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आज फिर गांव की रंगत ने दिल मसोसा है : कभी खेतों का सौंदर्य देखा है?

Sun, 28 Jul 2019 01:45 AM IST
सुधीर विद्यार्थी सुधीर विद्यार्थी
सुधीर विद्यार्थी Published by: सुधीर विद्यार्थी Updated Sun, 28 Jul 2019 01:45 AM IST
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Today again the color of the village is Heart broken
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pexels.com
कभी खेतों का सौंदर्य देखा है? कभी उस रूप-रंगत पर मोहित हुए हैं, जिसे किसान ने अपना पसीना बहाकर ऊसर-बंजर धरती की छाती चीरकर जगमगाया है। अभी सावन चल रहा है। आषाढ़ बस बीता ही है। धान की बेड़ रोपने के लिए किसान परिवार के कई सदस्य पानी से लबालब जुते हुए खेत में चहोरा गाड़ते हुए गउनई कर रहे हैं और सिर ऊपर बादल घुमड़-मचल कर अमृत वर्षा करने में मनोयोग से जुटे हैं। किसान के होंठों से झरते हुए बोल भी इस पल तरंगित और पुरनम हो चुके हैं। यही फसल जब महीने भर में अपनी गहरी हरी रंगत में दो-दो बालिश्त का कद अर्जित कर तेज हवा में लहराती है, तब किसान के होठों पर पसरी खुशी को कोई कथाकार प्रेमचंद ही पढ़ पाता है।

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कभी खेतों का सौंदर्य देखा है? कभी उस रूप-रंगत पर मोहित हुए हैं, जिसे किसान ने अपना पसीना बहाकर ऊसर-बंजर धरती की छाती चीरकर जगमगाया है। अभी सावन चल रहा है। आषाढ़ बस बीता ही है। धान की बेड़ रोपने के लिए किसान परिवार के कई सदस्य पानी से लबालब जुते हुए खेत में चहोरा गाड़ते हुए गउनई कर रहे हैं और सिर ऊपर बादल घुमड़-मचल कर अमृत वर्षा करने में मनोयोग से जुटे हैं। किसान के होंठों से झरते हुए बोल भी इस पल तरंगित और पुरनम हो चुके हैं। यही फसल जब महीने भर में अपनी गहरी हरी रंगत में दो-दो बालिश्त का कद अर्जित कर तेज हवा में लहराती है, तब किसान के होठों पर पसरी खुशी को कोई कथाकार प्रेमचंद ही पढ़ पाता है।

धान की पकी हुई लांक को इकट्ठा करके झोरने-लाने में जो श्रम लगता है, वह किसान के घर-आंगन में पहुंचते ही छप्पर-छानी वाली बखरी भी धन-धान्य से भरी-पुरी होकर नृत्य करने लगती है। और ये जो खेतों की मेड़ पर बड़े-बड़े सुरमई तने वाले दरख्त अपनी दूर तक बाहें फैलाए, बाबा नागार्जुन के शब्दों में पत्रहीन नग्न गाछ हो चुके हैं, उनकी फुनगियां ज्यादातर सुर्ख और कभी-कभी गुलाबी मांसल फूलों से भर गई हैं। कौन निवीर्य इनकी रंगत पर मोहित नहीं होगा। करीब जाकर देखो, तो लगता है कि किसी अनिंद्य सुंदरी ने अपने होठों को सुर्ख लिपिस्टिक से रंग लिया हो।

वृक्षों पर नए कल्ले सिर उठाने लगे हैं। यह नए जन्म का उत्सव है। सब ओर उमंगें हैं। हवा डोलने लगी है। पाकड़ और पीपल के पत्तों ने मानों संगीत की महफिल सजा ली है। हवा की तरंगों से जुड़कर वे कोई राग गाने लगे हैं, पर उसे सुनने का अवकाश अब मोबाइल पीढ़ी के पास कहां है। गेहूं की फसल के लिए खेत को कई बार जोतना होता है। 

बैलों के कठिहा हल की वह जुताई खेतों में एक मोहक अल्पना का सर्जन करती है। कभी उस जीवंत चित्र को देखिए जब अधजुते खेत के मध्य किसान की घरवाली चबेना लेकर आती है और श्रम करते पसीना-पसीना हो चुका हलवाहा बैलों के पगहे थामे पालथी मारकर वहीं मेंड़ पर जीमने बैठ जाता है। वह कभी नहीं भूलता कि इस भोजन से क्षुधा शांत करने के बाद उसे अपने ‘हीरा’ और ‘मोती’ को भी एक-एक रोटी का निवाला देना है। वे पशु नहीं, उसके घर के सदस्य हैं। मनुष्य और जानवर का यह साहचर्य अब आंखों से ओझल होने लगा है।

