आर्थिक मंदी की ओर? 2019 का बजट पेश किए आज एक महीना पूरा हो गया
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आज का दिन शेयर बाजारों के लिए मील का पत्थर है-2019 का बजट पेश किए आज एक महीना पूरा हो गया। इस दौरान बेंचमार्क एनएसई निफ्टी 7.67 फीसदी और बीएसई सूचकांक 6.78 फीसदी नीचे गिर गया। लगभग सभी क्षेत्रों के सूचकांक में गिरावट आई है, जिसमें आईटी, ऑटो, वित्त, बैंक, स्वास्थ्य सेवा, एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स), रियलिटी, धातु और ऊर्जा क्षेत्र भी शामिल हैं। इस गिरावट के कारण पिछले एक महीने में निवेशकों को अनुमानित 15 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है-जो वैश्विक स्तर पर भारतीय शेयर बाजार के सबसे खराब प्रदर्शन के बारे में बताता है।
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आज का दिन शेयर बाजारों के लिए मील का पत्थर है-2019 का बजट पेश किए आज एक महीना पूरा हो गया। इस दौरान बेंचमार्क एनएसई निफ्टी 7.67 फीसदी और बीएसई सूचकांक 6.78 फीसदी नीचे गिर गया। लगभग सभी क्षेत्रों के सूचकांक में गिरावट आई है, जिसमें आईटी, ऑटो, वित्त, बैंक, स्वास्थ्य सेवा, एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स), रियलिटी, धातु और ऊर्जा क्षेत्र भी शामिल हैं। इस गिरावट के कारण पिछले एक महीने में निवेशकों को अनुमानित 15 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है-जो वैश्विक स्तर पर भारतीय शेयर बाजार के सबसे खराब प्रदर्शन के बारे में बताता है।
800 से ज्यादा कंपनियों के शेयर मूल्य इस साल 52 सप्ताह के निचले स्तर पर चले गए हैं। इनमें से 600 से अधिक कंपनियों के शेयर मूल्य में गिरावट बजट के बाद हुई है। ऐसे ही 125 शेयरों के मूल्य इस साल अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गए हैं, जिनमें से 90 से ज्यादा के शेयर मूल्यों में गिरावट बजट के बाद हुई है। ग्राहकों के हिसाब से वोडाफोन-आइडिया भारत की दूसरी सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी है और इसका प्रति शेयर मूल्य घटकर 6.30 रुपया रह गया, जो इसके फेस वैल्यू यानी दस रुपये से भी कम है।
दो दर्जन अन्य कंपनियों की भी यही स्थिति है, जिनमें यूनाइटेड बैंक, आईएफसीआई और एमटीएनएल शामिल हैं। शेयर बाजार के विश्लेषक अमूमन कंपनियों के शेयर के बुक वैल्यू को बहुत ज्यादा महत्व देते हैं। बुक वैल्यू वह है, जो किसी कंपनी की कुल संपत्ति से उसकी देनदारी घटाने के बाद बचता है। लेकिन इस समय 350 से अधिक कंपनियों के शेयर मूल्यों को उनके बुल वैल्यू से कम बताया जा रहा है। या तो निवेशकों को बुक वैल्यू के बारे में संदेह है या वे भविष्य में मंदी के प्रति आशंकित हैं है।
ओएनजीसी भारत का सबसे बड़ा सार्वजनिक उपक्रम है और फॉर्च्यून ग्लोबल सूची की 500 कंपनियों में शामिल भारत की सात कंपनियों में से एक है। इसके सभी शेयरों के बाजार मूल्य इसके रिजर्व से कम हैं। फिलहाल 300 से ज्यादा ऐसी कंपनियां हैं, जिनके शेयरों का बाजार मूल्य इन कंपनियों के रिजर्व से कम है। ओएनजीसी की कंपनी में टाटा स्टील, सेल, ऑयल इंडिया, भेल और वेदांता हैं। यह परिदृश्य सार्वजनिक प्रबंधन और अर्थव्यवस्था में निवेश माहौल, दोनों को दर्शाता है। औसत जॉन जानी जनार्दन शेयर बाजार में सीधे निवेश नहीं करता, और अपनी बचत का निवेश वह म्यूचुअल फंड्स के जरिये करता है।
यह तर्क देना फैशन बन गया है कि शेयर बाजार की स्थिति राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का सही संकेतक नहीं है, अतीत में वित्त मंत्रियों ने दावा किया है कि शेयर बाजार की स्थिति खराब होने से उनकी नींद नहीं उड़ी है और लाजपत नगर बाजार उनके लिए अधिक मायने रखता है। बहादुरी की बात अलग है, लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था की सेहत का संकेतक है। आखिरकार बड़े निगमों की बिक्री और मुनाफे से भारत सरकार को कर मिलता है।
मंदी के ये संक्षिप्त विवरण 1996 की मंदी की याद ताजा करते हैं। पिछले वर्ष की 77 कंपनियों की तुलना में इस वर्ष 167 कंपनियों की रैंकिंग गिर गई है। दूरसंचार कंपनियों की सरकार पर लंबित लाइसेंस फीस के मद में 92,000 करोड़ रुपये की देनदारी है। राज्य विद्युत बोर्डों का नुकसान उदय के लाभ को कुचल रहा है। सेवाओं और विनिर्माण के लिए परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) सिकुड़ गया है और निर्यात कम हो रहा है, जिससे उत्पादक क्षमता निष्क्रिय हो गई है।
अर्थव्यवस्था में सुस्ती सरकारों द्वारा संसाधनों के प्रबंधन के तरीकों के कारण आती है। केंद्र सरकार का खर्च 10.4 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 24.5 लाख करोड़ रुपये हो गया है।रिजर्व बैंक के अनुसार 2009 से 2019 के बीच केंद्र और राज्य सरकारों का खर्च 18.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 53.6 लाख करोड़ रुपये हो गया है। पिछले साल, 2018-19 में सकल कर राजस्व का अनुमान 22.71 लाख करोड़ रुपये का था, जो लक्ष्य से 1.91 लाख करोड़ रुपये कम था। बेशक सरकार ने कागज पर राजकोषीय घाटे का स्तर बनाए रखा है, लेकिन तथ्य यह है कि खर्च का एक बड़ा हिस्सा बैलेंस शीट से बाहर था। जैसा कि कीन्स ने कहा था, कि आपका भविष्य आपके अतीत से जुड़ा हुआ होता है।
मुफ्त में कुछ नहीं होता। सरकार के उल्लिखित और अनुल्लिखित वास्तविक खर्च ने तरलता को सोख लिया है, क्रेडिट में कमी लाई है, उपभोग और मांग में कमी, निवेश, रोजगार सृजन, और नतीजतन आय एवं विकास में कमी की स्थिति पैदा कर दी है। अर्थव्यवस्था के ये संकेत आगे संकट का इशारा करते हैं।
अर्थव्यवस्था में उम्मीदें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। सरकारी उधार और खर्च के घरेलू आर्थिक कारण हैं और व्यापार व विकास की अनिश्चितता के वैश्विक कारण हैं। विकास की गति बनाए रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है माहौल, जो कि नीतिगत दृष्टिकोण की वजहों से-जिनमें अनावश्यक सक्रियता भी है और निष्क्रियता भी- खराब हो गया है।
- लेखक आईडीएफसी इंस्टी. के विजिटिंग फेलो हैं।