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लोकटक झील की त्रासदी : मानवीय दखल से धूमिल होती प्राकृतिक सुंदरता, इसे रोकना होगा

Tue, 06 Sep 2022 07:29 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Tue, 06 Sep 2022 07:29 AM IST
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सार
संकट की शुरुआत 1971 में सिंचाई व बिजली मंत्रालय की 'लोकटक बहुउद्देशीय बिजली परियोजना' से हुई। वर्ष 1979 में लोकटक व इंफाल नदी को जोड़ने वाले खोरडक कट पर स्थायी बांध बन गया। इससे झील की प्राकृतिक सफाई बंद हो गई, जिससे पानी की हालत खराब हो रही है।
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Tragedy of Loktak Lake: Natural beauty getting tarnished by human intervention, it has to be stopped
प्रतीकात्मक तस्वीर। - फोटो : संवाद

विस्तार

मणिपुर का नाम 'मणि’ पड़ने का यदि कोई सबसे सशक्त कारण नजर आता है, तो वह है लोकटक झील। विष्णुपुर जिले में स्थित यह झील पूर्वी भारत की सबसे विशाल प्राकृतिक जलनिधि है। हाल ही में लोकटक विकास प्राधिकरण ने झील में बनी झोपड़ियों और मछली पकड़ने के लिए स्थापित 'अथाफुम्स' को हटाने के आदेश दिए हैं। इससे मैती जनजाति के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। यही समुदाय पीढ़ियों से इस अनूठी झील की देखभाल करता रहा है। 



जलमुर्गियों के आवास तथा कई अन्य जानवरों, मछलियों और वनस्पतियों को समेटे हुए यह झील राज्य के समाज, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, संस्कृति और परिवहन व्यवस्था की पहचान है। कुछ साल पहले तक यह झील 2,23,000 हेक्येटर में फैली थी, जो अब सिकुड़ कर 26,000 हेक्टेयर रह गई है। इस झील में 12 द्वीप हैं, जिनमें से चार पर आबादी है। इसके किनारे पांच शहर और 54 गांव हैं। इस झील की खासियत है, इसमें तैरते हुए 600 से अधिक मकान। 


पानी में उगने वाली घास, वनस्पति और मिट्टी के मिश्रण से बनी मोटी परतों को स्थानीय भाषा में फुगदी या फुमडीज कहा जाता है, जो इस झील की खासियत है। इन फुगदी के स्थलीय भाग का पांचवां हिस्सा जल की सतह पर तैरता है, जबकि शेष भाग पानी में डूबा होता है। इसलिए ये तैरते हुए विशाल द्वीप की तरह दिखते हैं। लोकटक में इन्हीं तैरती फुगदी पर बस्तियां तो हैं ही, इसके दक्षिण में दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ संरक्षित वन केईबुल लामजाओ नेशनल पार्क भी है। 

यहां देशज, दुर्लभ और संकटग्रस्त संगई हिरणों का डेरा है। मैती आदिवासी इस फुगदी को एक छल्ले के आकार में ढालते हैं और उसमें मछली का जाल लगा देते हैं। यहां जाल में आ गई मछलियों को अच्छा पौष्टिक आहार मिलता है और वे कुछ ही समय में बड़ी व भारी हो जाती हैं। इस संरचना को ही अथाफुम्स कहा जाता है, जिसे हटाने पर सरकार आमादा है। सरकार का कहना है कि मानवीय दखल के कारण हो रहे पर्यावरणीय नुकसान से झील को बचाना जरूरी है, सो स्थानीय लोगों द्वारा पर्यटकों के लिए झील के भीतर बनाई झोपड़ियों को हटाना होगा। 

सरकार लोकटक झील संरक्षण अधिनियम, 2006 का हवाला देकर कह रही है कि इस संरक्षित क्षेत्र में झोपड़ी बनाना अवैध है। स्थानीय समुदाय का दावा है कि वे तो कई सदियों से इस झील में ही झोपड़ी बनाकर रहते आए हैं। चूंकि स्थानीय समुदाय पर्यटकों को यहां रखकर कुछ कमा लेता है, वही सरकार को खटक रहा है, जो ईको टूरिज्म के नाम पर यहां बड़ी कंपनियों के होटल खोलने की योजना पर काम कर रही है। यदि सरकार अपनी मंशा में सफल हुई, तो करीब 30,000 लोगों का घर और रोजगार संकट में होगा। 

संकट की शुरुआत 1971 में सिंचाई व बिजली मंत्रालय की 'लोकटक बहुउद्देशीय बिजली परियोजना' से हुई। वर्ष 1979 में लोकटक व इंफाल नदी को जोड़ने वाले खोरडक कट पर स्थायी बांध बन गया। इससे झील की प्राकृतिक सफाई बंद हो गई, जिससे पानी की हालत खराब हो रही है। बांध बनने के बाद मछलियों की कई प्रजातियां विलुप्त हो गईं और झील में पैदा होने वाली कई साग-सब्जियों का उगना रुक गया। लोकटक पर आबादी बढ़ने की शुरुआत बिजली घर परियोजना के समय ही हो गई थी। जब बांध के लिए लोगों को उनके पुश्तैनी गांव-घरों से भगाया गया, तो उन्हें तैरते घरों का विकल्प ही मुफीद लगा। 

आबादी बढ़ने के साथ खेती का रकबा भी बढ़ रहा है। सरकार ने भी झील के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचने के लिए पक्की सड़कों के निर्माण किए, जिससे झील में पानी और घट गया। बेतहाशा जंगल कटाई और मिट्टी के क्षरण ने झील को उथला बना दिया है। झील में हर साल दो लाख टन मिट्टी तो झूम खेती के कारण ही जुड़ रही है। ऐसे में, जो झील कभी दस मीटर गहरी होती थी, उसकी गहराई पांच मीटर रह गई है। सरकारी लोग विज्ञान और पर्यावरण के तो माहिर हैं, पर स्थानीय नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने में वे विफल रहे हैं। कोई भी विकास आम लोगों की भागीदारी के बिना सार्थक नहीं होता और यही लोकटक की त्रासदी है।

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