खेत जोतने जाते या लहडू में मचे बैलों के गले की घंटियों की रुनझुन इन दिनों सुनाई नहीं देती। सरसों, दुआं, अलसी, तिल, जौ, चना और मटर के हरे-भरे खेत हों या फिर अरहर के डोलते झुरमुटों का तेज हवा में आलिंगनबद्ध होना अथवा मक्के के मोहक और मदमस्त हो चुके पौधों के फलों से झांकते कोमल झालर जैसी रेशमी धागों की अद्भुत कलाकृति किसे आकर्षित नहीं करती। नदी किनारे के रेतीले खेत में पालेज पसरी पड़ी है।

वे जो जामुन के गंदले तने वाले भारी-भरकम वृक्ष हैं, जल्दी ही पानी से प्यास बुझी धरती पर फुलैंदा कालिया परोसेंगे। गन्ने के लिए खेत जुत रहा है। अब उसमें बुआई होगी। इस समय हल के फल के दोनों तरफ लकड़ी की दो चौड़ी पट्टियां बांध ली गई हैं, जिससे कूंड़ चौड़ा बने और उसमें पके गन्ने के हाथ-डेढ़ हाथ के काटे गए टुकड़े बोए-दबाए जा सकें। पूरे खेत में त्योहार-सा माहौल है। खेत में मिठास बोयी जा रही है, जिससे और अधिक मीठेपन की उत्पत्ति की जा सके। कवि अरुण कमल ने एक जगह कहा है कि अगर मिठाई नहीं होती, तो कविता और कला भी नहीं होती।

घर के पिछवाड़े बटिहों पर तुरई और लौकी की बेलें पसर गई हैं। इनके पत्ते हरे और गहरे काही रंग के हैं। सर्पीली मदहोश बेलें एक दूसरे के प्यार में इस कदर उलझ गई हैं कि जैसे उनकी अपनी जिंदगी का सिरा ही कहीं डूब-खो गया हो। इन पर अब फूल आने लगे हैं, जिनका यौवन कुछ ही दिनों में फलायमान होने लगेगा। बरसात में सब ओर घास बढ़ आई है। पतेल के सूख चुके पौधों का जोवन भी मानो छलछलायमान होकर निखर आया है। 

प्रकृति सब तरफ उमंग भरी अंगड़ाई लेने को मचल रही है। खेत, मेड़ें और नदी की तलहटियों तक ने हरियाली की नर्म चादर ओढ़ ली है। बांस के झुरमुटों में भी जड़ों से नए कल्ले फूटने लगे हैं। उनका रूप-आकार किसी नए शिशु की मानिन्द मोहक और कोमल है। बरसात में मिट्टी की सुगंध नथुनों के भीतर घुसकर हर किसी को मदमस्त बना रही है। बाग-बगीचे, नदी-नारे, पोखर पानी से उफनाने लगे हैं। 

ऐसे मौसम में ही नायिका अपने नायक को हिदायत देती है-नदी नारे न जाओ श्याम पइयां परूं। वह बीच धारा न जाओ कहकर रास्ता रोक लेती है, क्योंकि इन भीगी हवाओं में वह बिछोह को सहन नहीं कर सकती। सावन घुमउ़-घुमड़ कर बरस रहा है। अंबुआ की डाल पर भरा के झूले डाले जा रहे हैं। पेंगें बढ़ाई जा रही है। ऊपर घनघोर घटाओं ने आकाश को आच्छादित कर लिया है।

थोड़े समय पहले भूड़ और रेतीले खेतों में वीर बहूटी देखने को मिल जाती थी, लेकिन अब वह धरती से पूरी तरह नापैद हो चुकी है। आखिर किसने मार डाला उस सुर्ख मखमली गोलमटोल बेहद खूबसूरत छोटे-से जीव आकृति को जिसका कोई साइंसदां पुनर्सृजन नहीं कर सकता? प्रख्यात उर्दू शायर दुर्गा सहाय ‘सुरूर’ जहानाबादी ने एक शेर में इसी जीव के बारे में कहा था-आह! ओ नन्हें-से कीड़े नाज़िशे-सहरा है तू, दश्त में इक सुर्ख छोटा-सा गुले-राना है तू।  
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