीओ के समझौतों के अंतर्गत आयातों पर लगे टैरिफ और गैरटैरिफ नियंत्रण हटा दिए गए। नतीजतन देश में आयात बढ़ने लगा, निर्यात में भी वृद्धि हुई, लेकिन तुलनात्मक रूप से आयात ज्यादा बढ़े। ऐसे में, हमारा व्यापार घाटा बढ़ता गया। पर इस दौरान भारत ने सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भारी प्रगति करनी शुरू की।
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उसी समय अनिवासी भारतीयों ने पहले से भी अधिक तादाद में विदेशी मुद्रा देश में भेजी। इस कारण व्यापार घाटा बहुत अधिक होने के बावजूद देश का भुगतान घाटा ज्यादा नहीं था। वर्ष 2001-2004 तक तो भुगतान अतिरेक की स्थिति आई। आजादी के बाद ऐसा मौका लगातार तीन वर्षों तक पहली बार आया।
वर्ष 2013-14 का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने भुगतान घाटे के बढ़ने पर चिंता व्यक्त की है। प्रधानमंत्री और रिजर्व बैंक भी ऐसी चिंता जता चुके हैं। यह सच है कि 2004-05 से हमारा व्यापार घाटा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा।
बीती सदी के नब्बे के दशक में भुगतान घाटा औसत 4.4 अरब डॉलर वार्षिक था, जबकि 2004-05 के बाद के आठ वर्षों में यह औसत साढ़े छह गुना बढ़कर 28.5 अरब डॉलर हो गया। वर्ष 2008 में हमारे विदेशी मुद्रा भंडार तीन वर्षों के आयातों के लिए पर्याप्त थे।
आज आयात की मात्रा बढ़ने के कारण हमारे विदेशी मुद्रा भंडार अब मात्र छह महीने के आयात के लिए ही पर्याप्त हैं। पिछले तीन वर्षों में देश पर कर्ज भी भारी मात्रा में बढ़ा। जो कर्ज मार्च, 2009 में 224.5 अरब डॉलर था, वह दिसंबर, 2012 में 374 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसमें वह कर्ज शामिल नहीं है, जो हमारी कंपनियों ने अन्य देशों में ले रखे हैं।
लगातार बढ़ता हुआ विदेशी कर्ज भुगतान घाटे की स्थिति को और मुश्किल बना रहा है। व्यापार घाटे का बढ़ना एक प्रमुख कारण तो है, विदेशी ऋणों की वापसी और ब्याज अदायगी इस समस्या को और जटिल बना रही है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011-12 में हमारे विदेशी ऋण के मूल और ब्याज अदायगी में 31.5 अरब डॉलर चले गए।
भुगतान घाटा बढ़ने का एक प्रमुख कारण प्रत्यक्ष और पोर्टफोलियो विदेशी निवेश भी है। हालांकि हमारे वित्त मंत्री बढ़ते भुगतान घाटे से बचने के उपायों में विदेशी निवेश को बढ़ाने का तर्क देते हैं, लेकिन बढ़ता विदेशी निवेश भी देश के भुगतान घाटे को बढ़ा रहा है।
वर्ष 2011-12 में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 22 अरब डॉलर का था, जबकि पूर्व में आए विदेशी निवेश पर विदेशियों द्वारा कमाए ब्याज, लाभांश, रॉयल्टी और अन्य प्रकार की आमदनियों द्वारा 26 अरब डॉलर विदेशों में अंतरित हुए। यानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से जितनी प्राप्ति हुई, उससे ज्यादा उस पर कमाई कर विदेशी अपने देशों में ले गए।
इसी प्रकार भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में लिए गए ऋणों पर भी मूल और ब्याज अदायगी के लिए भारी विदेशी मुद्रा की जरूरत पड़ती है, जो हमारे भुगतान घाटे को और बढ़ाती है। देश में वर्ष 2012-13 तक कुल 186.1 अरब डॉलर का पोर्टफोलियो निवेश भी आया।
वर्ष 2008 में अमेरिकी आर्थिक संकट के चलते निवेशकों ने भारी राशि विदेशों में भेजनी शुरू कर दी थी, जिसके कारण हमारा पोर्टफोलियो निवेश उस वर्ष ऋणात्मक हो गया था। पोर्टफोलियो निवेश पर लाभ विदेशी मुद्रा के रूप में विदेश भेजे जाते हैं। यह भी भुगतान घाटा बढ़ाता है।
जब किसी देश पर कर्ज इतना बढ़ जाता है कि उसकी मूल और ब्याज अदायगी के लिए और अधिक ऋण लेना पड़ता है, तो उसको कर्ज का भंवर जाल कहते हैं। आज जरूरत इस बात की है कि हमारे नीति-निर्माता स्थिति की गंभीरता को समझें और देश को कर्ज के भंवर जाल में डूबने से बचाए।